सुभाष मिश्र
अयोध्या में धर्म ध्वजा का फहराया जाना केवल एक धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं है, यह उस यात्रा का अगला अध्याय है जिसकी शुरुआत राम मंदिर निर्माण के साथ हुई थी। दिलचस्प यह है कि मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा की तरह ही इस ध्वजारोहण में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की उपस्थिति रही—एक ऐसा दृश्य जिसमें आस्था, राजनीति और सांस्कृतिक पुनरुत्थान एक साथ दिखाई देते हैं।
ये सब इस बात का संकेत देते हैं कि इसे महज़ धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक उद्घोष माना जा रहा है। लेकिन प्रश्न यह है कि यह ध्वजा किस दिशा की ओर संकेत कर रही है। रामराज्य की उस कल्पना की ओर, जहाँ ”दहिक दैविक भौतिक तापा, रामराज काहू नहीं व्यापा—या उस नए भारत की ओर, जिसे वर्तमान सत्ता व्यवस्था ”गुलामी की मानसिकता से मुक्ति और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के रूप में देखती है?
प्रधानमंत्री मोदी का भाषण इसी द्वंद्व को सामने लाता है। एक ओर वे अयोध्या को ‘आदर्शों की भूमि बताते हैं, राम को शौर्य, धैर्य, नीति और संयम का प्रतीक बताते हैं। दूसरी ओर मैकाले की मानसिक गुलामी और विदेशी प्रभावों की बात कर इसे राष्ट्रीय पुनर्जागरण का क्षण बताते हैं। ”धर्म ध्वजा केवल ध्वजा नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता के पुनर्जागरण का प्रतीक है—यह वाक्य मंदिर से आगे जाकर पूरे राजनीतिक-सांस्कृतिक विमर्श को छूता है।
आरएसएस प्रमुख भागवत का वक्तव्य भी इस ध्वजा को आंदोलन के शहीदों और त्यागियों की स्मृति से जोड़ देता है। उनके अनुसार सरस्वती और वैदिक परंपरा का यह अनुष्ठान उस संघर्ष की पूर्णता है जो 500 वर्षों की यात्रा से गुजऱा है। वहीं योगी आदित्यनाथ इसे ”नए युग का शुभारंभ बताते हैं, जहाँ अयोध्या ”वैश्विक सांस्कृतिक राजधानी बनने की ओर अग्रसर है।
लेकिन इस उत्सव, उल्लास और अद्भुत दृश्य के बीच एक विचारणीय सवाल यह भी उठता है कि क्या यह ध्वजा रामराज्य के उन मूलभूत मूल्यों की याद भी दिलाती है जिन्हें कबीर, गांधी और तुलसी ने बार-बार रेखांकित किया? तुलसीदास कहते हैं—
‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।
और गांधी अपने राम को ”वैष्णव जन की करुणा, समरसता और परदुखकातरता में देखते थे।
आज जब देश में सामाजिक-सांस्कृतिक विभाजन और अलगाव की रेखाएँ कई बार उभरती दिखती हैं, तब ‘राम का नाम किस दिशा में लेकर जा रहा है, यह सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है। राम ने कभी भेद नहीं किया, कभी जाति-वंश-सम्प्रदाय का आग्रह नहीं रखा। उन्होंने अपने राज्य में सबको साथ लेकर चलने की भावना रखी। प्रधानमंत्री ने भी कहा कि ”राम भेद से नहीं, भाव से जुड़े हैं, लेकिन क्या यह भावना आज के राजनीतिक-सामाजिक वातावरण में प्रत्यक्ष दिखती है?
धर्म ध्वजा का फहराया जाना निश्चित रूप से ऐतिहासिक क्षण है, लेकिन इतिहास तभी पूर्ण होता है जब उसके साथ आत्मचिंतन भी जुड़ता है। केवल मंदिर निर्माण या ध्वज आरोहण से रामराज्य स्थापित नहीं होता। रामराज्य स्थापित होता है:
- जब न्याय, मर्यादा और समानता सबके लिए समान रूप से लागू हों।
- जब परहित, करुणा और संयम नेतृत्व और समाज दोनों के व्यवहार में दिखाई दें।
- जब धर्म किसी एक पहचान की जड़ता नहीं, बल्कि उन सार्वभौमिक मूल्यों का प्रतीक बने जिन्हें राम ने जिया।
मोदी सरकार अयोध्या को सांस्कृतिक राजधानी बनाने के संकल्प के साथ आगे बढ़ रही है।
राम मंदिर भारतीय आस्था का केंद्र रहा है और रहेगा। लेकिन ध्वजा का वास्तविक अर्थ तभी पूर्ण होगा जब यह केवल आस्था नहीं, बल्कि समावेशी शासन, सामाजिक न्याय और सांस्कृतिक सदभाव के पथ को प्रकाशित करे।
क्योंकि अगर ध्वज देवताओं की उपस्थिति का प्रतीक है, तो शासन और समाज राम के उन आदर्शों की उपस्थिति का प्रतीक होना चाहिए जो किसी भी सत्ता, किसी भी विचारधारा से ऊपर हैं। प्रश्न यह नहीं कि ध्वज कहाँ फहराया गया, प्रश्न यह है कि वह हमें कहाँ ले जाएगा।