दंतेवाड़ा। बैलाडीला की खदानों से निकलने वाला करोड़ों का लौह अयस्क अब सिर्फ सरकारी खनन परियोजनाओं तक सीमित नहीं रह गया है। जंगलों के भीतर एक समानांतर ‘खनन साम्राज्य’ खड़ा हो चुका है, जहां रात के अंधेरे में जेसीबी मशीनें गरजती हैं, ट्रकों में चोरी का अयस्क भरा जाता है और फिर उसे सैकड़ों किलोमीटर दूर कंपनियों तक पहुंचा दिया जाता है। दंतेवाड़ा जिले के पंडेवार क्षेत्र में सामने आए ताजा मामले ने इस पूरे अवैध नेटवर्क की परतें खोल दी हैं।

इस बार तस्करों की चाल स्थानीय ग्रामीणों की सतर्कता के सामने फेल हो गई। देर रात जंगलों के भीतर मशीनों की लगातार आवाज सुन ग्रामीणों को संदेह हुआ। जब लोग मौके पर पहुंचे तो वहां जेसीबी मशीन की मदद से ट्रक में लौह अयस्क भरा जा रहा था। ग्रामीणों को देखते ही एक कार सवार संदिग्ध व्यक्ति अंधेरे का फायदा उठाकर फरार हो गया, लेकिन ट्रक और जेसीबी मौके पर ही पकड़ लिए गए। सूचना मिलते ही पुलिस और वन विभाग की संयुक्त टीम पहुंची और दोनों वाहनों को कब्जे में लेकर फॉरेस्ट डिपो में खड़ा कराया गया।
पूछताछ में ट्रक चालक लखेश्वर भंडारी ने बताया कि वह पहली बार पंडेवार इलाके में अयस्क भरने आया था। चालक के मुताबिक पूरे खेल का संचालन स्थानीय युवक सुंदर कर रहा था, जो जंगल से अयस्क निकलवाने और ट्रकों में भरवाने की व्यवस्था देख रहा था। पकड़ा गया ट्रक जगदलपुर के मावली भाठा निवासी कमलेश ठाकुर का बताया जा रहा है, जबकि जेसीबी मशीन के मालिक की जानकारी अब तक सामने नहीं आ सकी है।
लेकिन यह मामला सिर्फ एक ट्रक या एक जेसीबी तक सीमित नहीं है। स्थानीय लोगों का दावा है कि बैलाडीला, भांसी, बचेली, फरसपाल और मिरातुल क्षेत्र में लौह अयस्क चोरी का एक संगठित सिंडिकेट लंबे समय से सक्रिय है। बैलाडीला से गंगालूर तक फैली पहाड़ियों में उच्च गुणवत्ता वाला लौह अयस्क बड़ी मात्रा में मौजूद है और इसी खनिज पर अब माफिया की नजर टिक गई है।
ग्रामीणों का आरोप है कि जंगलों में फैले अयस्क को स्थानीय मजदूरों के जरिए इकट्ठा कराया जाता है। इसके बाद रात के समय कच्चे रास्तों से ट्रकों में भरकर बाहर भेज दिया जाता है। यह पूरा नेटवर्क बेहद योजनाबद्ध तरीके से काम करता है। इलाके के लोगों का कहना है कि हर साल 100 से ज्यादा ट्रकों में चोरी का अयस्क बाहर भेजा जाता है, लेकिन पुलिस, वन विभाग और माइनिंग विभाग मिलकर मुश्किल से 10 से 15 मामलों में ही कार्रवाई कर पाते हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर इतनी बड़ी मात्रा में हो रही तस्करी प्रशासन की नजरों से कैसे बच जाती है।
सूत्रों के मुताबिक चोरी का यह लौह अयस्क रायपुर और जगदलपुर की स्पंज आयरन कंपनियों तक पहुंचाया जाता है। बचेली क्षेत्र के कुछ दलाल सीधे कंपनियों से संपर्क में रहते हैं और हर महीने कई ट्रकों में अयस्क सप्लाई किया जाता है। बताया जा रहा है कि एनएमडीसी में जिस लंप आयरन ओर की कीमत करीब 8,290 रुपये प्रति टन है, वही चोरी का माल आधे दाम में कंपनियों को बेच दिया जाता है। छोटे गिट्टी अयस्क, फाइंस और स्लाइन अयस्क की भी बाजार में भारी मांग है। एक ट्रक में करीब 40 टन लौह अयस्क भरा जाता है, जिसकी कीमत लाखों रुपये तक पहुंचती है। यही वजह है कि यह अवैध कारोबार लगातार फैलता जा रहा है।
सबसे बड़े सवाल अब वन चौकियों और जांच व्यवस्था पर खड़े हो रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि दंतेवाड़ा सीमा पार करने के बाद कई वन चौकियों में वाहनों की गंभीर जांच तक नहीं होती। कई ट्रक बिना रोक-टोक आसानी से निकल जाते हैं। लोगों का कहना है कि यदि सीमा क्षेत्रों में सख्त जांच हो तो इस पूरे नेटवर्क की कमर तोड़ी जा सकती है।
इस पूरे मामले ने राजनीतिक संरक्षण की चर्चाओं को भी फिर हवा दे दी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि बिना संरक्षण के जंगलों से खुलेआम लौह अयस्क निकालना, ट्रकों में भरना और उसे बाहर तक पहुंचाना संभव नहीं है। यही कारण है कि अब सवाल सिर्फ तस्करों पर नहीं, बल्कि उन अधिकारियों और प्रभावशाली लोगों पर भी उठ रहे हैं जिनकी छत्रछाया में यह ‘खनिज माफिया’ फल-फूल रहा है।
फिलहाल पुलिस और वन विभाग जांच की बात कह रहे हैं, लेकिन दंतेवाड़ा के लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है — क्या यह कार्रवाई सिर्फ एक ट्रक तक सीमित रहेगी, या फिर बैलाडीला के जंगलों में वर्षों से चल रहे पूरे लौह अयस्क तस्करी सिंडिकेट का सच भी सामने आएगा?