–सुभाष मिश्र
संसद में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का हालिया बयान केवल एक सुरक्षा उपलब्धि का ब्योरा नहीं था, बल्कि उसमें सियासत की तीखी धार भी साफ दिखाई दी। उन्होंने देश में नक्सलवाद के लगभग समाप्त हो जाने का दावा करते हुए जहां सुरक्षा बलों की भूमिका, सरकार की रणनीति और विकास मॉडल को रेखांकित किया, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस पर सीधे और गंभीर आरोप भी लगाए। यह दोहरी रेखा ‘उपलब्धि और आरोप’ इस पूरे विमर्श को केवल सुरक्षा का विषय नहीं रहने देती, बल्कि उसे राजनीतिक बहस के केंद्र में ला खड़ा करती है।
गृहमंत्री का यह कहना कि नक्सलवाद के फैलाव में कांग्रेस की नीतियों की भूमिका रही, एक बड़ा राजनीतिक आरोप है। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के समय बनी तथाकथित अतिरिक्त-संवैधानिक समितियों पर सवाल उठाए, इंदिरा गांधी के दौर तक संदर्भ ले गए, और वर्तमान विपक्षी नेता राहुल गांधी की यात्राओं तक को इस बहस में जोड़ दिया। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पर भी निशाना साधते हुए उन्होंने यह संकेत देने की कोशिश की कि जिन क्षेत्रों में कांग्रेस का प्रभाव रहा, वहां नक्सलवाद ज्यादा समय तक बना रहा।
यह आरोप राजनीति के स्तर पर अपनी जगह रखते हैं, लेकिन इसके साथ ही यह भी देखना होगा कि नक्सलवाद जैसा जटिल और बहुस्तरीय आंदोलन किसी एक दल या एक सरकार की नीतियों का परिणाम मात्र नहीं रहा। इसकी जड़ें गहरी सामाजिक-आर्थिक असमानताओं, आदिवासी क्षेत्रों में विकास की कमी, और दशकों से चले आ रहे प्रशासनिक अभाव में भी रही हैं। नक्सलबाड़ी आंदोलन से शुरू हुआ यह आंदोलन समय के साथ कई रूपों में फैला और बदला। ऐसे में इसका मूल्यांकन केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के आधार पर करना अधूरा दृष्टिकोण होगा।
गृहमंत्री ने अपने भाषण में जो आंकड़े और उपलब्धियां गिनाईं—नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या में भारी कमी, सैकड़ों मुठभेड़, हजारों आत्मसमर्पण और सुरक्षा बलों की निर्णायक भूमिका, वे निश्चित रूप से इस बात के संकेत हैं कि जमीनी स्तर पर बड़ा बदलाव हुआ है। यह भी सच है कि तकनीक के इस्तेमाल, बेहतर समन्वय और ‘सुरक्षा, विकास और विश्वास’ की त्रिस्तरीय रणनीति ने इस लड़ाई को निर्णायक मोड़ तक पहुंचाया है।
साथ ही, उन्होंने ‘अर्बन नक्सल’ और बौद्धिक समर्थन के मुद्दे को भी उठाया, जो लंबे समय से राजनीतिक और वैचारिक बहस का हिस्सा रहा है। यह एक संवेदनशील विषय है, क्योंकि इसमें असहमति और हिंसा के बीच की रेखा को स्पष्ट रूप से परिभाषित करना जरूरी होता है। लोकतंत्र में असहमति का स्थान है, लेकिन हिंसा का समर्थन किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं हो सकता। हालांकि, इस पूरे विमर्श में एक महत्वपूर्ण पहलू पुनर्वास और विकास का भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के लिए बनाई गई नीतियां, आदिवासी क्षेत्रों में पहुंचती योजनाएं, और बस्तर जैसे इलाकों में बढ़ती प्रशासनिक मौजूदगी इस बात का संकेत हैं कि सरकार ने केवल सुरक्षा बलों के सहारे ही नहीं, बल्कि समावेशी दृष्टिकोण से भी काम किया है।
फिर भी, यह सवाल बना रहेगा कि क्या नक्सलवाद का ‘समाप्ति’ का दावा पूरी तरह अंतिम है? विचारधाराएं केवल सैन्य कार्रवाई से खत्म नहीं होतीं। वे तब कमजोर पड़ती हैं जब उनके सामाजिक आधार खत्म होते हैं और जब राज्य अपने नागरिकों के बीच विश्वास कायम कर पाता है। अगर विकास, न्याय और भागीदारी की प्रक्रिया सतत और ईमानदार बनी रहती है, तभी यह दावा स्थायी रूप से सही साबित होगा। गृहमंत्री का भाषण एक तरफ जहां दशकों पुरानी समस्या के समाधान की घोषणा करता है, वहीं दूसरी ओर यह भी दिखाता है कि इस मुद्दे पर राजनीतिक सहमति अभी दूर है। कांग्रेस पर लगाए गए आरोपों का जवाब भी उतनी ही मजबूती से आएगा, और यही लोकतंत्र की प्रकृति है।
अंतत:, नक्सलवाद का सवाल केवल ‘किसकी गलती’ या ‘किसकी जीत’ तक सीमित नहीं होना चाहिए। यह उस भारत की कहानी है, जहां एक लंबे संघर्ष के बाद शांति की संभावना दिखाई दे रही है। इस संभावना को स्थायी हकीकत में बदलने के लिए जरूरी है कि सियासत से ऊपर उठकर उन मूल कारणों पर लगातार काम किया जाए, जिनसे कभी यह आंदोलन पैदा हुआ था। अगर यह संतुलन बना रहा, तो बस्तर ही नहीं, पूरा देश सचमुच उस दौर से बाहर निकल सकेगा जिसे कभी ‘लाल आतंक’ के नाम से जाना जाता था।