मनरेगा पर नया प्रयोग: ग्रामीण रोजग़ार, नीति और राजनीति

मनरेगा पर नया प्रयोग: ग्रामीण रोजग़ार, नीति और राजनीति

दिसंबर 2025 में संसद द्वारा वीबी-जी-राम-जी अधिनियम का पारित होना केवल एक नई ग्रामीण योजना की शुरुआत नहीं है, बल्कि यह भारत की सामाजिक नीति, संघीय ढांचे और राज...

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दूषित पानी नहीं, दूषित तंत्रसबसे स्वच्छ शहर इंदौर से उठता असहज सवाल

-सुभाष मिश्रइंदौर देश का सबसे स्वच्छ शहर। लगातार वर्षों से स्वच्छता रैंकिंग में प्रथम। जिसे मॉडल कहा गया, जिसे ब्रांड बनाया गया, जिसे शासन-प्रशासन की सफलता का...

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क्रिकेट के बहाने बंगाल में ‘नया खेला’ शाहरुख़ ख़ान, राष्ट्रवाद और चुनावी उन्माद

-सुभाष मिश्रभारत में जब भी चुनाव नज़दीक आते हैं, तब राजनीति अपने सबसे आसान औज़ार निकाल लेती है धर्म, राष्ट्रवाद...

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Editor-in-Chief सुभाष मिश्र की कलम से – कर्ज में डूबे राज्य: विकास की सच्चाई और फ्रीबीज की राजनीति

-सुभाष मिश्रभारत को दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का श्रेय दिया जा रहा है और कहा जा रहा है कि 2030...

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 नए साल की दस्तक और हड़ताल की आहट

Editor-in-Chief सुभाष मिश्र की कलम से – नए साल की दस्तक और हड़ताल की आहट

-सुभाष मिश्रनया साल आम तौर पर उम्मीदों, संकल्पों और नई शुरुआत का प्रतीक होता है। लेकिन छत्तीसगढ़ में 2026 का आग़ाज़ कर्मचारियों के लिए हड़ताल और टकराव के माहौ...

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Editor-in-Chief सुभाष मिश्र की कलम से- शास्त्र की परंपरा, प्रवचन का उभार और राजनीति का प्रवेश

-सुभाष मिश्रभारतीय समाज की बुनियाद जिस बौद्धिक उदारता पर टिकी रही है, उसका सबसे जीवंत रूप शास्त्रार्थ की परंपरा...

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Editor-in-Chief सुभाष मिश्र की कलम से – सात फेरों की नहीं, अनुबंध की शादी

-सुभाष मिश्रविवाह भारतीय समाज में कभी केवल दो व्यक्तियों के बीच का निजी संबंध नहीं रहा। यह एक संस्कार था—जहां परिवार, समाज और धर्म साझी भूमिका निभाते थे। अग्न...

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अटल के आईने में आज की भाजपा, अटल से मोदी तक

सुभाष मिश्रभारतीय राजनीति में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जो अपने समय से आग...

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वेतनमान की दुहाई, बाज़ार की बन आई

Demand for pay scale : बाज़ार की बन आई

‘हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिनदिल को खुश रखने के लिए ग़ालिब खय़ाल अच्छा है।’यह पंक्ति ...

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Editor-in-Chief सुभाष मिश्र की कलम से – बैटल ऑफ़ बंगाल: सच के इर्द-गिर्द रची जा रही राजनीति

-सुभाष मिश्रकबीर ने चेताया था-मैं कहता अखंड देखी, तू कहता कागज़़ की लेखी।सच कहूँ तो मरन दावे, झूठे जग बौराना।आज ...

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