नाम बदलने और छोटे का चलन

-सुभाष मिश्र

केरल का नाम बदलकर केरलम हो गया। इलाहाबाद अब प्रयागराज है। बम्बई अब मुम्बई है। जेनजी के लिए रायपुर का कटोरा तालाब केटी है तेलीबॉंधा तालाब जिसे मरीन ड्राइव भी कहा जाता है एमडी हो गया है। शहरों और जगहों के नाम केवल नक्शे पर लिखे शब्द नहीं होते, वे स्मृति, पहचान और रोजमर्रा की भाषा का हिस्सा बन जाते हैं। इसी कारण जब किसी राज्य, शहर, स्टेशन या सार्वजनिक स्थल का नाम बदला जाता है, तो वह महज़ प्रशासनिक निर्णय नहीं रहता, बल्कि इतिहास, संस्कृति और राजनीति के बड़े विमर्श का हिस्सा बन जाता है। 2023 से 2026 के बीच देश में कई महत्वपूर्ण नाम परिवर्तन हुए या प्रस्तावित हुए, जिन्हें समर्थकों ने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अस्मिता की पुनर्स्थापना बताया, जबकि आलोचकों ने इसे प्रतीकों की राजनीति कहा।
केरल विधानसभा ने जून 2024 में राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया, जिसे केंद्र की मंजूरी भी मिली। तर्क दिया गया कि आधिकारिक नाम राज्य की मातृभाषा मलयालम के अनुरूप होना चाहिए। पोर्ट ब्लेयर का नाम बदलकर ‘श्री विजयपुरम’ करना औपनिवेशिक प्रतीकों से मुक्ति के संकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया।
महाराष्ट्र में अहमदनगर अब ‘अहिल्यानगर’, औरंगाबाद ‘छत्रपति संभाजी नगर’ और उस्मानाबाद ‘धाराशिव’ कहलाते हैं। अयोध्या रेलवे जंक्शन का नाम ‘अयोध्या धाम जंक्शन’ किया गया। दिल्ली में सराय काले खान चौक का नाम बदलकर ‘बिरसा मुंडा चौक’ और पुराने संसद भवन को ‘संविधान सदन’ कहा जाने लगा।
इन निर्णयों का एक स्पष्ट राजनीतिक संदर्भ भी है। अधिकांश नाम परिवर्तन भाजपा शासित राज्यों या केंद्र सरकार के स्तर पर हुए और इनकी गति 2024 के लोकसभा चुनाव तथा उसके बाद के विधानसभा चुनावों के आसपास तेज दिखी। समर्थकों के अनुसार यह सांस्कृतिक स्वाभिमान और स्थानीय नायकों को सम्मान देने की प्रक्रिया है। आलोचकों के अनुसार यह भावनात्मक मुद्दों के जरिए राजनीतिक ध्रुवीकरण का माध्यम भी हो सकता है।
लेकिन इस पूरी बहस के बीच एक और सामाजिक सच्चाई है, जो कम चर्चा में आती है, समाज स्वयं नामों के साथ क्या करता है? इतिहास गवाह है कि लोग लंबे और औपचारिक नामों को अपनी सुविधा से छोटा करते रहे हैं। महात्मा गांधी मार्ग आम बोलचाल में एम.जी. रोड बन गया, जी.ई. रोड, मॉल रोड या वीआईपी चौक जैसे संक्षिप्त रूप रोजमर्रा की भाषा का हिस्सा हैं। व्यक्तियों के नाम भी इससे अछूते नहीं रहे, द्वारका प्रसाद डी.पी. हो गए, जयप्रकाश जेपी बन गए। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय को देश भर में जेएनयू के नाम से ही जाना जाता है।
यह प्रवृत्ति केवल सुविधा का मामला नहीं, बल्कि बदलती सामाजिक लय का संकेत है। शहरीकरण, अंग्रेज़ी शिक्षा, मीडिया और कॉरपोरेट संस्कृति ने संक्षेपाक्षरों को सामान्य बना दिया। संवाद जितना तेज हुआ, नाम उतने छोटे होते गए। अब जेनजी इस प्रक्रिया को एक नए स्तर पर ले गई है। यह पीढ़ी केवल नाम छोटा नहीं करती, बल्कि उसे कोड, हैशटैग और डिजिटल संकेतों में बदल देती है। ओके की जगह के ‘गुड नाइट’ की जगह ‘जीएन’, जगहों के नाम सोशल मीडिया पर टैग में सिमट जाते हैं। उनके लिए नाम एक ब्रांड, एक लोकेशन पिन या डिजिटल पहचान है। ऐसे में सवाल उठता है जब सरकारें लंबी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ नए नाम देती हैं, तो क्या नई पीढ़ी उन्हें उसी औपचारिकता से अपनाती है, या वे भी कुछ समय बाद किसी संक्षिप्त या कोडित रूप में ढल जाते हैं?
नाम बदलने की राजनीति और नामों को छोटा करने की सामाजिक प्रवृत्ति दोनों समानांतर चल रही प्रक्रियाएँ हैं। एक ओर सत्ता इतिहास को नए अर्थ देने की कोशिश करती है, दूसरी ओर समाज भाषा को अपनी सुविधा और समय की गति के अनुसार ढालता रहता है। कई बार आधिकारिक नाम बदल जाता है, लेकिन जनस्मृति में पुराना नाम वर्षों तक जीवित रहता है; और कई बार नया नाम भी बोलचाल में बदलकर एक अलग रूप ले लेता है।
इस परिघटना के दूरगामी परिणाम केवल राजनीतिक नहीं, सांस्कृतिक भी हैं। यदि नाम परिवर्तन संवाद, सहमति और व्यापक सामाजिक स्वीकृति के साथ होता है, तो वह नई पहचान गढ़ सकता है। लेकिन यदि वह केवल चुनावी प्रतीक बनकर रह जाए, तो समाज उसे अपनी सुविधा से बदल देता है। कभी पुराने नाम के जरिए, कभी नए नाम के संक्षेप के जरिए, और कभी डिजिटल कोड में ढालकर।
अंतत: नामों की असली ताकत सरकारी गजट में नहीं, बल्कि लोगों की ज़ुबान और स्मृति में होती है। सत्ता नाम घोषित कर सकती है, पर उन्हें जीवित या अप्रासंगिक बनाना समाज के हाथ में होता है और बदलते समय में, यह समाज पहले से कहीं ज्यादा तेज़, डिजिटल और अपने तरीके से रचनात्मक हो चुका है।

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