-सुभाष मिश्र
कई बार मन में यह ख्याल आता है कि यदि चूहे नहीं होते, दीमक नहीं होती, सरकारी दफ्तरों में दैवीय प्रकोप से आग नहीं लगती, आपदा नहीं आती, सूखा नहीं पड़ता तो बहुत सारे सरकारी तंत्र से जुड़े लोगों का क्या होता। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के सुचारू संचालन, सिस्टम को ऊपर से नीचे तक चलाने के लिए चूहे जरूरी है। ये चूहे धर्मनिरपेक्ष, पार्टी निरपेक्ष है। ये सारी व्यवस्थाओं में पाये जाते हैं। इस बार छत्तीसगढ़ के कवर्धा में 7 करोड़ की धान चूहे और दीमक खा गये। धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में हमेशा से चूहे सक्रिय रहे हैं। बहुत बार तो लगता है कि राज्य की स्थापना चूहों को ध्यान में रखकर की गई है। गणेशजी का यह वाहन केवल मोदक नहीं खाता बहुत सारे सरकारी तंत्र को भी कतरता है।
कवर्धा में 7 करोड़ रुपये का धान ‘चूहे-दीमक खा गए यह बयान सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि हमारी सरकारी भाषा, जवाबदेही और तंत्र की आत्मा पर एक तीखा व्यंग्य है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में, जिसे ‘धान का कटोरा कहा जाता है, जहां धान केवल फसल नहीं बल्कि राजनीति, सत्ता और पहचान का आधार है। वहां सरकारी धान का इस तरह गायब हो जाना और उसका दोष चूहों पर डाल देना, एक पूरे सिस्टम की बौद्धिक बेईमानी को उजागर करता है। चूहे सामने आकर अपनी सफाई भी नहीं दे सकते।
तथ्य सरल है और इसलिए असुविधाजनक भी। वर्ष 2024-25 में कवर्धा जिले के बाज़ार चारभाठा और बघर्रा धान संग्रहण केंद्रों में लगभग 7 लाख 99 हजार क्विंटल धान का भंडारण हुआ। जांच में 26 हजार क्विंटल धान की कमी पाई गई। अकेले बाज़ार चारभाठा केंद्र से 22 हजार क्विंटल धान गायब मिला, जिसकी कीमत लगभग 7 करोड़ रुपये आंकी गई। विभागीय नियम कहते हैं कि 2 प्रतिशत से अधिक कमी पर निलंबन, जांच और एफआईआर अनिवार्य है। यहां कमी उससे कहीं अधिक है। इसके बावजूद पहली प्रतिक्रिया यह आई कि मौसम, चूहे, दीमक और कीड़ों ने धान खा लिया। यहीं से सवाल शुरू होते हैं। अगर धान वाकई चूहों और दीमक ने खाया, तो फर्जी आवक-जावक क्यों दर्ज हुई? डैमेज धान के फर्जी बिल किसने बनाए? मजदूरों की फर्जी हाजिरी क्यों लगी? सीसीटीवी कैमरों से छेड़छाड़ किसने की और सबसे अहम यदि सब कुछ प्राकृतिक कारणों से हुआ, तो केंद्र प्रभारी को हटाने की जरूरत क्यों पड़ी? प्रशासन का यह तर्क खुद अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारता है।
कांग्रेस ने इसे बड़ा घोटाला बताया, सरकार ने जांच का आश्वासन दिया। मंत्री अमरजीत भगत का व्यंग्य—’कौन सी प्रजाति के चूहे हैं जो 7 करोड़ का धान खा गए दरअसल यह जनता के मन की आवाज है। सवाल चूहों की प्रजाति का नहीं, संरक्षण का है। चूहे खेतों में भी होते हैं, गोदामों में भी, फर्क इतना है कि खेतों के चूहे किसान की मेहनत खाते हैं और गोदामों के चूहे जनता का हक।
यह पहली बार नहीं है जब धान और चावल पर राजनीति गरमाई हो। पीडीएस व्यवस्था, जिसे कभी देश में प्रथम पुरस्कार मिला, उसी व्यवस्था पर बाद में घोटालों के आरोप लगे, अधिकारी जेल गए। कांग्रेस सरकार पर पीडीएस में 600 करोड़ की गड़बड़ी का आरोप कैग रिपोर्ट में आया। मीडिया रिपोर्ट्स में 5000 करोड़ के कथित चावल घोटाले का जिक्र हुआ, जिस पर भाजपा ने इस्तीफा तक मांगा। सत्ता बदली, आरोपों की भाषा बदली, लेकिन तंत्र की आदतें नहीं बदलीं। धान वही रहा, चूहे वही रहे, सिर्फ रंग बदलते रहे।
हरिशंकर परसाई की रचना ‘चूहा और मैं आज प्रशासनिक फाइलों में उतर आई है। परसाई का चूहा रात की नींद हराम करता है, थोड़ा छोड़ो तो अपने साथी भी बुला लाता है। शरद जोशी की कहावत—’दाने-दाने पर खाने वाले का नाम लिखा है अगर उसमें पता भी लिखा होता, तो गरीबों का राशन सही जगह पहुंच जाता लेकिन हमारे सिस्टम में दानों पर नाम नहीं, सांठगांठ की स्याही लगी होती है।
छत्तीसगढ़ की राजनीति में धान सबसे बड़ा वादा है समर्थन मूल्य, बोनस, रिकॉर्ड खरीदी। हर चुनाव में दल एक-दूसरे से ज्यादा बोनस देने की होड़ लगाते हैं। किसान उम्मीद करता है, सरकार खरीदी का आंकड़ा बढ़ाती है, रिकॉर्ड बनते हैं। लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठता है कि जब पैदावार सीमित है, तो खरीदी रिकॉर्ड कैसे? यही वह धुंध है जिसमें घोटाले पनपते हैं। कभी वजन में, कभी नमी में, कभी आउटसोर्सिंग में, कभी सहकारी समितियों में। आंदोलन होते हैं, बैठकें होती हैं, समझौते होते हैं और चूहे अपना काम करते रहते हैं।
कवर्धा का मामला इसलिए खतरनाक है क्योंकि यह एक कथा गढऩे की कोशिश है, प्राकृतिक नुकसान की कथा ताकि आपराधिक लापरवाही और संभावित भ्रष्टाचार पर परदा डाला जा सके। यदि प्रशासन का तर्क मान लिया जाए तो कल को हर घोटाले का जवाब यही होगा ‘चूहे खा गए। फाइलें गायब हों—दीमक। पैसा नहीं मिले—नमी। सबूत नहीं—मौसम। यह जवाबदेही का अंत है।
उपमुख्यमंत्री का यह कहना कि दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी, स्वागतयोग्यहै। लेकिन कार्रवाई का पैमाना बयान नहीं, एफआईआर है, निलंबन नहीं, चार्जशीट है, जांच नहीं, सजा है। जब तक यह स्पष्ट नहीं होगा कि धान किस रास्ते से गोदाम से बाहर गया या गया भी नहीं तब तक चूहे केवल बहाना रहेंगे।
छत्तीसगढ़ की धान खरीदी केवल आर्थिक प्रक्रिया नहीं, सामाजिक अनुबंध है। किसान पसीना देता है, राज्य भरोसा देता है। उस भरोसे को अगर गोदामों में कुतरा जा रहा है तो यह सिर्फ वित्तीय नुकसान नहीं, लोकतांत्रिक अपराध है। तंत्र में बैठे ‘मोटे चूहे जो फर्जी बिल, फर्जी हाजिरी और फर्जी कहानियां गढ़ते हैं। जब तक ये पहचाने और दंडित नहीं होंगे, तब तक खेतों के चूहों पर आरोप लगाना किसानों के जख्मों पर नमक छिड़कना है।
कवर्धा का सवाल यही है, क्या हम सचमुच मान लें कि 7 करोड़ का धान चूहे खा गए, या यह स्वीकार करें कि समस्या चूहों की नहीं, उस तंत्र की है जो उन्हें पालता है? जवाब जांच से नहीं, नीयत से निकलेगा और नीयत का इम्तिहान अब सरकार, विपक्ष और प्रशासन तीनों का है।
तंत्र के भरोसे फलते-फूलते चूहे मुटाते रहेंगे और धान उगाने वाला किसान कर्ज माफी की बाट जोहता रहेगा।