-सुभाष मिश्र
भारत में जब भी चुनाव नज़दीक आते हैं, तब राजनीति अपने सबसे आसान औज़ार निकाल लेती है धर्म, राष्ट्रवाद और भावनाएं। पश्चिम बंगाल में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले यही खेल एक बार फिर तेज़ी से खेला जा रहा है। इस बार मैदान बना है क्रिकेट और निशाना बने हैं शाहरुख़ ख़ान।
आईपीएल की 16 दिसंबर को हुई नीलामी में शाहरुख़ ख़ान की टीम कोलकाता नाइट राइडर्स ने बांग्लादेशी तेज़ गेंदबाज़ मुस्ताफिज़ुर रहमान को अपनी टीम में शामिल किया। इसके बाद सोशल मीडिया और कुछ राजनीतिक मंचों पर अचानक शोर मच गया, शाहरुख़ ख़ान को ग़द्दार, देशद्रोही और सनातन-विरोधी कहा जाने लगा। तर्क दिया गया कि जब बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले हो रहे हैं, तब एक भारतीय टीम बांग्लादेशी खिलाड़ी को कैसे ले सकती है।
यह सवाल भावनात्मक है, लेकिन ईमानदारी से देखें तो यह राजनीतिक रूप से प्रायोजित है। सबसे पहला और बुनियादी तथ्य यह है कि आईपीएल किसी अभिनेता या फ्रेंचाइज़ी मालिक की निजी मजऱ्ी से नहीं चलता। किन देशों के खिलाड़ी खेल सकते हैं, यह सूची बीसीसीआई तय करती है। पाकिस्तान के खिलाड़ी इस सूची में नहीं हैं, इसलिए वे आईपीएल नहीं खेलते। बांग्लादेश के खिलाड़ी सूची में हैं, इसलिए खेलते हैं। अगर बांग्लादेश से खेलना ही देशद्रोह है, तो फिर सवाल शाहरुख़ ख़ान से नहीं, बीसीसीआई से पूछा जाना चाहिए और बीसीसीआई कोई निजी क्लब नहीं है। उसके संचालन से लेकर नीतिगत फैसलों तक में केंद्र की सत्ता से जुड़े लोगों की सीधी भूमिका है। ऐसे में चयन की अनुमति देकर फिर उसी पर उग्र राष्ट्रवाद का शोर मचाना, दोहरा आचरण नहीं तो और क्या है?
दरअसल, यह पूरा विवाद क्रिकेट का नहीं, बंगाल की राजनीति का है। कोलकाता नाइट राइडर्स का कोलकाता से जुड़ाव, ईडन गार्डन्स में शाहरुख़ ख़ान की मौजूदगी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ उनके सार्वजनिक दृश्य, इन सबको जोड़कर यह संदेश गढ़ा जा रहा है कि बंगाल में हिंदू-विरोधी गठजोड़ सक्रिय है। चुनावी माहौल में यह कथा हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण के लिए बेहद उपयोगी है। विडंबना यह है कि जिन सवालों पर शोर मचाया जा रहा है, उन्हीं सवालों के जवाब सत्ता के व्यवहार में पहले से मौजूद हैं। अगर बांग्लादेश से हर तरह का संबंध तोडऩा ही राष्ट्रवाद है, तो फिर भारत ने बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना को शरण क्यों दी? विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बेगम ख़ालिदा जिय़ा के निधन पर शोक क्यों जताया? झारखंड में उत्पादित बिजली अदाणी समूह के ज़रिये बांग्लादेश को क्यों बेची जा रही है?
साफ़ है कि राष्ट्र केवल भावनाओं से नहीं चलता, हितों से चलता है। व्यापार, कूटनीति और खेल समानांतर चलते हैं, भले ही राजनीतिक बयानबाज़ी कितनी भी आक्रामक क्यों न हो। इस पूरे प्रकरण की सबसे खतरनाक बात यह है कि देशभक्ति को अब प्रमाणपत्र में बदला जा रहा है। कौन देशभक्त है और कौन नहीं, यह फैसला अब सोशल मीडिया ट्रेंड, टीवी डिबेट और चुनावी मंच करने लगे हैं। न अभिनेता सुरक्षित हैं, न खिलाड़ी, न ही खेल।
यह भी गौर करने लायक है कि शाहरुख़ ख़ान को गालियाँ सिफऱ् एक तरफ़ से नहीं मिल रहीं। मुस्लिम कट्टरपंथी तबके का एक हिस्सा भी उन्हें निशाना बना रहा है। यानी शाहरुख़ ख़ान दोनों तरफ़ से गलत साबित किए जा रहे हैं। इससे साफ़ हो जाता है कि मामला धर्म का नहीं, राजनीतिक उपयोगिता का है। 18 दिसंबर को बंगाल में दीपू दास की हत्या और उससे पहले 16 दिसंबर को हुई आईपीएल नीलामी इन दोनों घटनाओं को जोड़कर भावनात्मक विस्फोट खड़ा करने की कोशिश की गई। लेकिन अपराध की जाँच और खेल की नीलामी को जोड़ देना न तो न्याय है, न तर्क, यह सिफऱ् उन्माद है। आईपीएल एक अंतरराष्ट्रीय, व्यावसायिक लीग है। खिलाड़ी किसी देश का प्रतिनिधित्व नहीं करते, फ्रेंचाइज़ी का करते हैं। शाहरुख़ ख़ान न विदेश नीति बनाते हैं, न कूटनीति, न सीमा सुरक्षा संभालते हैं। फिर भी उनसे राष्ट्रवाद का हिसाब माँगा जा रहा है। पश्चिम बंगाल का इतिहास बताता है कि चुनाव के समय धर्म और पहचान की राजनीति ने हमेशा समाज को ज़्यादा नुकसान पहुँचाया है। आज जब राज्य फिर चुनाव की दहलीज़ पर है, तब क्रिकेट और सिनेमा जैसे लोकप्रिय माध्यमों को ज़हर से भरना खतरनाक संकेत है।
देशभक्ति का अर्थ न तो खिलाड़ी की राष्ट्रीयता से तय होता है, न अभिनेता के व्यवसाय से। और अगर हर विदेशी खिलाड़ी को राष्ट्र विरोध की कसौटी पर कसा जाएगा, तो सवाल शाहरुख़ ख़ान का नहीं बचेगा, सवाल यह होगा कि हम कब इतने असुरक्षित हो गए कि खेल भी हमें डराने लगा।