-सुभाष मिश्र
किसान देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। खेतों में पसीना बहाने वाला किसान ही करोड़ों लोगों की थाली तक अनाज पहुंचाता है, लेकिन आज वही किसान बढ़ती महंगाई के सबसे बड़े दबाव में है। खेती, जो कभी ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सबसे मजबूत आधार मानी जाती थी, अब लगातार बढ़ती लागत, महंगी कृषि सामग्री और घटते मुनाफे के कारण चुनौती बनती जा रही है। हालात यह हैं कि किसान फसल उगाने से पहले ही खर्च और नुकसान की चिंता में घिर जाता है।
धान जैसी प्रमुख खरीफ फसल की बात करें तो पिछले कुछ वर्षों में इसकी लागत में भारी इजाफा हुआ है। पहले प्रति एकड़ धान तैयार करने में करीब 15 से 17 हजार रुपए तक खर्च आता था, लेकिन अब यही खर्च बढ़कर 25 हजार रुपए से अधिक पहुंच गया है। यानी किसान को एक ही फसल के लिए डेढ़ गुना से ज्यादा पैसा लगाना पड़ रहा है। दूसरी ओर उपज का उचित मूल्य और बाजार की अनिश्चितता किसान की चिंता को और बढ़ा रही है।
खेती की शुरुआत ही महंगी हो गई है। बीज, खाद, दवाइयां और सिंचाई से लेकर खेत तैयार करने तक हर स्तर पर खर्च बढ़ा है। सबसे बड़ी परेशानी खाद और उर्वरकों की उपलब्धता को लेकर सामने आ रही है। सहकारी समितियों में डीएपी, यूरिया और पोटाश की कमी के कारण किसानों को मजबूरी में निजी बाजार का रुख करना पड़ रहा है। जहां सरकारी व्यवस्था के तहत डीएपी लगभग 1350 रुपए प्रति बोरी उपलब्ध होती है, वहीं बाजार में यही खाद करीब 2500 रुपए तक पहुंच जाती है। यूरिया और अन्य कृषि सामग्री भी बाजार में महंगी कीमत पर खरीदनी पड़ रही है। इससे सीधे तौर पर किसान की उत्पादन लागत बढ़ रही है।
खेती में मशीनों की बढ़ती भूमिका ने भी खर्च बढ़ाया है। पहले जहां किसान पारंपरिक तरीकों से खेती करता था, अब मजदूरों की कमी और समय बचाने के लिए मशीनों पर निर्भरता बढ़ी है, लेकिन डीजल-पेट्रोल की बढ़ती कीमतों ने ट्रैक्टर से जुताई, रोपाई और हार्वेस्टिंग तक हर काम को महंगा कर दिया है। पिछले खरीफ सीजन में प्रति एकड़ हार्वेस्टिंग का खर्च करीब दो हजार रुपए था, जो अब बढ़कर ढाई हजार रुपए तक पहुंच गया है। यह अतिरिक्त बोझ सीधे किसान की लागत में जुड़ रहा है।
रोपाई की मजदूरी भी किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। किसानों के अनुसार, पहले प्रति एकड़ रोपाई में करीब दो हजार रुपए तक खर्च आता था, लेकिन अब यही खर्च बढ़कर 7 से 8 हजार रुपए तक पहुंच गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरी दर बढऩे के साथ ही खेती का पारंपरिक मॉडल भी बदल रहा है। छोटे किसान, जिनके पास सीमित जमीन और सीमित संसाधन हैं, उनके लिए यह खर्च उठाना लगातार मुश्किल होता जा रहा है।
समस्या केवल लागत बढऩे तक सीमित नहीं है। किसान की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि इतनी लागत लगाने के बाद भी उसकी कमाई निश्चित नहीं होती। मौसम की मार, सूखा, अतिवृष्टि, कीट प्रकोप या किसी अन्य प्राकृतिक आपदा की स्थिति में किसान की पूरी मेहनत पर पानी फिर जाता है। कई बार तो किसान अपनी लगाई हुई लागत भी वापस नहीं निकाल पाता। ऐसे हालात में उसे कर्ज लेना पड़ता है और यही कर्ज धीरे-धीरे उसके आर्थिक संकट को और गहरा कर देता है।
खेती की बढ़ती लागत का असर अब प्रदेश के कृषि क्षेत्र पर भी दिखाई देने लगा है। जब खेती में निवेश लगातार बढ़े और मुनाफा कम होता जाए, तो छोटे किसान खेती से दूरी बनाने लगते हैं। नई पीढ़ी भी खेती को सुरक्षित रोजगार नहीं मान रही। यही कारण है कि कई क्षेत्रों में खेती का रकबा धीरे-धीरे घट रहा है। यह सिर्फ किसानों की समस्या नहीं है, बल्कि भविष्य की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ा बड़ा सवाल है।
सरकारें किसानों की आय दोगुनी करने की बात करती रही हैं, लेकिन इसके लिए सिर्फ योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं होगा। जरूरी है कि खेती की वास्तविक लागत को ध्यान में रखते हुए नीतियां बनाई जाएं। खाद और उर्वरकों की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी, बाजार में मनमानी कीमतों पर नियंत्रण करना होगा और किसानों को उनकी उपज का ऐसा मूल्य देना होगा जिससे खेती लाभ का सौदा बन सके।
किसान को सहायता की जरूरत जरूर है, लेकिन उससे ज्यादा जरूरत है एक ऐसी व्यवस्था की जिसमें किसान अपनी मेहनत का सम्मानजनक मूल्य पा सके। अगर खेती लगातार महंगी होती गई और किसान की आमदनी उसी गति से नहीं बढ़ी, तो आने वाले समय में छोटे और सीमांत किसानों के सामने खेती छोडऩे की नौबत आ सकती है। यह संकट केवल खेतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे समाज और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगा।
आज जरूरत है कि किसान को केवल चुनावी वादों का विषय न बनाया जाए, बल्कि उसकी वास्तविक समस्याओं—बढ़ती लागत, महंगे संसाधन और अनिश्चित आय का स्थायी समाधान निकाला जाए। तभी खेती बच सकेगी और किसान भी सम्मान के साथ अपने खेतों से जुड़ा रह सकेगा।