‘राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट। अंतकाल पछताएगा, जब प्राण जाएंगे छूट।’
सुभाष मिश्र
कबीर का यह दोहा आध्यात्मिक चेतना का संदेश था। इसका आशय यह था कि जीवन रहते हुए ईश्वर के नाम, सत्य, मर्यादा और सदाचार को आत्मसात कर लो, क्योंकि मृत्यु के बाद अवसर नहीं मिलेगा। लेकिन विडंबना देखिए कि भारत के मंदिरों से जुड़े अधिकांश भक्तों और कर्मचारी ने इसका अर्थ अपने हिसाब से तय कर लिया कि राम के नाम पर जो भी चंदा और दान आया है, उसे मंदिर के भक्त लूट सकते हैं और वह इसकी लूट में लग गए। मंदिर से जुड़े कर्मचारी-भक्त रातों-रात अमीर हो गए हैं। लोग कहते हैं कि अब राम को ही लूट रहे हैं, क्योंकि जो चंदा और दान आया था वह राम के लिए आया था। राम के कुछ काम आता है, उसके पहले भक्तों राम का धन लूट लिया। हमारे शहर के पुजारी जी का कहना है यदि पुजारियों और भक्तों ने राम के नाम का आया पैसा लूट भी लिया तो क्या गलत किया? राम भगवान क्या पैसों को लेकर बाजार में खरीदारी करने जाते? अब राम नाम की लूट आध्यात्मिक नहीं, बल्कि आर्थिक होती दिखाई दे रही है। धर्म के नाम पर, आस्था के नाम पर और ईश्वर के नाम पर चल रही लूट के नए-नए रूप लगातार सामने आ रहे हैं।
अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के दानपात्रों से राशि चोरी होने के आरोपों की जांच के लिए उत्तर प्रदेश धर्म प्रधान सरकार को एसआईटी गठित करनी पड़ी है। प्रयागराज के प्रसिद्ध हनुमत निकेतन मंदिर के दानपात्रों में नकली नोट मिलने का मामला सामने आया है। इससे पहले तिरुपति मंदिर के प्रसाद को लेकर विवाद खड़ा हुआ था। वहां पर नकली घी से लड्डू बनाए जा रहे थे। वहां के पुजारियों का भी तर्क बिल्कुल उचित था कि लड्डू कोई भगवान तो खा नहीं रहे थे, जो उनकी तबीयत खराब होती। लड्डू तो भक्त खा रहे थे और एक लड्डू में भक्त कौन से मर जाते हैं?
दरअसल, जब हर चीज बाजार के हवाले हो रही है तो धर्म और भक्ति को भी इस दलदल में गिरना ही था। इन घटनाओं को अलग-अलग मामलों के रूप में देखने के बजाय एक व्यापक संकट के रूप में देखने की आवश्यकता है। यह संकट केवल वित्तीय अनियमितताओं का नहीं, बल्कि लोगों की आस्था पर चोट का है। धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि धर्म का मूल उद्देश्य मनुष्य को लोभ, मोह और अहंकार से दूर करना है। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और चर्च जैसे धार्मिक स्थल मनुष्य को आत्मशुद्धि और नैतिकता का मार्ग दिखाने के लिए बने थे। लेकिन नासमझ जनता को मालूम नहीं कि आत्मा की शुद्धि और नैतिकता का मार्ग सामान्य लोगों के लिए है। मंदिरों के कर्मचारी और भक्त हैं, जो सीधे भगवान के संपर्क में हैं। उनके लिए शुद्धता, नैतिकता और ईमानदारी अलग होती है। अब मंदिरों के आसपास बड़े पैमाने पर दुकानें बनने लगी हैं। धर्म और भक्ति का बाजार सजा हुआ है। इन स्थलों के आसपास धन, व्यवसाय और सत्ता का जाल बुनने लगा है। धर्म का स्वरूप बदलने लगा है। भक्ति की जगह बाजार और श्रद्धा की जगह लोभ लालच का गणित हावी होने लगा है। चंदे और दान का पैसा गिनने वाले कर्मचारी अपना गणित अलग लगाते हैं। वे इसे धर्म के नाम पर बेईमानी, भ्रष्टाचार और अनैतिकता नहीं मानते हैं। कुछ कहा जाए तो वे खुद कहते हैं कि राम के नाम पर लूट की छूट मिली हुई है। संत का गए हैं कि, ‘राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट!’ जब संतों ने कह दिया तो फिर क्या दिक्कत! हम लूट सकते हैं। हमारे पास लूटने की सुविधा है। अवसर है, ताकत है।
यह सच है कि बड़े मंदिरों में करोड़ों रुपये का चढ़ावा आता है। महाकाल मंदिर में एक वर्ष में 65 करोड़ रुपये के लड्डू प्रसाद की बिक्री इसका उदाहरण है। इसमें कोई बुराई नहीं है। यदि श्रद्धालु प्रसाद खरीद रहे हैं, मंदिर प्रशासन गुणवत्ता और पारदर्शिता बनाए रख रहा है तथा उस धन का उपयोग धार्मिक और सामाजिक कार्यों में हो रहा है, तो यह धार्मिक अर्थव्यवस्था का सकारात्मक पक्ष माना जा सकता है। यह सब सुनने में बहुत भला लगता है। समस्या वहां शुरू होती है, जहां धन का हिसाब गड़बड़ हो जाता है। जहां चढ़ावे पर कुछ लोगों का लोभी भक्ति और आस्था का कब्जा हो जाता है। मंदिर का रुपया हड़पने वाले कर्मचारियों का कथित कथन है कि हमने भगवान की सेवा की है तो यह मेवा मिला है।
मंदिरों में अब हर चीज के लिए पैसा लगता है। कहा जाता है कि प्रसाद की दुकानें मंदिर के पुजारियों या महंतों के मनपसंद ठेकेदारों के कब्जे में होती हैं। कहीं वीआईपी दर्शन की अलग व्यवस्था है तो कहीं सामान्य भक्त घंटों धक्के खाते हैं। कई जगहों पर प्रसाद और पूजा सामग्री की ऐसी एकाधिकार व्यवस्था बना दी गई है कि श्रद्धालु को मजबूरी में निर्धारित दुकानों से ही सामान खरीदना पड़ता है। यह स्थिति किसी आध्यात्मिक केंद्र की नहीं, बल्कि एक नियंत्रित बाजार की है। विडंबना यह भी है कि जो लोग भक्तों को ईश्वर के भय और कर्मफल का पाठ पढ़ाते हैं, उन्हीं धार्मिक संस्थाओं में भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और चंदे और दान की कथित खुली लूट है। अब ये आरोप आम जन तक फैल गए हैं। लेकिन इस बात का जवाब कौन देगा कि यदि मंदिर के दानपात्र से पैसा चोरी हो रहा है, यदि नकली नोट चढ़ावे के नोट से बदले जा रहे हैं। यदि धार्मिक ट्रस्टों की संपत्तियों पर कथित बाहुबलियों के कब्जे हो रहे हैं, तो यह कानून का मामला तो है ही लेकिन यह नैतिक पतन का चरम है जो धर्म के संरक्षण के दावे करने वालों के भीतर भी घर कर चुका है।
एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि मंदिरों में आने वाला धन आखिर किसके लिए है? हिंदू संगठनों का एक वर्ग लंबे समय से यह मांग करता रहा है कि मंदिरों की आय का उपयोग हिंदू समाज के उत्थान, शिक्षा, स्वास्थ्य और सांस्कृतिक संरक्षण में होना चाहिए। दूसरी ओर कई मंदिरों की संपत्तियों और आय पर सरकारी नियंत्रण को लेकर भी बहस होती रही है। लेकिन इस बहस का मूल प्रश्न पारदर्शिता होना चाहिए। चाहे प्रबंधन सरकार करे, ट्रस्ट करे या समाज, हर रुपये का हिसाब सार्वजनिक होना चाहिए, क्योंकि यह धन किसी व्यक्ति का नहीं, करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का धन है। धर्म का अर्थ को लूट का पर्याय होने से बचाना होगा। राम त्याग के प्रतीक हैं, कृष्ण कर्म के, बुद्ध करुणा के और महावीर अहिंसा के। इन महापुरुषों ने संग्रह नहीं, समर्पण का मार्ग दिखाया। यदि उनके नाम पर चलने वाली संस्थाएं ही संग्रह, लोभ, लालच, लूट और लाभ के केंद्र बन जाएं, तो यह उनके आदर्शों के साथ अन्याय है।
करोड़ों लोगों की श्रद्धा धार्मिक संस्थाओं से उठ जाएंगी। आज आवश्यकता मंदिरों, मठों और धार्मिक संस्थाओं को बदनाम करने की नहीं, बल्कि उन्हें अधिक जवाबदेह बनाने की है। अधिकांश श्रद्धालु ईश्वर को कुछ पाने के लिए नहीं, बल्कि कृतज्ञता और विश्वास के भाव से चढ़ावा चढ़ाते हैं, इसलिए उस चढ़ावे की रक्षा करना, उसका पारदर्शी उपयोग सुनिश्चित करना और धर्मस्थलों को भ्रष्टाचार से मुक्त रखना समाज और सरकार दोनों की जिम्मेदारी है। यदि धर्म के नाम पर चल रही आर्थिक लूट को नहीं रोका गया, तो सबसे बड़ा नुकसान किसी मंदिर, ट्रस्ट या सरकार का नहीं होगा। सबसे बड़ा नुकसान उस आस्था का होगा, जो सदियों से भारतीय समाज की आत्मा रही है।