युद्ध की आग, ऊर्जा का संकट और हिलती वैश्विक अर्थव्यवस्था

-सुभाष मिश्र

19 मार्च 2026 को भारतीय शेयर बाजार में आई 22 महीनों की सबसे बड़ी गिरावट केवल एक वित्तीय घटना नहीं है, बल्कि यह उस गहरे वैश्विक असंतुलन का संकेत है, जो आज पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले रहा है। BSE Sensex का 2497 अंकों का गोता लगाकर 74,207 पर बंद होना और Nifty 4 50 का 776 अंक टूटकर 23,002 पर आ जाना यह बताता है कि बाजार केवल आंकड़ों से नहीं, बल्कि आशंकाओं से संचालित हो रहा है। एक ही दिन में निवेशकों की 13 लाख करोड़ रुपए की संपत्ति का साफ हो जाना इस बात का प्रमाण है कि दुनिया इस समय आर्थिक रूप से कितनी संवेदनशील स्थिति में खड़ी है।
इस गिरावट की जड़ें केवल घरेलू कारणों में नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव में छिपी हैं—विशेषकर Iran, Israel और United States के बीच बनती युद्ध जैसी स्थिति। यह संघर्ष अब सीमित सैन्य टकराव नहीं रह गया है, यह ऊर्जा संसाधनों पर सीधा प्रहार बनता जा रहा है। फारस की खाड़ी, जो वैश्विक तेल और गैस सप्लाई का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र है, वहीं अब युद्ध की आंच सबसे अधिक महसूस की जा रही है।
कच्चे तेल की कीमतों का 114 डॉलर प्रति बैरल के पार जाना और भारतीय बास्केट का 146 डॉलर तक पहुंचना केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं है, यह आने वाले समय की चेतावनी है। ऊर्जा, जो आधुनिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, जब युद्ध का शिकार बनने लगे, तो उसका असर हर देश, हर उद्योग और हर घर तक पहुंचता है। भारत जैसे आयात-निर्भर देश के लिए यह स्थिति और भी गंभीर है।
यह समझना जरूरी है कि जब तेल महंगा होता है, तो केवल पेट्रोल-डीजल की कीमत नहीं बढ़ती, बल्कि पूरी सप्लाई चेन महंगी हो जाती है। परिवहन से लेकर उत्पादन तक हर स्तर पर लागत बढ़ती है, जिससे महंगाई बढ़ती है और कंपनियों का मुनाफा घटता है। यही कारण है कि निवेशक जोखिम से बचने के लिए बाजार से पैसा निकालकर सोना-चांदी जैसी सुरक्षित संपत्तियों की ओर भाग रहे हैं।
लेकिन इस संकट का सबसे भयावह पहलू केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामरिक और मानवीय है। जिस तरह से गैस फील्ड और तेल भंडार युद्ध की आग में जल रहे हैं, वह आने वाले समय के लिए एक गंभीर संकेत है। यदि यह सिलसिला जारी रहा, तो दुनिया केवल महंगाई या मंदी ही नहीं, बल्कि ऊर्जा के वास्तविक अभाव का सामना कर सकती है। यह स्थिति 1970 के दशक के तेल संकट से भी कहीं अधिक गंभीर हो सकती है।
अरब देशों में बढ़ता तनाव इस संकट को और जटिल बना रहा है। United Arab Emirates जैसे देशों में बड़ी संख्या में भारतीय काम करते हैं और वहां भारतीय निवेश भी भारी मात्रा में है। ऐसे में यदि युद्ध का विस्तार खाड़ी देशों तक होता है, तो इसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था, प्रवासी भारतीयों और विदेशी मुद्रा प्रवाह पर पड़ेगा। यह केवल एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा नहीं रहेगा, बल्कि भारत के भीतर भी सामाजिक और आर्थिक अस्थिरता पैदा कर सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम में एक और खतरनाक प्रवृत्ति उभर रही है—मुस्लिम देशों के भीतर ही विभाजन और टकराव। यदि Iran और अन्य अरब देशों के बीच सीधा संघर्ष होता है, तो यह क्षेत्रीय युद्ध को वैश्विक संकट में बदल सकता है। अमेरिका भले ही भौगोलिक रूप से दूर हो, लेकिन उसकी रणनीतिक भूमिका इस संघर्ष को और व्यापक बना रही है।
भारत की स्थिति इस पूरे परिदृश्य में बेहद संवेदनशील है। एक तरफ सरकार ‘हमें युद्ध नहीं, बुद्धि चाहिए की नीति पर जोर दे रही है, वहीं दूसरी तरफ बाजार, उद्योग और आम नागरिकों में बढ़ती चिंता यह संकेत दे रही है कि केवल कूटनीतिक बयान पर्याप्त नहीं होंगे। ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति विविधीकरण और रणनीतिक भंडारण जैसे मुद्दों पर तत्काल और ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि युद्ध लंबा खिंचता है और तेल-गैस के भंडार लगातार नष्ट होते हैं, तो दुनिया एक अभूतपूर्व ऊर्जा संकट की ओर बढ़ सकती है। यह संकट केवल आर्थिक नहीं होगा, बल्कि खाद्य सुरक्षा, रोजगार और सामाजिक स्थिरता तक को प्रभावित करेगा। भारत में अभी से पैनिक की स्थिति बन रही है—सरकार लोगों से घबराहट में खरीदारी न करने की अपील कर रही है, लेकिन बाजार का मनोविज्ञान अक्सर तर्क से नहीं, डर से संचालित होता है।
आज जरूरत इस बात की है कि वैश्विक शक्तियां इस संघर्ष को और भड़काने की बजाय उसे रोकने की दिशा में काम करें। Iran को भी यह समझना होगा कि यदि यह युद्ध खाड़ी देशों तक फैलता है, तो इसका नुकसान केवल उसके विरोधियों को नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को होगा और अंतत: उसे स्वयं भी इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।
यह समय युद्ध की राजनीति का नहीं, बल्कि शांति की कूटनीति का है। क्योंकि यदि ऊर्जा के स्रोत ही युद्ध की भेंट चढ़ गए, तो आने वाला संकट केवल बाजारों की गिरावट तक सीमित नहीं रहेगा, वह पूरी मानव सभ्यता के सामने एक गंभीर चुनौती बनकर खड़ा होगा।

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