धर्म, डर और विधेयक: छत्तीसगढ़ में कानून से ज्यादा संदेश क्यों हो गया है जरूरी

-सुभाष मिश्र

छत्तीसगढ़ की विधानसभा में धर्म स्वातंत्र्य विधेयक एक बार फिर पेश होने जा रहा है। पहली नजर में यह एक सामान्य विधायी प्रक्रिया लग सकती है, लेकिन थोड़ा ठहरकर देखें तो यह केवल कानून बनाने की कोशिश नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक संकेत है। क्योंकि यही वह विधेयक है, जिसे पहले भी पारित किया जा चुका है और जो वर्षों से राजभवन और राष्ट्रपति भवन की फाइलों में अटका हुआ है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब पुराना कानून ही लागू नहीं हो पाया, तो उसे फिर से लाने की इतनी जल्दी क्यों है।
इस प्रश्न का उत्तर छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचलों में हाल के घटनाक्रमों में छिपा हुआ दिखाई देता है। बस्तर और खासकर कांकेर जैसे क्षेत्रों में धर्मांतरण को लेकर जिस तरह के विवाद, सामाजिक तनाव और टकराव सामने आए हैं, उन्होंने इस मुद्दे को फिर से राजनीतिक केंद्र में ला खड़ा किया है। कई गांवों में समुदायों के बीच खिंचाव, बहिष्कार जैसी स्थितियाँ बनीं, और यह साफ दिखा कि यह केवल व्यक्तिगत आस्था का मामला नहीं रह गया है, बल्कि सामाजिक संतुलन को प्रभावित करने वाला प्रश्न बन चुका है। सरकार इस पूरे परिदृश्य को एक चेतावनी की तरह देख रही है और यह संदेश देना चाहती है कि धर्म परिवर्तन अब बिना नियमन के नहीं होगा।
इसी कड़ी में ‘घर वापसीÓ अभियान भी उल्लेखनीय है, जो पिछले कुछ वर्षों में आदिवासी क्षेत्रों में सक्रिय रूप से चलाया गया। इस अभियान को चलाने वाले संगठनों का दावा रहा है कि वे लोगों को उनके ‘मूल धर्मÓ में वापस ला रहे हैं, जबकि आलोचकों का कहना है कि यह भी उतना ही संगठित और दबावपूर्ण हस्तक्षेप है जितना कि कथित धर्मांतरण। कई जगहों पर इस अभियान ने सामाजिक विभाजन को और गहरा किया है, जहां एक ही गांव में दो अलग-अलग पहचानें खड़ी हो गईं। यह स्थिति बताती है कि धर्म का प्रश्न अब केवल विश्वास का नहीं, बल्कि पहचान, राजनीति और शक्ति संतुलन का भी हिस्सा बन चुका है।
यहीं पर सरकार की रणनीति समझ में आती है। धर्म स्वातंत्र्य विधेयक को फिर से लाना एक तरह से यह संदेश देना है कि राज्य इस पूरे मसले पर निष्क्रिय नहीं है। यह एक मनोवैज्ञानिक हस्तक्षेप भी है लोगों में यह भावना पैदा करना कि जो भी धर्म परिवर्तन की गतिविधियों में संलग्न हैं, वे कानून की नजर में हैं। लेकिन यह भी उतना ही जरूरी सवाल है कि क्या कानून के जरिए इस तरह के जटिल सामाजिक मुद्दों को नियंत्रित किया जा सकता है, या इससे तनाव और बढऩे का खतरा है।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि राज्य की विधानसभाओं द्वारा पारित नौ महत्वपूर्ण विधेयक आज भी लंबित हैं, जिन पर कोई राजनीतिक उतावलापन नजर नहीं आता। आरक्षण संशोधन विधेयक, जो सामाजिक न्याय का आधार है, अब भी स्वीकृति की प्रतीक्षा में है और हजारों युवाओं का भविष्य उससे जुड़ा हुआ है। कृषि कानूनों के राज्यीय संशोधन, जो किसानों के लिए वैकल्पिक रास्ता तैयार कर सकते थे, अधर में हैं। विश्वविद्यालयों में कुलपति नियुक्ति से जुड़ा संशोधन, जो राज्य और राजभवन के अधिकारों के संतुलन का प्रश्न था, अभी तक निर्णय का इंतजार कर रहा है। चिटफंड निवेशकों की सुरक्षा से जुड़ा विधेयक, जो सीधे आम लोगों की गाढ़ी कमाई से जुड़ा है, वह भी आगे नहीं बढ़ पा रहा।
इन सभी विधेयकों की चुप्पी के बीच धर्म स्वातंत्र्य विधेयक का शोर यह संकेत देता है कि राजनीति अब प्राथमिकताएँ चुन रही है और वह भी उन मुद्दों की, जिनका प्रभाव भावनाओं पर ज्यादा और नीतियों पर कम पड़ता है। यह कहना गलत नहीं होगा कि जहां बहस आसान और प्रभाव तेज हो, वहीं राजनीतिक ऊर्जा केंद्रित हो रही है।
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस पूरे मुद्दे को राजनीतिक करार दिया है और यह सवाल उठाया है कि जब पहले से पारित विधेयक लंबित हैं, तो नए सिरे से वही प्रस्ताव लाने का क्या औचित्य है। उनका यह तर्क राजनीतिक जरूर है, लेकिन पूरी तरह निराधार भी नहीं कहा जा सकता। दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट भी इस बात की ओर संकेत कर चुका है कि विधेयकों को अनिश्चितकाल तक लंबित रखना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अनुकूल नहीं है, फिर भी व्यवहार में यह स्थिति लगातार बनी हुई है।
छत्तीसगढ़ की यह स्थिति दरअसल एक बड़े राष्ट्रीय परिदृश्य की झलक है, जहां धर्म, कानून और राजनीति एक-दूसरे में इस तरह उलझ गए हैं कि उनकी सीमाएं धुंधली होती जा रही हैं। धर्म स्वातंत्र्य विधेयक का फिर से आना यह दिखाता है कि कानून अब केवल शासन का औजार नहीं रह गया है, बल्कि वह राजनीतिक संदेश देने का माध्यम भी बन चुका है। और जब कानून संदेश बनने लगे, तो यह देखना जरूरी हो जाता है कि उस संदेश का असर समाज को जोडऩे का होगा या और ज्यादा विभाजित करने का।

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