पांच राज्यों के चुनाव: किसकी शह, किसकी मात?

-सुभाष मिश्र

देश में एक बार फिर लोकतांत्रिक उत्सव की शुरुआत हो गई है। इलेक्शन कमीशन आफ इंडिया ने पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव की घोषणा कर दी है। चुनाव कार्यक्रम के अनुसार पश्चिम बंगाल में दो चरणों—23 और 29 अप्रैल—को मतदान होगा, जबकि असम, केरल और पुडुचेरी में 9 अप्रैल को तथा तमिलनाडु में 23 अप्रैल को एक ही चरण में मतदान कराया जाएगा। इन सभी राज्यों के चुनाव परिणाम 5 मई को घोषित किए जाएंगे।
चुनाव आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि चुनाव निष्पक्ष, शांतिपूर्ण और पारदर्शी तरीके से कराना उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। पिछले कुछ समय से आयोग की निष्पक्षता को लेकर राजनीतिक बहस तेज रही है। मामला सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया तक भी पहुंचा और विपक्षी दलों ने चुनाव आयुक्तों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए अविश्वास की स्थिति पैदा करने की कोशिश की। ऐसे में इन चुनावों को केवल राज्यों की सत्ता का संघर्ष नहीं, बल्कि चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता की परीक्षा के रूप में भी देखा जा रहा है।
अगर इन राज्यों के राजनीतिक समीकरणों को देखें तो हर राज्य का अपना अलग राजनीतिक परिदृश्य है। पश्चिम बंगाल में मुख्य मुकाबला ममता बैनर्जी की आल इंडिया तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच माना जा रहा है। ममता बनर्जी लंबे समय से राज्य की सत्ता में हैं और अपने आक्रामक राजनीतिक तेवरों के लिए जानी जाती हैं। हाल के महीनों में उन्होंने केंद्र सरकार के खिलाफ कई बार सड़क से लेकर दिल्ली तक आंदोलन का रास्ता अपनाया है। चुनाव की घोषणा से ठीक पहले उन्होंने राज्य में पुजारियों और मुस्लिम धार्मिक कर्मियों के मानदेय में बढ़ोतरी जैसी घोषणाएँ भी की हैं, जो चुनावी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही हैं। इसी क्रम में पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस बार मतदाता सूची से जुड़े तथाकथित एसएआर का मुद्दा भी काफी गरमाया हुआ है। ममता बनर्जी लगातार आरोप लगा रही हैं कि लगभग 1 करोड़ 20 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं, जिनमें से करीब 60 लाख नाम जानबूझकर काटे गए हैं। उनका तर्क है कि पिछले चुनाव में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच मतों का अंतर लगभग 40-45 लाख के आसपास था, इसलिए विपक्ष को कमजोर करने के लिए यह कदम उठाया गया है। इसी मुद्दे को लेकर वह लगातार सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर रही हैं और चुनाव की घोषणा के बाद भी उनकी रैलियां जारी हैं। हालांकि ज्ञानेश कुमार ने इस आरोप का परोक्ष जवाब देते हुए कहा है कि आयोग राजनीतिक दलों की बयानबाजी में नहीं पड़ेगा, लेकिन जो भी कानून तोड़ेगा उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। उनका कहना है कि आयोग ने यह सुनिश्चित किया है कि 18 वर्ष से अधिक आयु के सभी भारतीय नागरिक, जिन्हें मतदान का अधिकार है, उन्हें मताधिकार से वंचित न किया जाए।
असम में स्थिति कुछ अलग है। यहां Himanta Biswa Sarma के नेतृत्व में भाजपा की सरकार है, जो पहले कांग्रेस में रहे और बाद में भाजपा में शामिल होकर राज्य की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने लगे। असम की राजनीति में स्थानीय बनाम बाहरी, नागरिकता और पहचान के सवाल लंबे समय से प्रभावी मुद्दे रहे हैं। इसलिए यहां चुनाव केवल विकास के सवाल पर नहीं, बल्कि पहचान और अस्मिता की राजनीति पर भी लड़ा जाएगा।
केरल की राजनीति परंपरागत रूप से दो बड़े गठबंधनों के बीच घूमती रही है—एक ओर वामपंथी दलों का मोर्चा, जिसका नेतृत्व कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया करती है, और दूसरी ओर कांग्रेस के नेतृत्व वाला संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा। भाजपा लगातार इस राज्य में अपनी राजनीतिक जमीन बनाने की कोशिश कर रही है। हाल के वर्षों में उसे कुछ स्थानीय स्तर की सफलताएँ मिली हैं, जिससे पार्टी को उम्मीद है कि वह अपने वोट आधार को और मजबूत कर सकेगी।
तमिलनाडु की राजनीति का चरित्र भी अलग है। यहां मुख्य मुकाबला क्षेत्रीय दलों के बीच होता है और राष्ट्रीय दलों की भूमिका प्राय: सहायक की रहती है। द्रविड़ मुनेत्री कड़ंगम और आल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कंगड़म के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा लंबे समय से राज्य की राजनीति को दिशा देती रही है। वहीं पुडुचेरी में फिलहाल राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए की सरकार है, इसलिए वहां भी सत्ता बनाए रखने और उसे चुनौती देने की राजनीति दिखाई देगी।
इन चुनावों को कई राजनीतिक विश्लेषक आगामी लोकसभा चुनावों के पहले एक प्रकार का सेमीफाइनल भी मान रहे हैं। खास तौर पर पश्चिम बंगाल पर पूरे देश की नजर रहेगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लगातार दौरे और ममता बनर्जी की आक्रामक चुनावी रणनीति ने इस राज्य के चुनाव को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया है।
हालांकि इस बार चुनाव ऐसे समय हो रहे हैं जब वैश्विक स्तर पर भी तनाव का माहौल है। मध्य पूर्व में बढ़ते संघर्ष और ईरान से जुड़ी खबरें लगातार अंतरराष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित कर रही हैं। ऐसे समय में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या वैश्विक संकटों की छाया इन चुनावों पर पड़ेगी या फिर मतदाता स्थानीय मुद्दों—रोजगार, महंगाई, विकास और सामाजिक संतुलन—को ही प्राथमिकता देंगे।
दरअसल भारतीय लोकतंत्र की यही खासियत है कि वैश्विक हलचलों के बीच भी उसकी राजनीतिक धड़कन अक्सर स्थानीय सरोकारों से संचालित होती है। इसलिए आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इन पांच राज्यों के मतदाता किसे शह देते हैं और किसे मात। इन चुनावों के नतीजे न केवल राज्यों की सत्ता का फैसला करेंगे, बल्कि देश की राष्ट्रीय राजनीति की दिशा का भी संकेत दे सकते हैं।

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