-सुभाष मिश्र
शहरों में बढ़ते यातायात के दबाव को कम करने के लिए सरकारें लगातार नई सडक़ें बना रही हैं, पुराने मार्गों का चौड़ीकरण कर रही हैं और फ्लाईओवर तथा ओवरब्रिज का निर्माण कर रही हैं। इन निर्माण कार्यों के दौरान महीनों तक लोग धूल, जाम और असुविधा झेलते हैं, लेकिन वे यह सोचकर धैर्य रखते हैं कि जब काम पूरा होगा तो यातायात सुगम हो जाएगा और रोज़मर्रा की परेशानियों से राहत मिलेगी। छत्तीसगढ़ सरकार ने भी इसी सोच के साथ रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग सहित कई शहरों में पुल, फ्लाईओवर और सडक़ चौड़ीकरण के लिए बजट में 9451 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है। राजधानी रायपुर में भी कई महत्वपूर्ण परियोजनाएँ प्रस्तावित हैं—मोवा से सेरीखेड़ी और लाभांडी से सड्डू मार्ग का विस्तार, भनपुरी चौक फ्लाईओवर, शारदा चौक से तात्यापारा तक फ्लाईओवर, वीआईपी रोड पर फुट ओवरब्रिज, अशोका रतन से कोया कचना तक पुल और खारुन नदी पर हाई-लेवल ब्रिज जैसी योजनाएँ इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं।
राजधानी होने के कारण रायपुर में प्रशासनिक, शैक्षणिक और व्यावसायिक गतिविधियों का दबाव स्वाभाविक रूप से अधिक है। लगभग 25 लाख की आबादी वाले इस शहर में हर दिन हजारों वाहन सडक़ों पर उतरते हैं। इसी कारण शहर में एक साथ सात नए ओवरब्रिज बनाने की योजना बनाई गई है ताकि कालीबाड़ी चौक, फुंडहर चौक, अमलीडीह, मोवा और भनपुरी जैसे इलाकों में लगने वाले जाम से राहत मिल सके। अधिकारियों का दावा है कि इन परियोजनाओं के पूरा होने से लोगों के रोज़ाना 15-20 मिनट तक बचेंगे और यातायात का दबाव कम होगा।
लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल सडक़ें चौड़ी कर देने और फ्लाईओवर बना देने से समस्या सचमुच हल हो जाएगी? वास्तविकता यह है कि हमारे शहरों में सडक़ें जितनी तेजी से बनती हैं, उससे कहीं अधिक तेजी से उन पर अतिक्रमण भी हो जाता है। सडक़ चौड़ी होते ही कुछ ही दिनों में उसकी किनारों पर दुकानें सज जाती हैं, फुटपाथों पर ठेले लग जाते हैं, नालियों के ऊपर अस्थायी निर्माण हो जाता है और सडक़ का बड़ा हिस्सा वाहनों की पार्किंग में बदल जाता है। नतीजा यह होता है कि जिस सडक़ को यातायात के लिए बनाया गया था, वह धीरे-धीरे निजी उपयोग का हिस्सा बन जाती है।
रायपुर का जीई रोड इसका एक जीवंत उदाहरण है। तात्यापारा से ब्राह्मणपारा तक वर्षों से सडक़ चौड़ीकरण की चर्चा होती रही, मुआवजे और हटाने की योजनाएँ बनती रहीं, लेकिन अतिक्रमण हटाने की ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी। अब समाधान के रूप में एक संकरे ओवरब्रिज की बात सामने आ रही है। यह स्थिति कई सवाल खड़े करती है—क्या शहर के मास्टर प्लान में सडक़ की चौड़ाई पहले से तय नहीं होती? अगर तय होती है तो फिर उस पर लगातार कब्ज़ा कैसे हो जाता है? और अगर कब्ज़ा होता है तो उसे हटाने की राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छा शक्ति क्यों नहीं दिखती?
इसी तरह कचना क्षेत्र में नई बसाहट तेजी से बढ़ रही है। शंकर नगर से कचना की ओर बनने वाले ओवरब्रिज और नई सडक़ों के आसपास अभी से अतिक्रमण शुरू हो गया है। कहीं सडक़ के किनारे दुकानें खड़ी हो रही हैं, कहीं अस्थायी ढांचे बन रहे हैं और कहीं सरकारी लापरवाही से सडक़ को ही टेढ़ा-मेढ़ा बनाकर छोड़ दिया गया है। कई जगह ऐसा लगता है मानो सडक़ें सीधी और सुव्यवस्थित बनाने की बजाय किसी पहाड़ी-पथरीले रास्ते की तरह बना दी गई हों। जबकि उसी जगह तालाब के किनारे को व्यवस्थित कर सडक़ को सीधा किया जा सकता था।
समस्या केवल प्रशासनिक नहीं है, यह नागरिक मानसिकता से भी जुड़ी हुई है। शहर में गाडिय़ों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। कई घरों में एक नहीं, दो-दो या चार-चार वाहन हैं, लेकिन उनके लिए निजी पार्किंग की व्यवस्था नहीं है। परिणाम यह कि लोग अपनी गाडिय़ाँ सडक़ पर खड़ी कर देते हैं और सार्वजनिक मार्ग को निजी पार्किंग में बदल देते हैं। कॉलोनियों के भीतर भी यही स्थिति देखने को मिल रही है। गाडिय़ों की पार्किंग को लेकर विवाद और बहसें आम हो गई हैं। किसी के घर मेहमान की गाड़ी भी खड़ी हो जाए तो कॉलोनी के व्हाट्सऐप समूहों में संदेश चलने लगते हैं कि यह गाड़ी किसकी है।
यह स्थिति केवल रायपुर की नहीं है। देश के अधिकांश तेजी से बढ़ते शहरों में यही समस्या दिखाई देती है। शहरों का विस्तार योजनाबद्ध तरीके से नहीं हो रहा, बाजार सडक़ों पर फैल रहे हैं, पार्किंग की व्यवस्था नहीं है और फुटपाथ धीरे-धीरे गायब होते जा रहे हैं। नतीजा यह कि सडक़ें चाहे जितनी चौड़ी कर दी जाएं, कुछ ही वर्षों में वे फिर से संकरी पड़ जाती हैं।
इस पूरे परिदृश्य में जनप्रतिनिधियों और प्रशासन की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। नगर निगम के अधिकारी, लोक निर्माण विभाग के इंजीनियर, स्थानीय पार्षद और अन्य जिम्मेदार लोग सब कुछ देखते हुए भी अक्सर मौन रहते हैं। कई बार राजनीतिक दबाव या वोट बैंक की चिंता के कारण अतिक्रमण पर कठोर कार्रवाई नहीं हो पाती। नागरिक भी अक्सर यह सोचकर चुप रहते हैं कि इससे उनका क्या लेना-देना। धीरे-धीरे यह चुप्पी एक ऐसी व्यवस्था को जन्म देती है जिसमें सार्वजनिक स्थानों पर निजी कब्ज़ा सामान्य बात बन जाती है।
सच यह है कि सडक़ें केवल सरकार नहीं बनाती, उन्हें उपयोगी बनाना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी होती है। अगर नागरिक अपने घरों के सामने सडक़ को निजी पार्किंग बना लें, दुकानदार फुटपाथ और नालियों पर कब्जा कर लें, और प्रशासन इसे अनदेखा करता रहे, तो कितनी भी बड़ी परियोजनाएँ यातायात की समस्या का समाधान नहीं कर पाएंगी।
रायपुर सहित देश के सभी शहरों के सामने आज यही चुनौती है। सिर्फ बुनियादी ढांचा बनाना पर्याप्त नहीं है, उसके साथ नागरिक अनुशासन और प्रशासनिक दृढ़ता भी जरूरी है। सडक़ें चौड़ी करने से पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि वे भविष्य में भी चौड़ी बनी रहें। अतिक्रमण के खिलाफ निरंतर और निष्पक्ष कार्रवाई करनी होगी, पार्किंग की व्यवस्थित व्यवस्था बनानी होगी और नागरिकों को यह समझाना होगा कि सडक़ें किसी एक व्यक्ति या व्यवसाय की नहीं, पूरे समाज की साझा संपत्ति हैं।
यदि यह समझ विकसित नहीं हुई तो 9451 करोड़ की योजनाएँ भी कुछ वर्षों बाद उसी पुराने सवाल के सामने खड़ी दिखाई देंगी—सडक़ें तो चौड़ी हुईं, पर यातायात क्यों नहीं सुधरा? दरअसल समस्या सडक़ की चौड़ाई से अधिक हमारी सोच की चौड़ाई की है। जब तक सोच संकरी रहेगी, तब तक सडक़ें चाहे जितनी भी चौड़ी क्यों न कर दी जाएं, शहरों का यातायात सुचारु नहीं हो पाएगा।