धान का कटोरा और खनिज की धरती, संतुलन ही सुशासन की असली कसौटी

-सुभाष मिश्र
छत्तीसगढ़ की राजनीति में धान केवल एक फसल नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था, समाज और सत्ता तीनों का केंद्र है। यही कारण है कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की अध्यक्षता में 11 फरवरी 2026 को आयोजित मंत्रिपरिषद की बैठक में लिया गया निर्णय केवल आर्थिक घोषणा भर नहीं, बल्कि एक स्पष्ट राजनीतिक-सामाजिक संदेश भी है। राज्य में समर्थन मूल्य पर धान बेचने वाले 25 लाख से अधिक किसानों को 3100 रुपये प्रति क्विंटल के मान से अंतर की राशि होली से पहले एकमुश्त भुगतान करने का फैसला यह बताता है कि सरकार किसानों की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लेकर सजग है। लगभग 10 हजार करोड़ रुपये की यह राशि सीधे किसानों के खातों में जाएगी और पिछले दो वर्षों में दिए गए 25 हजार करोड़ रुपये के साथ मिलकर यह आंकड़ा 35 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगा।
-छत्तीसगढ़ को यूं ही ‘धान का कटोरा नहीं कहा जाता। यहां की निर्णायक आबादी खेती-किसानी पर निर्भर है और राज्य की आर्थिक संरचना का बड़ा हिस्सा ग्रामीण अर्थव्यवस्था से संचालित होता है। ऐसे में किसी भी सरकार के लिए यह स्वाभाविक प्राथमिकता है कि वह किसानों को मजबूत करें, उनकी उपज का बेहतर मूल्य सुनिश्चित करे और कृषि को लाभकारी बनाए। कृषक उन्नति योजना के तहत प्रति एकड़ 21 क्विंटल धान की खरीदी और 3100 रुपये प्रति क्विंटल का मान देश में सर्वाधिक बताया जा रहा है। यह केवल आर्थिक सहयोग नहीं, बल्कि एक भरोसे का निर्माण भी है कि सरकार किसान के साथ खड़ी है।
लेकिन छत्तीसगढ़ की पहचान केवल धान तक सीमित नहीं है। यह राज्य खनिज संपदा से भी परिपूर्ण है। धरती के ऊपर लहलहाते खेत हैं, तो धरती के नीचे लौह अयस्क, कोयला, चूना पत्थर और अन्य खनिजों का विशाल भंडार है। यही दोहरी पहचान—कृषि और खनन—छत्तीसगढ़ की विकास यात्रा को जटिल भी बनाती है और संभावनाओं से भरपूर भी।
इसी संदर्भ में रायपुर से लगे आरंग क्षेत्र के ग्राम निसदा का मामला महत्वपूर्ण हो जाता है। जहां एक ओर कैबिनेट किसानों को बड़ी आर्थिक राहत देने का निर्णय ले रही है, वहीं दूसरी ओर बिलासपुर हाईकोर्ट ने अवैध उत्खनन और पर्यावरणीय क्षति के मामले में कड़ी टिप्पणी की है। जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने लीज क्षेत्र के बाहर हो रहे उत्खनन पर रोक लगाने के निर्देश दिए हैं और दोषी लीजधारकों पर 30 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाने की प्रक्रिया का संज्ञान लिया है।
याचिका में आरोप है कि फ्लैग स्टोन और चूना पत्थर के उत्खनन के दौरान माइनिंग वेस्ट सीधे महानदी में डंप किया जा रहा है, जिससे नदी का प्रवाह प्रभावित हुआ और लगभग 400 एकड़ कृषि भूमि बंजर होने की स्थिति में पहुंच गई। तीन वर्ष पूर्व पर्यावरणीय अनुमति समाप्त हो जाने के बावजूद ब्लास्टिंग और खनन जारी रहने के आरोप भी सामने आए हैं। हाईकोर्ट ने खनिज विभाग के सचिव से शपथ पत्र के माध्यम से जवाब मांगा है कि नदी में कचरा फेंकने वालों पर क्या कार्रवाई हुई और वर्तमान स्थिति क्या है।
यहां सवाल केवल एक गांव या 400 एकड़ जमीन का नहीं है। यह उस संतुलन का प्रश्न है जो एक कृषि प्रधान और खनिज संपन्न राज्य को साधना होता है। यदि खनन की अनियमितता से नदी का प्रवाह बाधित होगा, कृषि भूमि बंजर होगी और पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ेगा, तो अंतत: नुकसान उसी किसान को होगा जिसके लिए सरकार हजारों करोड़ रुपये की सहायता की घोषणा कर रही है। एक हाथ से आर्थिक सहायता और दूसरे हाथ से प्राकृतिक संसाधनों की उपेक्षा—यह विरोधाभास दीर्घकाल में टिकाऊ नहीं हो सकता।
सुशासन की असली परिभाषा केवल योजनाओं की घोषणा में नहीं, बल्कि क्रियान्वयन की कठोरता और जवाबदेही में निहित होती है। यदि पर्यावरणीय क्लीयरेंस समाप्त हो चुकी थी तो उत्खनन कैसे जारी रहा? यदि लीज क्षेत्र से पांच गुना अधिक जमीन पर कब्जा कर खनन हुआ, तो निगरानी तंत्र कहां था? ये प्रश्न केवल न्यायालय के नहीं, बल्कि समाज के भी हैं।
छत्तीसगढ़ के सामने चुनौती यही है कि वह अपनी दोहरी पहचान को संतुलित रखे। धरती के ऊपर धान की हरियाली बनी रहे और धरती के नीचे खनिज संपदा का दोहन भी नियमों के भीतर, पारदर्शिता और पर्यावरणीय संवेदनशीलता के साथ हो। खनन से राजस्व आता है, उद्योग चलते हैं, रोजगार सृजित होता है; पर यदि इसकी कीमत खेती, जलस्रोत और ग्रामीण जीवन से चुकानी पड़े, तो विकास की परिभाषा अधूरी रह जाएगी। मंत्रिपरिषद का धान संबंधी निर्णय यह संकेत देता है कि सरकार किसानों को केंद्र में रखकर आगे बढऩा चाहती है। अब आवश्यकता इस बात की है कि आरंग जैसे मामलों में भी उतनी ही तत्परता और पारदर्शिता दिखे। महानदी केवल जलधारा नहीं, बल्कि लाखों लोगों की जीवनरेखा है। कृषि भूमि केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि पीढिय़ों की आजीविका का आधार है।
छत्तीसगढ़ को यदि सचमुच ‘धान का कटोराÓ और ‘खनिज की धरती दोनों बने रहना है, तो नीतियों में संतुलन, प्रशासन में सख्ती और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलतातीनों को साथ लेकर चलना होगा। सरकार के सामने यही असली कसौटी है कि वह धरती के ऊपर और धरती के नीचे—दोनों की हिफाजत सुनिश्चित करें।

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