खेल के मैदान में सत्ता की सियासत

खेल के मैदान में सत्ता की सियासत

-सुभाष मिश्र
दरअसल, खेल को राजनीति से अलग रखने की बात जितनी बार दोहराई जाती है, उतनी ही बार वह झूठ साबित होती है। ओलंपिक से लेकर विश्व कप तक, हर बड़ा खेल आयोजन राष्ट्रवाद, कूटनीति और सत्ता संतुलन का मंच बन चुका है। छोटे देश अपने खिलाडिय़ों के जरिए पहचान बनाते हैं, बड़े देश अपने प्रभाव का प्रदर्शन करते हैं। तकनीक और वैश्वीकरण ने खेल को लोगों को जोडऩे का माध्यम तो बनाया, लेकिन सत्ता ने उसे अपने हितों का औज़ार भी बना लिया।
भारत में फुटबॉल विश्व स्तर पर शीर्ष पर नहीं है, लेकिन मेसी जैसे खिलाड़ी जब यहां आते हैं, तो कोलकाता से लेकर केरल तक जनसैलाब उमड़ पड़ता है। भाषा, धर्म, देश—सब पीछे छूट जाते हैं। यही खेल की असली ताकत है। इसी तरह टेनिस, बैडमिंटन या एथलेटिक्स के खिलाड़ी, चाहे किसी भी देश के हों, सम्मान पाते हैं। यह बताता है कि आम जनता खेल को राजनीति की तरह नहीं देखती। राजनीति खेल में घुसती है, खेल राजनीति में नहीं।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में तस्वीर उलटी हो गई है। आईपीएल में बांग्लादेशी खिलाड़ी को लेकर हुआ विवाद, उसे टीम से हटाया जाना, फिर बांग्लादेश का विश्व कप से दूरी बनाने की धमकी, ये सब खेल के भीतर चल रही सत्ता की लड़ाई के संकेत हैं। अब पाकिस्तान का भारत के खिलाफ मैच न खेलने का एलान उसी कड़ी का अगला अध्याय है। यह कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं, बल्कि एक सोची-समझी कूटनीतिक चाल है, जिसमें खेल सिर्फ एक बहाना है।

पाकिस्तान जानता है कि भारत-पाक मैच सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि आईसीसी के लिए सबसे बड़ा राजस्व स्रोत है। ऐसे में बहिष्कार की धमकी देकर वह खुद को पीडि़त दिखाने की कोशिश कर रहा है और साथ ही बांग्लादेश को यह संदेश देना चाहता है कि वह उसके साथ खड़ा है। यह दोस्ती कम और रणनीति ज़्यादा है। सवाल यह भी है कि अगर यही पाकिस्तान सेमीफाइनल या फाइनल में भारत से टकराता है, तब क्या होगा? क्या तब भी सिद्धांत याद रहेंगे या फिर ‘खेल भावना’ अचानक जाग जाएगी?
विडंबना यह है कि भारत में भी यही दोहरापन दिखाई देता है। व्यापार, कूटनीतिक बातचीत, बैकडोर चैनल—सब चलते रहते हैं, लेकिन जैसे ही बात खेल या सिनेमा की आती है, राष्ट्रवाद सबसे आगे खड़ा हो जाता है। पाकिस्तान से व्यापार करेंगे, बातचीत करेंगे, लेकिन क्रिकेट नहीं खेलेंगे, यह तर्क अपने आप में खोखला है। अगर संबंध इतने खराब हैं कि खेल नहीं हो सकता, तो फिर बाकी सब कैसे चलता है?

असल में, खेल को राष्ट्र की प्रतिष्ठा से जोड़ देना सबसे आसान राजनीति है। इसमें तात्कालिक तालियां मिलती हैं, भावनाएं भडक़ती हैं और सरकारें खुद को ‘मजबूत’ दिखा पाती हैं। लेकिन इसका नुकसान खेल को होता है, खिलाडिय़ों को होता है और अंतत: दर्शकों को, जिनके लिए यह खेल खेल होता है, युद्ध नहीं।
आईसीसी के सामने भी यह एक बड़ी परीक्षा है। अगर पाकिस्तान सिर्फ एक मैच का बहिष्कार करता है और उस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती, तो यह भविष्य के लिए खतरनाक मिसाल बनेगी। कल कोई और देश भी अपने राजनीतिक हितों के लिए मैच छोड़ देगा। तब विश्व कप नहीं, बल्कि देशों की आपसी रंजिशों का टूर्नामेंट खेला जाएगा।
इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या खेल वास्तव में राजनीति से परे रह सकता है, या फिर वह अब पूरी तरह कूटनीति का मोहरा बन चुका है? पाकिस्तान का फैसला सिर्फ भारत के खिलाफ नहीं है, बल्कि उस वैश्विक खेल व्यवस्था के खिलाफ भी है, जो बराबरी, प्रतिस्पर्धा और खेल भावना की बात करती है। और शायद यही वजह है कि यह बहिष्कार जितना पाकिस्तान का है, उतना ही खेल की आत्मा का भी।

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