-सुभाष मिश्र
भारतीय राजनीति में कभी–कभी कोई एक घटना पूरे सत्ता-संतुलन को झकझोर देती है। यदि यह कल्पना भी की जाए कि महाराष्ट्र जैसे राजनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील राज्य में उपमुख्यमंत्री अजित पवार जैसे कद्दावर नेता की विमान दुर्घटना में आकस्मिक मृत्यु हो जाए, तो इसके प्रभाव केवल एक व्यक्ति या एक दल तक सीमित नहीं रहते, बल्कि पूरी राजनीतिक संरचना, गठबंधन संतुलन और प्रशासनिक तंत्र को हिला देते हैं।
पिछले कुछ वर्षों में महाराष्ट्र की राजनीति पहले ही असाधारण घटनाक्रमों की साक्षी रही है—बालासाहेब ठाकरे की विरासत पर पारिवारिक फूट, शिवसेना का विभाजन, शरद पवार द्वारा स्थापित राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में भतीजे अजित पवार का विद्रोह, कांग्रेस–शिवसेना जैसे वैचारिक विरोधियों का साथ आना, और फिर महायुति जैसे अप्रत्याशित गठबंधन। ऐसे परिदृश्य में यदि अजित पवार जैसा सत्ता का प्रबंधक अचानक राजनीति से बाहर हो जाए, तो यह केवल एक व्यक्तिगत क्षति नहीं, बल्कि राजनीतिक भूचाल होगा।
अजित पवार महाराष्ट्र की राजनीति में महज़ एक संवैधानिक पदाधिकारी नहीं रहे। वे सत्ता के भीतर निर्णयों को साधने वाले, नौकरशाही और राजनीति के बीच संतुलन बनाने वाले तथा सहकारिता, वित्त और स्थानीय सत्ता संरचनाओं को नियंत्रित करने वाले नेता के रूप में पहचाने जाते थे। देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे के साथ सत्ता-समीकरण में उनकी मौजूदगी एक अलग शक्ति-केंद्र निर्मित करती थी। उनके अचानक हट जाने से यह संतुलन डगमगा सकता है और सरकार के भीतर शक्ति पुनर्वितरण की नई लड़ाई शुरू हो सकती है।
यदि यह घटना चुनावी दौरे के दौरान घटित होती—जैसा कि बारामती, पंढरे, करंजेपुल और सुपा जैसी जनसभाओं के कार्यक्रमों के संदर्भ में कल्पित किया गया है—तो इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव और भी गहरा होता। चुनाव प्रचार के बीच किसी बड़े नेता की मृत्यु राजनीति को कुछ समय के लिए स्थिर नहीं, बल्कि और अधिक अनिश्चित बना देती है। सहानुभूति, नेतृत्व-विहीनता और सत्ता की होड़—तीनों एक साथ उभरते हैं।
अजित पवार का राजनीतिक सफर स्वयं महाराष्ट्र की राजनीति की जटिलताओं का प्रतिबिंब रहा है। बारामती से आठ बार विधायक, छह बार उपमुख्यमंत्री, सत्ता से बाहर और भीतर लगातार आवाजाही—उन्होंने यह साबित किया कि राजनीति में स्थायित्व पद से नहीं, प्रभाव से आता है। मुख्यमंत्री न बन पाने की कसक उनके करियर की सबसे बड़ी विडंबना रही, फिर भी उपमुख्यमंत्री पद को उन्होंने अभूतपूर्व प्रभाव का केंद्र बना दिया।
उनकी पार्टी—एनसीपी (अजित पवार गुट)—काफी हद तक व्यक्तित्व-आधारित रही है। चुनाव चिन्ह और पार्टी नाम भले ही संवैधानिक रूप से सुरक्षित हों, लेकिन नेतृत्व के बिना संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखना आसान नहीं होता। पश्चिमी महाराष्ट्र, विशेषकर बारामती, पुणे और सहकारी क्षेत्र में उनका जो दबदबा था, उसके खाली होने से नई राजनीतिक प्रतिस्पर्धाएँ जन्म ले सकती हैं। चीनी मिलों, जिला बैंकों और स्थानीय निकायों में सत्ता संतुलन के लिए संघर्ष तेज़ हो सकता है।
यह प्रसंग भारत में विमान दुर्घटनाओं और सार्वजनिक जीवन के रिश्ते पर भी सवाल खड़े करता है। संजय गांधी (1980), माधवराव सिंधिया (2001), वाई.एस. राजशेखर रेड्डी (2009), डोरजी खांडू, जी.एम.सी. बालयोगी, ओ.पी. जिंदल, बलवंतराय मेहता और हाल के वर्षों में विजय रूपाणी जैसे उदाहरण बताते हैं कि विमान हादसे केवल तकनीकी दुर्घटनाएँ नहीं होते, वे देश की राजनीति की दिशा बदलने वाले क्षण भी बन जाते हैं। निजी विमान सेवाओं, चार्टर्ड फ्लाइट्स और वीआईपी मूवमेंट की सुरक्षा, रखरखाव और निगरानी व्यवस्था पर ऐसे हर हादसे के बाद गंभीर प्रश्न उठते हैं, लेकिन समय के साथ वे फिर ठंडे पड़ जाते हैं।
दरअसल, विमान दुर्घटनाओं में नेताओं की मौत भारतीय लोकतंत्र की एक अनकही त्रासदी रही है—जहाँ व्यक्ति के साथ उसकी राजनीतिक संभावनाएँ, नीतिगत निरंतरता और नेतृत्व का अनुभव भी खत्म हो जाता है। सत्ता की राजनीति अक्सर इस शून्य को भरने में इतनी व्यस्त हो जाती है कि दुर्घटना से सबक लेने की प्रक्रिया पीछे छूट जाती है।
यदि अजित पवार जैसे नेता का इस तरह अचानक अंत हो जाए, तो यह महाराष्ट्र को यह सोचने पर मजबूर करेगा कि क्या उसकी राजनीति अब भी व्यक्तियों के इर्द-गिर्द घूम रही है, न कि संस्थाओं के भरोसे। यह सवाल भी उठेगा कि क्या गठबंधन सरकारें वैचारिक स्थिरता के बिना केवल सत्ता प्रबंधन के सहारे चल सकती हैं।
अंततः, चाहे यह परिदृश्य काल्पनिक ही क्यों न हो, यह हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र में सबसे बड़ा जोखिम केवल चुनाव हारना नहीं, बल्कि नेतृत्व का आकस्मिक अभाव है—और उससे भी बड़ा खतरा है उससे कोई सबक न लेना।