हिंदुस्तानी समाज की सबसे बड़ी पहचान उसकी बहुलता रही है—भाषा, पहनावा, आस्था और खान-पान, सबमें विविधता। समुद्र किनारे बसे समाजों के लिए मछली जीवन का स्वाभाविक हिस्सा रही, नदियों और मैदानों में रहने वालों के भोजन में अनाज-सब्ज़ी का वर्चस्व रहा। समय के साथ सभ्यता ने स्वाद गढ़े, परंपराएँ बनीं और समाज मोटे तौर पर शाकाहारी-मांसाहारी के दो बड़े खांचों में बंटा। इसके भीतर भी जैन समाज जैसी परंपराएँ हैं, जहाँ सूर्यास्त के बाद भोजन वर्जित है, तो कई समुदाय ऐसे हैं जिनके लिए मांस भोजन का अभिन्न अंग रहा।
यहीं से प्रश्न उठता है जब खान-पान संस्कृति का विषय है, तो राज्य और समाज सीमा कहाँ तय हो? विशेषकर तब, जब आस्था का प्रश्न जुड़ जाए। गाय भारतीय समाज में केवल एक पशु नहीं, बल्कि सांस्कृतिक-धार्मिक प्रतीक है। कामधेनु की अवधारणा, पूजा-परंपरा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में उसकी भूमिका ने गाय को विशेष स्थान दिया। इसी भावभूमि पर समय-समय पर राज्यों ने गोवंश वध पर प्रतिबंध लगाए, तस्करी पर कार्रवाई की और कई जगह स्लॉटर हाउस बंद हुए।
लेकिन सच्चाई उतनी सरल नहीं। देश में आज भी बड़े स्लॉटर हाउस हैं, जिनमें कानूनी ढांचे के भीतर भैंस आदि का वध होता है, इनमें कई हिंदू कारोबारी भी शामिल हैं। चमड़ा उद्योग, हड्डी-उपउत्पाद, और निर्यात से जुड़ा एक बड़ा आर्थिक तंत्र है। कुछ समुदाय ऐसे भी हैं जिनकी आजीविका मृत पशुओं के उपयोग से जुड़ी है—यह न तो नई बात है, न ही अस्वीकार्य, बशर्ते क़ानून का पालन हो।
इसी जटिल पृष्ठभूमि में भोपाल का 26 टन प्रतिबंधित गोमांस प्रकरण सामने आया है। पुलिस द्वारा विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन, लैब रिपोर्ट से पुष्टि और नेटवर्क की जांच, ये सभी कदम बताते हैं कि मामला केवल भावनाओं का नहीं, क़ानून के उल्लंघन का भी है। यहाँ एक स्पष्ट रेखा खींचना ज़रूरी है, आस्था का सम्मान और क़ानून का पालन दोनों अनिवार्य हैं। यदि किसी राज्य में गोवंश वध निषिद्ध है, तो उसका उल्लंघन अपराध है और उस पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। यह कार्रवाई किसी समुदाय के विरुद्ध नहीं, अपराध के विरुद्ध हो।
समस्या तब गहराती है जब ऐसे मामलों को उत्तेजना और ध्रुवीकरण का औज़ार बना लिया जाता है। हरिशंकर परसाई का व्यंग्य कि ‘बाक़ी दुनिया में गाय दूध देने के काम आती है और हमारे यहाँ दंगा कराने के’ आज भी हमें आईना दिखाता है। भीष्म साहनी के तमस में सूअर काटकर धार्मिक स्थल पर फेंकने का दृश्य बताता है कि किस तरह भोजन-प्रतीक को हिंसा भडक़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इतिहास गवाह है कि जब भी खान-पान को पहचान की राजनीति से जोड़ा गया, समाज में दरारें गहरी हुईं।
तो इससे निकलने का रास्ता क्या है? पहला, नीति की स्पष्टता—केंद्र और राज्यों की गोवंश, स्लॉटर हाउस, परिवहन और निर्यात से जुड़ी नीतियाँ पारदर्शी और एक-दूसरे से संगत हों। भ्रम और दोहरे मानदंड अवैध धंधों को जन्म देते हैं।
दूसरा, क़ानून का निष्पक्ष पालन—तस्करी, अवैध वध और मिलावट पर सख़्त कार्रवाई हो, पर भीड़-न्याय या पहचान-आधारित संदेह को कतई जगह न मिले। तीसरा, संवेदनशील संवाद—सरकार, समाज और धार्मिक-सांस्कृतिक नेतृत्व को यह स्वीकार करना होगा कि खान-पान विविध है, पर जहाँ आस्था को ठेस पहुँचती हो वहाँ संयम और नियम आवश्यक हैं।
चौथा, आर्थिक यथार्थ का सम्मान—चमड़ा, उपउत्पाद और निर्यात से जुड़े वैध कारोबार को नियमों में बाँधकर चलाना होगा, ताकि अवैधता का स्पेस न बचे।
ग्लोबलाइज़ेशन के दौर में खान-पान पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, न ही रोका जाना चाहिए। लेकिन क़ानून, आस्था और सामाजिक शांति—इन तीनों के बीच संतुलन बनाना राज्य का दायित्व है। भोपाल का मामला एक चेतावनी है कि ढील और उत्तेजना—दोनों ही ख़तरनाक हैं। समाधान न तो भावनाओं को कुचलने में है, न उन्हें भडक़ाने में। समाधान न्यायपूर्ण क़ानून, संवेदनशील प्रशासन और संयमित समाज में है।
और इन सबके साथ जरूरी है राजनीतिक संयम और धैर्य। कई बार राजनीतिक लाभ के लिए अनेक दलों को दंगों के बीच राजनीतिक लाभ नजर आता है और ऐसे में गोमांस एक माध्यम बन जाता है। आस्था, कानून और राजनीतिक लाभ की मंशा के बीच एक स्पष्ट विभाजन रेखा और संतुलन बहुत जरूरी है।