-सुभाष मिश्र
न्यायालय जब निर्णय सुनाता है तो वह केवल किसी एक व्यक्ति के भाग्य का निर्धारण नहीं करता, बल्कि कानून की सीमाओं, परिभाषाओं और अधिकारों की रेखाएं भी स्पष्ट करता है। हाल के दिनों में छत्तीसगढ़ से जुड़े तीन अलग-अलग मामलों में अदालतों के आदेश चर्चा के केंद्र में रहे—एक आपराधिक कानून की परिभाषा से जुड़ा, दूसरा धार्मिक-सामाजिक अधिकारों से और तीसरा निजता तथा तकनीकी हस्तक्षेप से।
पहला मामला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का है, जिसमें न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की एकलपीठ ने यह कहा कि यदि पेनिट्रेशन यानी पूर्ण प्रवेश साबित नहीं होता और केवल जननांगों को रगड़ा जाना सिद्ध है, तो उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत दुष्कर्म नहीं माना जा सकता, बल्कि धारा 376 के साथ 511 यानी दुष्कर्म के प्रयास की श्रेणी में रखा जाएगा। धमतरी जिले के वर्ष 2004 के एक प्रकरण में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को सात वर्ष की सजा सुनाई थी, लेकिन अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने मेडिकल साक्ष्यों, पीड़िता के बदलते बयानों और डॉक्टर की गवाही का परीक्षण किया। मेडिकल रिपोर्ट में हाइमन सुरक्षित पाया गया और पूर्ण पेनिट्रेशन की पुष्टि नहीं हुई। हालांकि कपड़ों पर मानव शुक्राणु और जननांगों पर लालिमा दर्ज की गई थी। अदालत ने माना कि आरोपी का इरादा आपराधिक था, उसने जबरन पकड़कर ले जाने और कपड़े उतरवाने जैसे गंभीर कृत्य किए, लेकिन कानून की परिभाषा के अनुसार पूर्ण दुष्कर्म सिद्ध नहीं हुआ। परिणामस्वरूप सजा आधी कर दी गई और अपराध की धारा बदली गई। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे कृत्य को हल्के में नहीं लिया जा सकता, पर अपराध की श्रेणी साक्ष्य के आधार पर तय होगी।
दूसरा मामला धार्मिक और सामुदायिक अधिकारों से जुड़ा है। Supreme Court of India ने छत्तीसगढ़ में आदिवासी-ईसाई समुदाय के दफनाए गए शवों को कब्र से निकालने की कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगा दी है। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा कि अंतिम निर्णय तक किसी भी शव को कब्र से बाहर नहीं निकाला जाएगा। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि गांव की सीमा के भीतर दफनाने से रोका जा रहा है और कुछ मामलों में शवों को हटाने की कोशिश की गई। मामला संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का हवाला देते हुए दायर हुआ है। पृष्ठभूमि में कांकेर जिले के बड़े तेवड़ा गांव की वह घटना भी रही, जहां शव दफनाने को लेकर तनाव हिंसा में बदल गया था। चर्चों में आगजनी, पथराव और पुलिसकर्मियों के घायल होने की घटनाओं ने यह प्रश्न उठाया कि अंतिम संस्कार का अधिकार और सामुदायिक सहअस्तित्व के बीच संतुलन कैसे कायम हो।
तीसरा मामला तकनीक और निजता के अधिकार से जुड़ा है। High Court of Chhattisgarh ने वीएसके ऐप को अनिवार्य रूप से इंस्टॉल कराने और अनुपालन न करने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगा दी है। जस्टिस एन.के. चंद्रवंशी की एकलपीठ ने याचिकाकर्ता शिक्षक की दलीलों को सुनते हुए राज्य सरकार से जवाब मांगा है। याचिका में कहा गया था कि किसी थर्ड-पार्टी ऐप को निजी मोबाइल पर अनिवार्य करना निजता का उल्लंघन है और निजी संसाधनों का बाध्यकारी उपयोग संवैधानिक प्रश्न खड़ा करता है। अदालत ने फिलहाल याचिकाकर्ता के खिलाफ किसी भी अनुशासनात्मक कार्रवाई पर रोक लगाई है और राज्य को विस्तृत जवाब प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। यह आदेश भले ही एक शिक्षक के संदर्भ में हो, पर इससे व्यापक बहस छिड़ गई है कि प्रशासनिक दक्षता और व्यक्तिगत अधिकारों की सीमा कहाँ मिलती है।
इन तीनों मामलों का विषय अलग-अलग है—एक आपराधिक कानून की व्याख्या, दूसरा धार्मिक अधिकार और तीसरा डिजिटल युग में निजता—लेकिन एक समान तत्व है: अदालतें यह रेखांकित कर रही हैं कि निर्णय भावना से नहीं, साक्ष्य, संवैधानिक सिद्धांत और विधिक परिभाषाओं से संचालित होंगे। दुष्कर्म के मामले में हाईकोर्ट ने कहा कि कानून की परिभाषा में जो तत्व अनिवार्य हैं, वे सिद्ध होने चाहिए। कब्र से शव निकालने के मामले में सर्वोच्च अदालत ने यथास्थिति बनाए रखने को कहा, ताकि अंतिम निर्णय तक कोई अपरिवर्तनीय स्थिति न बने। और शिक्षकों के मामले में अदालत ने यह संकेत दिया कि प्रशासनिक आदेश भी न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर नहीं हैं।
देश की न्यायिक संरचना बहुस्तरीय है—जिला अदालतें, उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय। असहमति या त्रुटि की स्थिति में अपील की व्यवस्था है। पर हर स्तर पर यह स्पष्ट दिखाई देता है कि अदालतें केवल विवाद का समाधान नहीं करतीं, बल्कि समाज में चल रही जटिलताओं—रिश्तों, धर्म, तकनीक, अधिकार और दायित्व—के बीच संतुलन भी साधती हैं।
इन फैसलों ने अलग-अलग वर्गों को अलग-अलग संदेश दिए हैं—किसी को राहत, किसी को सख्ती, किसी को अंतरिम संरक्षण। और इसी प्रक्रिया में न्यायपालिका की भूमिका फिर चर्चा के केंद्र में है, जहां कानून की भाषा और समाज की संवेदनाएं आमने-सामने दिखाई देती हैं।