Editor-in-Chief सुभाष मिश्र की कलम से: क्या भ्रष्टाचार पर अंकुश संभव है?

क्या भ्रष्टाचार पर अंकुश संभव है?

-सुभाष मिश्र
भारत में भ्रष्टाचार अब केवल नैतिक पतन या व्यक्तिगत लालच का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह एक संस्थागत संकट का रूप ले चुका है। सुप्रीम कोर्ट का भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17ए पर हालिया खंडित फैसला इसी गहरे संकट की कानूनी अभिव्यक्ति है। एक ओर न्यायपालिका स्वयं इस बात पर विभाजित है कि जांच से पहले अनुमति भ्रष्टाचार से लडऩे का औज़ार है या ढाल, और दूसरी ओर ज़मीनी हकीकत यह है कि भ्रष्टाचार आम नागरिक के रोज़मर्रा के जीवन का स्थायी अनुभव बन चुका है।
2018 में जोड़ी गई धारा 17्र का उद्देश्य कागज़़ पर ईमानदार अधिकारियों को ‘दुर्भावनापूर्ण जांच’ से बचाना बताया गया था। लेकिन व्यवहार में यही धारा कई मामलों में जांच को रोकने, टालने और कमजोर करने का माध्यम बनती दिखी है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ में शामिल न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने इसी वास्तविकता को रेखांकित करते हुए धारा 17ए को असंवैधानिक बताया। उनके अनुसार, जांच से पहले अनुमति की बाध्यता भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की आत्मा के खिलाफ है और इससे भ्रष्ट लोकसेवकों को बच निकलने का अवसर मिलता है।

वहीं न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन का मत है कि यदि अनुमति देने का अधिकार सरकार के बजाय लोकपाल या लोकायुक्त के पास हो, तो यह प्रावधान ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा कर सकता है। लेकिन सवाल यह है कि जब भ्रष्टाचार की जड़ें स्वयं प्रशासनिक ढांचे में गहराई तक फैली हों, तब ‘पूर्व अनुमति’ की अवधारणा जनता के हित में कैसे काम करेगी?
इस सवाल का जवाब आंकड़े खुद दे रहे हैं। कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय द्वारा 10 मार्च 2021 को लोकसभा में दिए गए जवाब के अनुसार, 2015-16 से फरवरी 2021 के बीच आईएएस अधिकारियों के खिलाफ वित्तीय और आपराधिक मामलों में 3464 शिकायतें दर्ज हुईं। इसी अवधि में सीबीआई ने 44 आईएएस और 12 आईपीएस अधिकारियों के खिलाफ केस दर्ज किए, जबकि केंद्र सरकार ने 43 आईएएस और 17 आईपीएस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की। ये आंकड़े यह बताने के लिए काफी हैं कि भ्रष्टाचार अपवाद नहीं, बल्कि प्रणालीगत समस्या बन चुका है।

अगर राष्ट्रीय तस्वीर चिंताजनक है, तो छत्तीसगढ़ इसका सजीव उदाहरण बनकर उभरता है। राज्य में सात से अधिक बड़े घोटालों में करीब 11 एफआईआर दर्ज की जा चुकी हैं, जिनकी कुल राशि लगभग 7000 करोड़ रुपये आंकी जा रही है। इन मामलों की जांच अलग-अलग एजेंसियां कर रही हैं और इसमें आईएएस, आईपीएस, आईटीएस, राज्य प्रशासनिक सेवा, राज्य पुलिस सेवा, खनिज और आबकारी विभाग समेत 50 से अधिक अधिकारियों की संलिप्तता सामने आई है।
अब तक सात आईएएस अधिकारियों की गिरफ्तारी हो चुकी है, एक को बिना गिरफ्तार किए आरोपी बनाया गया है और चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है। चार अन्य आईएएस अधिकारियों के खिलाफ जांच जारी है। दो आईटीएस अधिकारी जेल में हैं और चार आईपीएस अधिकारियों की भूमिका की जांच चल रही है। 3200 करोड़ रुपये के शराब घोटाले में रिटायर्ड आईएएस की गिरफ्तारी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भ्रष्टाचार सेवा काल तक सीमित नहीं, बल्कि सेवानिवृत्ति के बाद भी अपनी परछाईं छोड़ता है।
अवैध कोल परिवहन, डीएमएफ, शराब, पीएससी, नान, कस्टम मिलिंग, सीजीएमएससी, भारतमाला और महादेव सट्टा—ये सभी मामले किसी एक विभाग या व्यक्ति की कहानी नहीं हैं। ये उस तंत्र की कहानी हैं, जहां सत्ता, प्रशासन और पूंजी के गठजोड़ ने जवाबदेही को लगभग निष्क्रिय कर दिया है।

इस संस्थागत संकट को वैश्विक संदर्भ में देखें तो तस्वीर और भी साफ़ होती है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के 2024 के भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक में भारत 180 देशों में 96वें स्थान पर है और उसका स्कोर गिरकर 38 रह गया है। 2022 में यही स्कोर 40 था। यह गिरावट केवल रैंकिंग नहीं, बल्कि भरोसे की गिरावट है, जनता के भरोसे की।
भ्रष्टाचार केवल बड़े घोटालों तक सीमित नहीं है। पुलिस, राजस्व, नगर निगम, बिजली, आरटीओ, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, कर और वन विभाग लगभग हर वह विभाग, जिससे आम नागरिक का सीधा सरोकार है, भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा है। जब रिश्वत व्यवस्था का ‘अनौपचारिक नियम’ बन जाए, तब कानून कितने भी सख्त क्यों न हों, वे निष्प्रभावी हो जाते हैं।
यही वह बिंदु है जहां धारा 17ए जैसी व्यवस्थाओं पर गंभीर पुनर्विचार जरूरी हो जाता है। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम का मूल उद्देश्य पारदर्शिता, जवाबदेही और दंड सुनिश्चित करना था। लेकिन यदि जांच से पहले अनुमति ही सबसे बड़ी बाधा बन जाए, तो यह कानून अपने ही उद्देश्य को कमजोर करता है।

अब जब सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ इस मुद्दे पर अंतिम फैसला देने जा रही है, तो सवाल सिर्फ एक धारा का नहीं है। सवाल यह है कि क्या भारत भ्रष्टाचार को एक ‘प्रशासनिक जोखिम’ मानकर स्वीकार करेगा, या उसे लोकतंत्र, संविधान और जनता के विश्वास के खिलाफ अपराध मानकर निर्णायक लड़ाई लड़ेगा।
भ्रष्टाचार पर अंकुश तभी संभव है जब कानून बिना भय और बिना पक्षपात के लागू हों, जांच में कोई कृत्रिम अवरोध न हो, और ‘ईमानदार अधिकारी’ की परिभाषा व्यवहार से तय हो, न कि पद और प्रक्रिया से। वरना हर नई धारा, हर नया संशोधन और हर नई बहस सिर्फ एक ही सवाल को और गहरा करती रहेगी, क्या हम सचमुच भ्रष्टाचार से लडऩा चाहते हैं, या केवल उसके साथ जीना सीख चुके हैं?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *