-सुभाष मिश्र
मिडिल ईस्ट एक बार फिर बारूद के ढेर पर बैठा है और इस बार स्थिति सामान्य सीमा से कहीं आगे निकलती दिखाई दे रही है। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ता सैन्य टकराव अब दो देशों का सीमित संघर्ष नहीं रह गया है। संयुक्त राज्य अमेरिका जिस तरह खुलकर इजरायल के साथ खड़ा है, उसने इस पूरे समीकरण को वैश्विक शक्ति संतुलन की परीक्षा में बदल दिया है। सवाल यह नहीं है कि हमला किसने पहले किया, सवाल यह है कि अब यह टकराव कहां जाकर रुकेगा।
ईरान ने साफ संकेत दे दिया है कि वह इस बार दबाव में झुकने वाला नहीं है। उसकी रणनीति केवल प्रत्यक्ष सैन्य जवाब तक सीमित नहीं है, बल्कि वह क्षेत्रीय नेटवर्क और प्रॉक्सी ताकतों के माध्यम से बहुस्तरीय दबाव बनाने की नीति पर चलता है। यही कारण है कि संघर्ष की आंच इजरायल और ईरान की सीमाओं से निकलकर खाड़ी क्षेत्र के कई देशों तक पहुंच चुकी है जहां अमेरिकी सैन्य ठिकानों की मौजूदगी उन्हें स्वाभाविक रूप से जोखिम के घेरे में ले आती है।
स्थिति की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि यह युद्ध पारंपरिक रेखाओं में नहीं बंधा है। यदि लेबनान, यमन, इराक या सीरिया में सक्रिय समूह पूरी तरह से मोर्चे पर आ जाते हैं तो यह बहु-मोर्चीय संघर्ष का रूप ले सकता है। ऐसे युद्धों में कोई स्पष्ट विजेता नहीं होता, केवल लंबी अस्थिरता और मानवीय त्रासदी होती है। अमेरिका की सक्रिय भागीदारी इस पूरे घटनाक्रम को और जटिल बना देती है। जब विश्व की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति किसी एक पक्ष के साथ निर्णायक रूप से खड़ी हो तो दूसरा पक्ष अपनी रणनीति को और आक्रामक बनाता है। ईरान के लिए यह केवल सैन्य जवाब नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा, क्षेत्रीय प्रभाव और राजनीतिक अस्तित्व का प्रश्न बन जाता है।
इस टकराव का सबसे बड़ा और तात्कालिक असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दिखाई दे सकता है। मिडिल ईस्ट विश्व ऊर्जा आपूर्ति का केंद्र है। यदि रणनीतिक समुद्री मार्ग प्रभावित होते हैं या तेल उत्पादन और परिवहन बाधित होता है तो तेल की कीमतों में उछाल लगभग तय है। भारत जैसे ऊर्जा आयातक देशों के लिए यह दोहरी मार होगी—एक तरफ महंगाई का दबाव, दूसरी ओर आर्थिक विकास की गति पर असर। सप्लाई चेन बाधित होने से एशिया और यूरोप की औद्योगिक अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित होंगी और दुनिया फिर से मंदी और महंगाई के संयुक्त संकट की ओर बढ़ सकती है। बड़ी शक्तियों की भूमिका फिलहाल प्रत्यक्ष टकराव से दूर दिखाई देती है, लेकिन कूटनीतिक और सामरिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। रूस और चीन खुलकर युद्ध में शामिल नहीं हैं, पर वे इस संघर्ष को वैश्विक शक्ति संतुलन के संदर्भ में देख रहे हैं। यूरोपीय देश शांति की अपील कर रहे हैं, पर उनके पास निर्णायक हस्तक्षेप की सीमित क्षमता है। ऐसे में वैश्विक व्यवस्था की विश्वसनीयता दांव पर लग जाती है। यदि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं और मध्यस्थ देश प्रभावी पहल नहीं करते, तो यह संघर्ष लंबे समय तक सुलगता रह सकता है।
नुकसान अंतत: किसका होगा? सबसे पहले आम नागरिकों का, जिनके शहरों पर सायरन बजते हैं और जिनके जीवन में भय स्थायी हो जाता है। दूसरे, उन अर्थव्यवस्थाओं का जो पहले ही वैश्विक अनिश्चितताओं से जूझ रही हैं। तीसरे, क्षेत्रीय स्थिरता का जो यदि टूटती है तो परमाणु हथियारों की होड़ जैसे खतरनाक आयाम सामने आ सकते हैं।
भारत के लिए यह संतुलन की घड़ी है। एक ओर इजरायल के साथ रणनीतिक संबंध, दूसरी ओर ईरान के साथ ऊर्जा और ऐतिहासिक जुड़ाव—इन दोनों के बीच संतुलित कूटनीति ही व्यावहारिक मार्ग है। भारत का हित किसी पक्ष में खड़े होने में नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शांति और स्थिरता में है।
युद्ध की शुरुआत अक्सर सुरक्षा या पूर्व-रक्षा के तर्कों से होती है, लेकिन उसका विस्तार राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और प्रतिशोध की मानसिकता से संचालित होता है। आज की स्थिति में दोनों पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं दिखते। यही जिद यदि जारी रही तो यह संघर्ष सीमित दायरे से निकलकर व्यापक अस्थिरता में बदल सकता है। इतिहास सिखाता है कि युद्ध कभी स्थायी समाधान नहीं देता; वह केवल नई शत्रुताएं और गहरे घाव छोड़ता है। समय की मांग है कि अधिकतम संयम, बैक-चैनल संवाद और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के रास्ते को प्राथमिकता दी जाए। अन्यथा मिडिल ईस्ट की यह आग वैश्विक शांति और अर्थव्यवस्था दोनों को झुलसा सकती है।