-सुभाष मिश्र
भारत को दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का श्रेय दिया जा रहा है और कहा जा रहा है कि 2030 तक वह जर्मनी को पीछे छोड़कर तीसरे स्थान पर पहुँच सकता है। यह दावा पूरी तरह गलत नहीं है। 4 ट्रिलियन डॉलर से अधिक के सकल घरेलू उत्पाद के साथ भारत आज आकार के लिहाज़ से वैश्विक अर्थव्यवस्था के शीर्ष पायदानों में खड़ा दिखाई देता है। लेकिन इसी चमकदार तस्वीर के पीछे एक ऐसी सच्चाई भी है, जिसे अगर अनदेखा किया गया तो यह आर्थिक उपलब्धि खोखली साबित हो सकती है।
आज देश के अधिकांश राज्यों की हालत यह है कि उनकी कुल आय का 70 से 80 प्रतिशत हिस्सा वेतन, पेंशन, ब्याज और मुफ्त योजनाओं पर खर्च हो रहा है। विकास के लिए—यानी सड़क, बिजली, सिंचाई, आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य ढांचे के लिए राज्यों के हाथ में बेहद सीमित संसाधन बचते हैं। पंजाब जैसे राज्य में तो खर्च के लिए महज़ 7 प्रतिशत राशि ही शेष रह जाती है, जबकि उसे हजारों करोड़ रुपये का पुराना कर्ज भी चुकाना है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों की स्थिति भी इससे बहुत अलग नहीं है।
यहाँ सवाल केवल फ्री स्कीम का नहीं है, बल्कि उस आर्थिक मॉडल का है, जिसमें चुनाव जीतने की शर्त के रूप में लुभावनी घोषणाएं की जा रही हैं। मुफ्त बिजली, मुफ्त परिवहन, नकद सहायता, इन सबका तात्कालिक राजनीतिक लाभ जरूर मिलता है, लेकिन इनके दीर्घकालिक आर्थिक परिणामों पर शायद ही गंभीरता से विचार किया जाता है। गरीब को भूखा नहीं मरने देना राज्य का कर्तव्य है, लेकिन बिना काम और बिना उत्पादकता के लगातार नकद सहायता देना समाज को आत्मनिर्भर नहीं, बल्कि निर्भर बनाता है। सुप्रीम कोर्ट की वह टिप्पणी इसी चिंता को रेखांकित करती है, जिसमें कहा गया था कि क्या इस तरह की योजनाओं से परजीवियों की जमात नहीं खड़ी हो रही।
राज्यों की वित्तीय बदहाली को अगर गहराई से देखें, तो एक और खतरनाक तस्वीर सामने आती है कर्ज और ब्याज का दुष्चक्र। कई राज्यों पर कर्ज उनकी राज्य जीडीपी के एक-तिहाई के बराबर या उससे अधिक हो चुका है। पश्चिम बंगाल में राज्य की कमाई का बड़ा हिस्सा केवल ब्याज चुकाने में चला जाता है, जो शिक्षा और स्वास्थ्य के संयुक्त बजट से भी अधिक है। स्थिति यह है कि मूलधन चुकाने के लिए भी राज्यों को नया कर्ज लेना पड़ रहा है। यह विकास नहीं, बल्कि ‘कर्ज उतारने के लिए कर्जÓ की वही नीति है, जिसे व्यंग्य में चारबाग की नीति कहा जा सकता है, जहाँ कर्ज पर कर्ज रखकर ऊपर से घी डाल दिया जाता है और उसे समृद्धि का स्वाद दिया जाता है। हकीकत यह है कि यह नीति भविष्य को गिरवी रखने के अलावा कुछ नहीं है।
विडंबना यह भी है कि जब केंद्र स्तर पर भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत दिखाई देती है, तब राज्य स्तर पर वित्तीय सांसें उखड़ती नजऱ आती हैं। जीएसटी के बाद राज्यों की राजस्व स्वतंत्रता सीमित हुई है, जबकि सामाजिक योजनाओं और रोजगार कार्यक्रमों का बोझ उन्हीं पर है। मनरेगा जैसी योजनाएं नए नामों और नए रूप में राज्यों की जिम्मेदारी बढ़ा रही हैं। चुनाव आते ही चाहे वह बंगाल हो या कोई और राज्य, नई घोषणाओं की बाढ़ आ जाती है, मानो खजाना असीमित हो।
सरकारी खर्च का बड़ा हिस्सा कर्मचारियों के वेतन और पेंशन पर जाने की बात भी अक्सर अधूरी सच्चाई के साथ पेश की जाती है। हकीकत यह है कि देश में लाखों सरकारी पद वर्षों से खाली पड़े हैं, कर्मचारियों को समय पर महंगाई भत्ता नहीं मिल रहा और वेतन आयोग की घोषणाएं भी जमीन पर पूरी तरह लागू नहीं हो पा रही हैं। यानी खर्च बढ़ रहा है, लेकिन प्रशासनिक क्षमता और सेवा गुणवत्ता में वैसी बढ़ोतरी नहीं दिखती।
तो क्या इस स्थिति में यह मान लिया जाए कि भारत की आर्थिक प्रगति महज़ एक भ्रम है? ऐसा कहना भी तथ्यात्मक नहीं होगा। भारत की अर्थव्यवस्था का विस्तार वास्तविक है, निजी क्षेत्र, सेवा उद्योग और बुनियादी ढांचे में निवेश ने देश को आगे बढ़ाया है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अगर राज्यों की वित्तीय सेहत इसी तरह बिगड़ती रही, तो यह प्रगति टिकाऊ नहीं रह पाएगी।
भारत को अगर सचमुच एक मजबूत और समृद्ध अर्थव्यवस्था बनना है, तो सरकारों को फ्रीबीज और वास्तविक कल्याण के बीच स्पष्ट रेखा खींचनी होगी। लोगों को सहायता देना जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है उन्हें काम, कौशल और अवसर देना। मुफ्त की योजनाएं चुनाव जिता सकती हैं, लेकिन वे देश नहीं बनातीं। चौथी या तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का सपना तभी सार्थक होगा, जब राज्यों के खजाने केवल ब्याज चुकाने के लिए नहीं, बल्कि भविष्य गढऩे के लिए खर्च होंगे।