Editor-in-Chief सुभाष मिश्र की कलम से – वक्फ़ संशोधन बिल क्या वोट की राजनीति है ? 

Editor-in-Chief सुभाष मिश्र
-सुभाष मिश्र
पूरे देश में ख़ासकर मुस्लिम समुदाय में वक्फ़ संशोधन बिल को लेकर काफ़ी कुछ संशय बना हुआ है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, एआईएमपीएलबी और बाक़ी मुस्लिम संगठनों को लगता है कि यह बिल वक्फ की मूल प्रकृति को बदल देगा जो इस्लामी परंपरा और शरीयत के आधार पर संचालित होते हैं। वहीं दूसरी ओर सरकार और भाजपा और उसके सहयोगी का कहना है कि वक्फ बोर्डों में भ्रष्टाचार और संपत्तियों के दुरुपयोग की शिकायतें आ रही हैं। बिल में प्रावधानित पंजीकरण और डिजिटलीकरण से संपत्तियों का सही उपयोग होगा। सरकार के नुमाइंदे इसे सच्चर कमेटी (2006) की सिफारिशों के संबंध में वक्फ प्रबंधन में सुधार से भी जोड़कर बता रहे हैं।
देश भर में तमाम विरोध प्रदर्शनों के बीच केंद्र की एनडीए सरकार ने ये फैसला ले लिया है कि वक्फ बोर्ड संशोधन बिल को लोकसभा में 2 अप्रैल को पेश किया जाएगा। संसदीय समिति में कुल 44 संशोधन पेश किए जिसमें करीब 14 संशोधन जगदंबिका पाल की अगुवाई वाली जेपीसी ने स्वीकार कर लिए। वक्फ बिल संशोधन, जिसे औपचारिक रूप से वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 कहा जाता है, भारत सरकार द्वारा प्रस्तावित एक कानून है जो वक्फ अधिनियम, 1995 में बदलाव लाने का प्रयास करता है। इसका उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन, पंजीकरण और निगरानी में सुधार करना है। यह विधेयक 8 अगस्त 2024 को लोकसभा में पेश किया गया था और बाद में इसे संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास विचार के लिए भेजा गया। सरकार ने इसे एकीकृत वक्फ प्रबंधन, सशक्तिकरण, दक्षता और विकास विधेयक नाम देने का प्रस्ताव रखा है।
वक्फ बिल संशोधन विधेयक में कई प्रमुख बदलाव प्रस्तावित है जिनमें
गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति होगी। सभी वक्फ संपत्तियों का पंजीकरण होगा। वक्फ की परिभाषा में बदलाव होगा। बोर्ड में कम से कम दो महिलाओं को शामिल करना अनिवार्य होगा। मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) के लिए मुस्लिम होने की शर्त हटाना और संपत्ति विवादों में जिला कलेक्टर को निर्णायक भूमिका देना है। वक्फ संपत्तियों के रिकॉर्ड को डिजिटल भी कराया जाएगा।
विपक्षियों को सरकार की मंशा पर संदेह है वे इसे बहुसंख्यक वोट की राजनीति से जोड़कर देख रहे हैं। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी (सपा) और कई मुस्लिम संगठन, जैसे ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जमीयत उलेमा-ए-हिंद, इस विधेयक का कड़ा विरोध कर रहे हैं। कांग्रेस का कहना है कि यह विधेयक संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 15 (धर्म के आधार पर भेदभाव निषेध) और 26 (धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार) का उल्लंघन करता है। सपा और मुस्लिम संगठन इसे मुस्लिम समुदाय के खिलाफ एक साजिश के रूप में देखते हैं। वहीं विरोधियों का दावा है कि गैर-मुस्लिमों को वक्फ बोर्ड में शामिल करना और जिला कलेक्टर को संपत्ति विवादों में निर्णय लेने का अधिकार देना मुस्लिम समुदाय की धार्मिक स्वायत्तता को कमजोर करता है। एआईएमपीएलबी और अन्य संगठनों का कहना है कि यह वक्फ की मूल प्रकृति को बदल देगा, जो इस्लामी परंपरा और शरीयत के आधार पर संचालित होती है। वक्फ बाय यूजर (लंबे समय से उपयोग के आधार पर वक्फ की मान्यता) को खत्म करने से मस्जिदों, दरगाहों, मदरसों और कब्रिस्तानों पर दावा कमजोर हो सकता है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार इन संपत्तियों को सरकारी नियंत्रण में लेना चाहती है, जिससे मुस्लिम समुदाय के संसाधन छिन जाएंगे। सपा नेता अखिलेश यादव और कांग्रेस नेताओं ने इसे भाजपा की वोट बैंक की राजनीति करार दिया।
अब यह सवाल उठता है कि क्या यह शरीयत कानून में वाकई दखल है? शरीयत के तहत वक्फ एक धार्मिक और परोपकारी कार्य है, जिसमें संपत्ति को स्थायी रूप से दान कर दिया जाता है। इस संदर्भ में गैर-मुस्लिमों को वक्फ बोर्ड में शामिल करना और वक्फ बनाने के लिए पांच साल की शर्त जैसे प्रावधान इस्लामी कानून के पारंपरिक सिद्धांतों से मेल नहीं खाते। शरीयत में वक्फ का प्रबंधन मुस्लिम समुदाय के हाथ में होना चाहिए और इसमें बाहरी हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं किया जाता। यह विधेयक शरीयत के मूल सिद्धांतों को बदलने की बजाय वक्फ के प्रशासनिक ढांचे को संशोधित करता है। यह धार्मिक नियमों को सीधे चुनौती नहीं देता, बल्कि प्रबंधन और पारदर्शिता पर जोर देता है। हालांकि, मुस्लिम संगठन इसे शरीयत में हस्तक्षेप मानते हैं क्योंकि यह वक्फ की स्वायत्तता और धार्मिक पहचान को प्रभावित करता है।
केंद्र सरकार और भाजपा नेताओं ने इस विधेयक को सही ठहराने के लिए कई तर्क दे रहे हैं। सरकार का कहना है कि वक्फ बोर्डों में भ्रष्टाचार और संपत्तियों के दुरुपयोग की शिकायतें लंबे समय से आ रही है। सरकार का दावा है कि यह विधेयक मुस्लिम महिलाओं, बच्चों और गरीब वर्गों के हित में है, जिन्हें वक्फ की आय से लाभ नहीं मिल पा रहा था। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू और गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि यह बदलाव मुस्लिम समुदाय के भीतर से उठी मांगों का जवाब है, जैसे सच्चर समिति (2006) की सिफारिशें, जिसमें वक्फ प्रबंधन में सुधार की बात कही गई थी। सरकार का तर्क है कि यह संविधान के दायरे में है और किसी के धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं करता। जिला कलेक्टर को अधिकार देने से संपत्ति विवाद जल्दी सुलझेंगे जो पहले जटिल और लंबी प्रक्रिया से गुजरते थे।
वक्फ विधेयक पर राजनीतिक दलों के मुस्लिम नेताओं में असदुद्दीन ओवैसी  ने इस विधेयक को मुस्लिम विरोधी करार देकर वक्फ संशोधन बिल को वक्फ बर्बाद बिल कहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार का एकमात्र मकसद मुसलमानों से नफरत फैलाना और हिंदुत्व की विचारधारा लागू करना है। उनका कहना है कि यह वक्फ संपत्तियों को सरकारी नियंत्रण में लेने की साजिश है। कांग्रेस नेता इमरान मसूद ने इसे मुस्लिम समुदाय के खिलाफ एक राजनीतिक चाल बताया। उनका कहना है कि यह विधेयक भाजपा की हिंदुत्ववादी नीतियों का हिस्सा है जिसका मकसद धार्मिक ध्रुवीकरण करना है। असम के एआईयूडीएफ नेता बदरुद्दीन अजमल ने विधेयक को शरीयत में हस्तक्षेप करार दिया। उनका कहना है कि वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन मुस्लिम समुदाय का आंतरिक मामला है और इसमें सरकार को दखल देने का कोई अधिकार नहीं है। अखिलेश यादव (समाजवादी पार्टी) ने इसे भाजपा की वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा बताया। उनका कहना है कि यह विधेयक मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाकर सामाजिक तनाव पैदा करने की कोशिश है। मौलाना अरशद मदनी (जमीयत उलेमा-ए-हिंद) ने कहा है कि सरकार वक्फ संपत्तियों को हड़पना चाहती है।
वक्फ संपत्तियों को लेकर लंबे समय से यह आरोप लगते रहे हैं कि कुछ प्रभावशाली लोग और समूह इन पर अवैध कब्जा करते हैं या इन्हें बेचते हैं। तमिलनाडु के त्रिचि जिले में एक गांव की 1500 साल पुरानी संपत्ति पर वक्फ बोर्ड ने दावा ठोका, जिसमें हिंदू मंदिर भी शामिल था। स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह कब्जा प्रभावशाली मुस्लिम नेताओं और अधिकारियों की मिलीभगत से हुआ। गुजरात के द्वारका में भी ऐतिहासिक स्थलों को वक्फ संपत्ति घोषित करने की कोशिश हुई, जिसे लेकर विवाद हुआ।
कई राज्यों में वक्फ संपत्तियों को गैर-कानूनी तरीके से बेचे जाने की शिकायतें सामने आई हैं। उदाहरण के लिए, हैदराबाद में एक पांच सितारा होटल की जमीन को वक्फ संपत्ति बताया गया, लेकिन बाद में पता चला कि इसे निजी हाथों में बेच दिया गया। दिल्ली में वक्फ बोर्ड की जमीन पर बड़े पैमाने पर अतिक्रमण और अवैध निर्माण की रिपोर्टें हैं। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने कहा कि 90 प्रतिशत से ज्यादा वक्फ संपत्तियां मस्जिदों और कब्रिस्तानों की है जिनसे कोई आय नहीं होती। फिर भी इन पर कब्जा और विवाद जारी है।
वहीं सरकार का दावा है कि वक्फ बोर्डों में भ्रष्टाचार और संपत्तियों के दुरुपयोग के चलते यह संशोधन जरूरी है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि कई संपत्तियां कुछ खास लोगों के हाथों में चली गई हैं, जिसे रोकने के लिए पारदर्शिता जरूरी है।
हालांकि, वक्फ संपत्तियों की सटीक संख्या और उनके मूल्य को लेकर कोई आधिकारिक आंकड़ा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है, क्योंकि इनका रिकॉर्ड पूरी तरह डिजिटल नहीं हुआ है। सरकार के अनुसार, देश भर में लगभग 8.7 लाख वक्फ संपत्तियां पंजीकृत हैं। इनमें मस्जिदें, कब्रिस्तान, दरगाहें, मदरसे और अन्य जमीनें शामिल हैं। कुछ रिपोर्ट्स का दावा है कि यह संख्या 9 लाख से ज्यादा हो सकती है, क्योंकि कई संपत्तियां अभी भी सर्वेक्षण और पंजीकरण के दायरे से बाहर है। वक्फ बोर्ड के पास देश में रेलवे और रक्षा मंत्रालय के बाद सबसे ज्यादा जमीन होने का अनुमान है। दिल्ली में वक्फ बोर्ड के पास 9 लाख एकड़ से अधिक जमीन होने का दावा किया जाता है, जबकि दिल्ली का कुल क्षेत्रफल करीब 3.6 लाख एकड़ है। हालांकि, यह दावा विवादास्पद है और इसकी पुष्टि नहीं हुई।
सच्चर समिति ने अनुमान लगाया था कि वक्फ संपत्तियों की संख्या लाखों में है और अगर इनका सही प्रबंधन हो तो ये मुस्लिम समुदाय के लिए बड़ा संसाधन बन सकती हैं।
मुस्लिम नेताओं के बयानों से स्पष्ट है कि वक्फ संशोधन विधेयक को लेकर उनके अंदर गहरी नाराजगी और आशंका है। वे इसे धार्मिक स्वतंत्रता और संपत्ति अधिकारों पर हमला मानते हैं। दूसरी ओर वक्फ संपत्तियों पर कब्जे और बिक्री के मामले वास्तविक समस्या की ओर इशारा करते हैं, जिसे सरकार भ्रष्टाचार और दुरुपयोग का कारण बताती है।
वक्फ बिल संशोधन एक प्रशासनिक सुधार के रूप में प्रस्तुत किया गया है, लेकिन इसके कुछ प्रावधानों ने इसे विवादास्पद बना दिया है। कांग्रेस, सपा और मुस्लिम संगठन इसे धार्मिक स्वतंत्रता और संपत्ति अधिकारों पर हमला मानते हैं, जबकि सरकार इसे पारदर्शिता और समुदाय के कल्याण के लिए जरूरी बताती है। शरीयत में दखल का सवाल व्याख्या पर निर्भर करता है, लेकिन यह स्पष्ट है कि यह विधेयक मुस्लिम समुदाय के बीच गहरी चिंता पैदा कर रहा है।