-सुभाष मिश्र
निर्देशक आदित्य धर की फिल्म धुरंधर: द रिवेंज आज सिर्फ एक फिल्म नहीं रह गई है, यह एक ऐसा आईना बन गई है जिसमें सिनेमा, सियासत और समाज तीनों की परछाइयां एक साथ दिखाई देती हैं। रणवीर सिंह अभिनीत यह फिल्म जहां एक तरफ बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड तोड़ कमाई कर रही है, वहीं दूसरी तरफ अपने कंटेंट, किरदारों और वैचारिक झुकाव को लेकर तीखी बहस के केंद्र में है। यह वही दौर है जहां फिल्में सिर्फ मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि नैरेटिव गढ़ती हैं और धुरंधर 2 उसी प्रवृत्ति का सबसे ताजा उदाहरण बनकर सामने आई है।
फिल्म की शुरुआत जसकिरत सिंह उर्फ हमजा से होती है, जो एक व्यक्तिगत त्रासदी के बाद बदले की आग में जलता हुआ एक ऐसी मशीन में बदल जाता है, जिसके लिए हिंसा ही भाषा है और मिशन ही जीवन। शुरुआती दृश्य ही बता देते हैं कि यह फिल्म कितनी आक्रामक और क्रूर होने वाली है। आंखें फोडऩा, शरीर को चीर देना, सिर कलम करना—यह सब इतने विस्तार और आवृत्ति के साथ दिखाया गया है कि कुछ समय बाद यह चौंकाने के बजाय सुन्न करने लगता है। जो दर्शक एक्शन के लिए फिल्म देखने आते हैं, उन्हें यह सब रोमांचित कर सकता है, लेकिन एक बड़े दर्शक वर्ग के लिए यह थकाऊ अनुभव बन जाता है।
पहले भाग की तुलना में इस बार फिल्म का फोकस भी बदल जाता है। जहां पहले पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति और जासूसी नेटवर्क की जटिलता कहानी की रीढ़ थे, वहीं इस बार कथा का केंद्र नोटबंदी 2016 और उससे जुड़ा एक ऐसा नैरेटिव बन जाता है, जो सीधे राजनीतिक बहस में प्रवेश करता है। फिल्म यह स्थापित करने की कोशिश करती है कि नोटबंदी कोई साधारण आर्थिक फैसला नहीं, बल्कि एक गहरी खुफिया साजिश को नाकाम करने की रणनीति थी। यही वह जगह है जहां से विवाद शुरू होता है और फिल्म मनोरंजन से आगे बढ़कर विचारधारा का माध्यम बन जाती है।
फिल्म में ‘आतिफ अहमद’ का किरदार साफ तौर पर अतीक अहमद से प्रेरित दिखाई देता है और अंडरवर्ल्ड के संदर्भ में दाऊद इब्राहिम को भी कहानी में पिरोया गया है। लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि क्या यह पूरा सच है या सिर्फ एक चुना हुआ सच? आलोचकों का कहना है कि फिल्म कुछ तथ्यों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती है और कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं को पूरी तरह छोड़ देती है। इससे कहानी एकतरफा और सुविधाजनक लगने लगती है, जैसे वास्तविकता को एक खास फ्रेम में फिट किया जा रहा हो।
यही कारण है कि इस फिल्म को लेकर प्रोपेगेंडा बनाम क्रिएटिव स्वतंत्रता की बहस भी तेज हो गई है। ध्रुव राठी जैसे लोग इसे खुला प्रचार बताते हैं, तो दूसरी तरफ फिल्म इंडस्ट्री का एक वर्ग इसे निर्देशक की अभिव्यक्ति की आजादी मानता है। यह बहस नई नहीं है, The Kerala Story जैसी फिल्मों के समय भी यही सवाल उठा था कि क्या सिनेमा अब सिर्फ कहानी कहने का माध्यम है या वह विचारधारा स्थापित करने का औजार बन चुका है।
मनोरंजन के स्तर पर भी फिल्म एक समान अनुभव नहीं देती। कुछ हिस्से बेहद रोचक और बांधने वाले हैं, लेकिन उनके बीच लंबे और खिंचे हुए हिस्से आते हैं, जहां कहानी अपनी पकड़ खो देती है। करीब चार घंटे की लंबाई फिल्म को और भारी बना देती है। कई दृश्य ऐसे लगते हैं जैसे उन्हें संपादन में हटाया जा सकता था, लेकिन उन्हें जोड़ दिया गया है, जिससे गति बार-बार टूटती है और दर्शक का धैर्य भी।
पहले भाग में रहमान डकैत जैसा प्रभावशाली खलनायक था, जिसकी कमी इस फिल्म में साफ महसूस होती है। इस बार वैसा कोई मजबूत विरोधी नहीं है जो नायक के बराबरी का टकराव पैदा कर सके। अर्जुन रामपाल का किरदार भी देर से असर डालता है और कहानी को वह मजबूती नहीं दे पाता जिसकी जरूरत थी। कई सबप्लॉट अधूरे छूट जाते हैं, जिससे फिल्म का भावनात्मक जुड़ाव कमजोर पड़ता है।
तकनीकी पक्ष भी पूरी तरह संतुलित नहीं है। बैकग्राउंड स्कोर कई जगहों पर दृश्य पर हावी हो जाता है, और एक्शन सीक्वेंस भले ही बड़े और भव्य दिखते हों, उनमें वह नवीनता नहीं है जो पहले भाग में थी। बार-बार वही विस्फोट, वही गोलियां, वही खून—यह दोहराव फिल्म को धीरे-धीरे थका देता है। सिगरेट, गाली-गलौज और आक्रामक संवादों की भरमार इसे और ज्यादा असहज बनाती है।
फिल्म का वैचारिक स्वर भी लगातार चर्चा में है। इसमें राष्ट्रवाद, भय और एक विशेष तरह के भविष्य की कल्पना बार-बार सामने आती है। कुछ संवाद और दृश्य ऐसे हैं जो एक समुदाय विशेष को लेकर असुरक्षा का माहौल बनाते हैं। हालांकि, फिल्म कुछ जगहों पर यह भी दिखाती है कि आम पाकिस्तानी नागरिक इन सब से अलग हैं और असली खेल कुछ संगठित समूहों का है, लेकिन यह संतुलन पूरी फिल्म में कायम नहीं रह पाता।
इसके बावजूद फिल्म को लेकर दर्शकों की दीवानगी कम नहीं है। नोएडा में पेड प्रीव्यू के दौरान हुए हंगामे से लेकर सोशल मीडिया पर चल रही बहस तक, यह साफ है कि फिल्म ने दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ लिया है। बॉक्स ऑफिस पर इसकी सफलता यह भी बताती है कि विवाद और लोकप्रियता अक्सर एक-दूसरे के पूरक होते हैं।
असल में धुरंधर 2 उस दौर की फिल्म है जहां कहानी सिर्फ कहानी नहीं रहती, वह एक दृष्टिकोण बन जाती है। यहां सच और गढ़े गए सच के बीच की रेखा इतनी महीन हो जाती है कि दर्शक के लिए उसे पहचान पाना मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि यह फिल्म जितनी स्क्रीन पर चलती है, उससे कहीं ज्यादा लोगों के दिमाग और बहसों में चलती रहती है।