बदलते बस्तर में उमड़ता जनसैलाब : शांति, विकास और चुनौती का संगम

-सुभाष मिश्र
बस्तर आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां अतीत की छाया और भविष्य की संभावनाएँ आमने-सामने दिखाई देती हैं। दशकों तक नक्सल हिंसा और भय के पर्याय रहे इस क्षेत्र में अब बदलाव की आहट केवल सुनाई नहीं दे रही, बल्कि स्पष्ट रूप से दिखाई भी देने लगी है। ‘बस्तर हेरिटेज मैराथन 2026Ó जैसे आयोजनों में हजारों लोगों की भागीदारी इसी परिवर्तन की सबसे सशक्त तस्वीर बनकर उभरी है। जब कोई समाज भय से बाहर निकलकर उत्सव और सहभागिता की ओर बढ़ता है, तो वह केवल एक आयोजन नहीं करता, बल्कि अपनी नई पहचान गढ़ता है।
सरकार ने 31 मार्च तक बस्तर को नक्सलमुक्त करने का लक्ष्य रखा है। यह लक्ष्य जितना महत्वाकांक्षी है, उतना ही जटिल भी। क्योंकि नक्सलवाद केवल बंदूक का सवाल नहीं, बल्कि दशकों में बना एक वैचारिक और संरचनात्मक नेटवर्क है, जिसकी जड़ें दूरदराज़ के इलाकों, विशेषकर अबूझमाड़ जैसे दुर्गम क्षेत्रों तक फैली हुई हैं। ऐसे में यह मान लेना कि किसी एक तारीख के बाद यह समस्या पूरी तरह समाप्त हो जाएगी, वास्तविकता से परे होगा लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि जिस गति से सुरक्षा बलों की कार्रवाई, आत्मसमर्पण की घटनाएँ और विकास कार्य एक साथ आगे बढ़ रहे हैं, उससे इस नेटवर्क का क्षरण निश्चित रूप से तेज हुआ है।
बस्तर में आज जो बदलाव दिख रहा है, वह बहुआयामी है। सड़क, संचार और सुरक्षा के नेटवर्क का विस्तार उन क्षेत्रों तक पहुँच रहा है, जहां कभी शासन की उपस्थिति नाममात्र थी। शिक्षा के क्षेत्र में दंतेवाड़ा में 24 घंटे संचालित लाइब्रेरी और उभरते एजुकेशन हब जैसे प्रयोग इस बात के संकेत हैं कि नई पीढ़ी को बंदूक की जगह किताब से जोडऩे की कोशिश गंभीरता से हो रही है। यही युवा आज मैराथन में दौड़ते नजर आते हैं, प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होते हैं और अपने भविष्य को नए सिरे से गढऩे की आकांक्षा रखते हैं।
इसी बीच सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों का विस्तार भी उल्लेखनीय है। ‘पंडूमÓ जैसे पारंपरिक आयोजनों का पुनर्जीवन और राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रमों का बस्तर में आयोजन यह दर्शाता है कि यह क्षेत्र अब केवल सुरक्षा विमर्श का विषय नहीं रह गया है, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान के साथ मुख्यधारा में स्थान बना रहा है। देश के सर्वोच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों का लगातार बस्तर आना—चाहे वह राष्ट्रपति का दौरा हो या केंद्रीय गृह मंत्री की सक्रियता यह संकेत देता है कि बस्तर अब राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के केंद्र में है।
लेकिन इस पूरी तस्वीर का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। नक्सली गतिविधियाँ अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। समय-समय पर उनके षड्यंत्रों का खुलासा, मुठभेड़ों की खबरें और आत्मसमर्पण की घटनाएं यह बताती हैं कि यह संघर्ष अभी जारी है। यह एक संक्रमणकाल है, जहाँ एक ओर विकास की रफ्तार तेज हो रही है, वहीं दूसरी ओर पुरानी चुनौतियां अंतिम प्रतिरोध कर रही हैं।
ऐसे समय में ‘बस्तर हेरिटेज मैराथनÓ जैसे आयोजन केवल खेल नहीं रहते, बल्कि सामाजिक मनोविज्ञान को बदलने के माध्यम बन जाते हैं। जब हजारों लोग एक साथ सड़कों पर उतरते हैं, दौड़ते हैं, उत्सव मनाते हैं, तो वे अनजाने में ही भय के उस वातावरण को तोड़ते हैं, जिसने वर्षों तक इस क्षेत्र को जकड़े रखा था। यह जनसैलाब एक संदेश देता है कि बस्तर अब केवल संघर्ष की कहानी नहीं, बल्कि संभावनाओं की नई गाथा लिख रहा है।
इसी परिवर्तन के बीच एक और अहम चुनौती उभरती है, जिस पर सरकार और प्रशासन को समान रूप से संवेदनशील रहना होगा। बस्तर में तैनात होने वाली शासकीय मशीनरी और अधिकारियों की भूमिका निर्णायक होगी। अतीत में नक्सलवाद के पनपने के पीछे केवल भौगोलिक कठिनाई नहीं, बल्कि विकास योजनाओं की कमजोर क्रियान्वयन, संवेदनहीन प्रशासन और जनजातीय समाज के साथ संवाद की कमी भी प्रमुख कारण रहे हैं। ऐसे में अब जब पुनर्वास नीतियाँ, विकास योजनाएं और विश्वास बहाली के प्रयास तेज हुए हैं, तो यह सुनिश्चित करना होगा कि ज़मीनी स्तर पर उनका प्रभाव वास्तविक और महसूस करने योग्य हो। अधिकारियों का व्यवहार, उनकी कार्यशैली और आदिवासी समाज के साथ उनका जुड़ाव ही तय करेगा कि लोगों के मन में भरोसा मजबूत होता है या फिर पुरानी शंकाएं लौटती हैं। साथ ही बस्तर को एक ऐसे मॉडल के रूप में विकसित करना होगा, जहाँ विकास और परंपरा के बीच संतुलन बना रहे, जनजातीय संस्कृति, सामाजिक पर्व और स्थानीय पहचान सुरक्षित रहे। समाज के भीतर उभर रहे नए अंतर्विरोध जैसे परंपरागत और परिवर्तित सामाजिक समूहों के बीच तनाव या कांकेर जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति इन पर भी सतर्क नजर रखना आवश्यक होगा, ताकि विकास का यह सफर सामाजिक समरसता के साथ आगे बढ़े।
बस्तर का यह बदलाव एक दिन में नहीं आया है और न ही एक दिन में पूरा होगा। 1 अप्रैल कोई जादुई रेखा नहीं होगी, जिसके पार जाते ही सारी समस्याएँ समाप्त हो जाएँगी। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जिस दिशा में बस्तर आज आगे बढ़ रहा है, वह उसे स्थायी शांति और विकास की ओर ले जा सकती है। जरूरत इस बात की है कि सुरक्षा, विकास और विश्वास इन तीनों स्तंभों को समान रूप से मजबूत किया जाए।
आज बस्तर की सड़कों पर दौड़ता हुआ युवा, हाथ में किताब लिए छात्र, और उत्सव में शामिल होता समाज ये सभी मिलकर एक नए बस्तर की तस्वीर गढ़ रहे हैं। यह बदलाव केवल शासन की नीतियों का परिणाम नहीं, बल्कि वहां के लोगों की बदलती सोच और उम्मीदों का भी प्रतीक है और यही उम्मीद आने वाले समय में बस्तर को न केवल नक्सलवाद से मुक्त करेगी, बल्कि उसे विकास और समृद्धि की नई ऊँचाइयों तक भी ले जाएगी।

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