त्योहारों के बदलते स्वरूप

-सुभाष मिश्र

अभी होली का त्योहार बीता है और कई जगहों पर रंग पंचमी भी मनाई जा रही है, लेकिन जो लोग लंबे समय से इस त्योहार को देखते आए हैं उनका कहना है कि अब होली पहले जैसी नहीं रही। त्योहार जैसे बदले-बदले से लगने लगे हैं। कभी होली ऐसा उत्सव था जिसमें केवल रंग नहीं होते थे, बल्कि रिश्तों की गर्माहट, मेल-मिलाप और समाज की सामूहिकता दिखाई देती थी। गांवों में गाने वालों की टोलियाँ निकलती थीं, फाग और होरी के गीत गाए जाते थे, लोग एक-दूसरे के घर जाते थे, रंग लगाते थे, मिठाई खिलाते थे और देर तक बैठकर बातें करते थे। ऐसा लगता था कि पूरा गांव या पूरा मोहल्ला एक परिवार बन गया है।
अब यह दृश्य धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। कई जगहों पर देखने में आता है कि थोड़े बहुत युवा लड़के चौराहों पर रंग खेलते दिखाई देते हैं, पर बाकी लोग या तो घरों के भीतर रहते हैं या रंगों से बचते हुए निकल जाते हैं। गांवों में भी जहां पहले महिलाएं समूह बनाकर एक-दूसरे के घर जाती थीं, गीत गाती थीं और सामूहिक उत्सव का माहौल बनता था, अब वह परंपरा कम होती दिख रही है। कई लोगों का अनुभव है कि वे हाल में गांव गए तो पाया कि महिलाएं भी पहले की तरह घरों से नहीं निकलीं और सामूहिक मिलना-जुलना भी कम हो गया।
शहरों की स्थिति तो और भी अलग है। यहां त्योहार कई बार केवल औपचारिकता बनकर रह गए हैं। कहीं क्लबों या हाउसिंग सोसाइटी में कुछ घंटों का कार्यक्रम हो जाता है, कहीं रंग-गुलाल का प्रतीकात्मक आदान-प्रदान हो जाता है और फिर सब अपने-अपने काम में लग जाते हैं। कई लोग त्योहार को लंबे वीकेंड की तरह लेते हैं और घूमने निकल जाते हैं। रिश्तेदारों के घर जाकर रंग लगाने या मिलने की जो परंपरा थी, वह भी धीरे-धीरे कमजोर पड़ती जा रही है।
इस बदलाव के पीछे कई कारण हैं। जीवन की भागदौड़ और शहरी जीवनशैली ने लोगों को व्यस्त और कुछ हद तक एकाकी बना दिया है। पहले मोहल्ले और गांव सामाजिक जीवन के केंद्र होते थे, अब लोगों का जीवन निजी दायरों में सिमटता जा रहा है। मनोरंजन के साधन भी बदल गए हैं। टीवी, क्रिकेट, मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म ने लोगों को घरों के भीतर ही व्यस्त कर दिया है। पहले त्योहार ही वह अवसर होते थे जब लोग बाहर निकलकर मिलते थे, अब आभासी दुनिया ने वास्तविक मुलाकातों की जगह ले ली है।
त्योहारों के स्वरूप में बाजार का प्रभाव भी लगातार बढ़ा है। आज त्योहारों के साथ बड़े पैमाने पर उपभोक्तावाद जुड़ गया है। गिफ्ट पैक, ऑनलाइन ऑफर, थीम पार्टियां और इवेंट मैनेजमेंट जैसे तत्व त्योहारों को एक तरह के बाजारू आयोजन में बदल रहे हैं। इससे त्योहार की आत्मीयता और सामाजिकता का वह पक्ष कमजोर पड़ता है जिसमें लोग बिना किसी औपचारिकता के एक-दूसरे के घर जाकर मिलते थे।
कुछ सामाजिक कारण भी इस बदलाव के पीछे हैं। कई जगहों पर त्योहारों के दौरान होने वाली असभ्य हरकतों या असुरक्षा की भावना के कारण भी लोग खुलकर भाग लेने से बचते हैं। विशेष रूप से महिलाएं और बुजुर्ग कई बार घर के भीतर ही रहना सुरक्षित समझते हैं। परिणाम यह होता है कि त्योहार का सामूहिक स्वरूप कमजोर हो जाता है और वह सीमित समूहों तक सिमट कर रह जाता है।
भारत की पहचान उसके विविध रंगों और त्योहारों से रही है। यहां के उत्सव केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन के महत्वपूर्ण अवसर रहे हैं। वे रिश्तों को मजबूत करते थे, समुदाय को जोड़ते थे और समाज में एक तरह की आत्मीयता पैदा करते थे। यदि त्योहारों से यह मानवीय तत्व कम होता जाएगा तो उनकी मूल भावना भी कमजोर पड़ जाएगी।
समाज समय के साथ बदलता है और त्योहारों का स्वरूप भी बदलना स्वाभाविक है, लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि इन उत्सवों की आत्मा बची रहे। त्योहार केवल छुट्टी या मनोरंजन का अवसर नहीं, बल्कि समाज को जोडऩे का माध्यम भी हैं। अगर परिवार, मोहल्ले और समुदाय के स्तर पर फिर से मेल-मिलाप की परंपरा को महत्व दिया जाए, औपचारिक संदेशों की जगह वास्तविक मुलाकातों को बढ़ावा दिया जाए, तो त्योहारों की वह पुरानी गर्माहट और मानवीयता फिर से लौट सकती है।
भारत को त्योहारों का देश कहा जाता है। यह पहचान केवल कैलेंडर में दर्ज तारीखों से नहीं बनती, बल्कि उन रिश्तों और भावनाओं से बनती है जो इन त्योहारों के माध्यम से समाज में जीवित रहती हैं। इसलिए यह समय केवल त्योहार मनाने का नहीं, बल्कि यह सोचने का भी है कि कहीं हम आधुनिकता और व्यस्तता की दौड़ में अपने उत्सवों की आत्मा तो नहीं खो रहे।

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