पत्रकार सुरक्षा कानून की तरह शासकीय सेवक सुरक्षा कानून भी जरूरी

छत्तीसगढ़ का समाज और शासन व्यवस्था हमेशा लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा का सम्मान करने वाला रहा है। पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया है, और राज्य स...

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बिहार का चुनाव और तनाव

बिहार फिर चुनावी तपिश में है। यहां चुनाव महज़ लोकतंत्र का पर्व नहीं, बल्कि जाति, वर्ग, रोजगार और सत्ता के समीकरणों का संघर्ष भी होता है। हर बार की तरह इस बार ...

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क्या यह जातिगत मानसिकता का हमला है?

6 अक्टूबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट की एक सुनवाई के दौरान जो दृश्य उभरा, उसने न केवल न्यायालयीन गरिमा को हिलाकर रख गया बल्कि हमारे समाज के भीतर चल रहे गहरे तनाव-ल...

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सनातनी मानसिकता की चोट, सुप्रीम कोर्ट घायल

भारत में लोकतंत्र की नींव न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर आधारित है, जो सत्ता, धर्म, राजनीति और समाज के बीच संतुलन बनाए रखती है। जब इस स्वतंत्रता पर हमला होता है...

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ए रामचंद्रन होने के मायने

राजेन्द्र शर्माबीते साल 10 फरवरी 2024 को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त चित्रकार और मूर्तिकार ए रामचन्द्रन इस फानी दुनिया से रुखसत हो गए। 89 वर्षीय ए ...

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“डबल-ट्रिपल इंजन और सरकारी कछुए की रफ़्तार”

सरकार चाहे डबल इंजन की हो या ट्रिपल, इंजन की आवाज़ ज़रूर गूंजती है—पर सरकारी गाड़ी फिर भी उसी गति से चलती है, जैसी फाइलें मंत्रालयों की अलमारियों में सरकती है...

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आस्था का सम्मोहन और मौत का मेला

इस देश में आस्था कभी मंदिर के दरवाज़े पर सिर झुकवाती है, कभी चुनावी मंच पर नेता की झलक दिखाने के लिए भीड़ को पसीना बहवाती है। लोग देवता हों या अभिनेता, बाबाओं...

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बदलता बस्तर : कितना आंतरिक कितना बाहरी !

(नक्सली हिंसा की आँच जंगल से शहर की ओर )सुभाष मिश्रपिछले कुछ समय...

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गुड़ खायें, गुलगुले से परहेज करें

गुड़ खाए और गुलगुले से परहेज़ करें—भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट का ताज़ा खेल यही कहावत दोहराता दिख रहा है। नेताओं की जुबान पर जंग, खिलाडिय़ों की हरकतों में...

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हंसा कर ले किलोल, जाने कभेरे मर जाने

दिनेश चौधरीथियेटर करने वाले लोग थोड़े जुनूनी किस्म के होते हैं, पर अरुण पाण्डेय कुछ ज्यादा ही थे। इसे साधने के फेर में खुद को निचोड़ डाला। सिर्फ नाटक ही करना ...

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