सिनेमा के आईने में समाज-जॉली एलएलबी 3 : अदालत में गूँजती कविता और किसानों की चुप्पी

फिल्म की शुरुआत में एक वकील नहीं, एक कवि बैठा दिखता है। उसकी मेज़ पर गजानन माधव मुक्तिबोध की तस्वीर रखी है—वही मुक्तिबोध जो कहा करते थे, कहीं कोई तो होगा, जो ...

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“डबल-ट्रिपल इंजन और सरकारी कछुए की रफ़्तार”

सरकार चाहे डबल इंजन की हो या ट्रिपल, इंजन की आवाज़ ज़रूर गूंजती है—पर सरकारी गाड़ी फिर भी उसी गति से चलती है, जैसी फाइलें मंत्रालयों की अलमारियों में सरकती है...

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अमित शाह की बस्तर यात्रा के मायने

-सुभाष मिश्रछत्तीसगढ़ का बस्तर, जो कभी भय और रक्तपात की पहचान बन गया था, अब एक नए इतिहास के पन्ने पर खड़ा है। य...

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आस्था का सम्मोहन और मौत का मेला

इस देश में आस्था कभी मंदिर के दरवाज़े पर सिर झुकवाती है, कभी चुनावी मंच पर नेता की झलक दिखाने के लिए भीड़ को पसीना बहवाती है। लोग देवता हों या अभिनेता, बाबाओं...

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बदलता बस्तर : कितना आंतरिक कितना बाहरी !

(नक्सली हिंसा की आँच जंगल से शहर की ओर )सुभाष मिश्रपिछले कुछ समय...

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गुड़ खायें, गुलगुले से परहेज करें

गुड़ खाए और गुलगुले से परहेज़ करें—भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट का ताज़ा खेल यही कहावत दोहराता दिख रहा है। नेताओं की जुबान पर जंग, खिलाडिय़ों की हरकतों में...

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महिला सशक्तिकरण या चुनावी सौदा?

बिहार की महिलाओं के खाते में पहुँचे 10-10 हज़ार, सवाल यह कि राहत स्थायी है या वोटों की रिश्वत। भारतीय राजनीति का इतिहास नारों की कब्रगाह है। कभी गरीबी हटाओ ने...

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रंगबिरादरी खड़े करने वाले अरूण पांडेय को सभी ने किया याद…

हम दोनों हरिशंकर परसाई स्कूल से हैं । हमारा स्कूल एक था,हमारा कुनबा एक था। और हमारा DNA एक हैं, क्योंकि हम उसी तरह से चीजों को बदलने की कोशिश करते हैं जैसे पर...

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