फिल्म की शुरुआत में एक वकील नहीं, एक कवि बैठा दिखता है। उसकी मेज़ पर गजानन माधव मुक्तिबोध की तस्वीर रखी है—वही मुक्तिबोध जो कहा करते थे, कहीं कोई तो होगा, जो ...
सरकार चाहे डबल इंजन की हो या ट्रिपल, इंजन की आवाज़ ज़रूर गूंजती है—पर सरकारी गाड़ी फिर भी उसी गति से चलती है, जैसी फाइलें मंत्रालयों की अलमारियों में सरकती है...
इस देश में आस्था कभी मंदिर के दरवाज़े पर सिर झुकवाती है, कभी चुनावी मंच पर नेता की झलक दिखाने के लिए भीड़ को पसीना बहवाती है। लोग देवता हों या अभिनेता, बाबाओं...
गुड़ खाए और गुलगुले से परहेज़ करें—भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट का ताज़ा खेल यही कहावत दोहराता दिख रहा है। नेताओं की जुबान पर जंग, खिलाडिय़ों की हरकतों में...
बिहार की महिलाओं के खाते में पहुँचे 10-10 हज़ार, सवाल यह कि राहत स्थायी है या वोटों की रिश्वत। भारतीय राजनीति का इतिहास नारों की कब्रगाह है। कभी गरीबी हटाओ ने...
हम दोनों हरिशंकर परसाई स्कूल से हैं । हमारा स्कूल एक था,हमारा कुनबा एक था। और हमारा DNA एक हैं, क्योंकि हम उसी तरह से चीजों को बदलने की कोशिश करते हैं जैसे पर...