फिल्म की शुरुआत में एक वकील नहीं, एक कवि बैठा दिखता है। उसकी मेज़ पर गजानन माधव मुक्तिबोध की तस्वीर रखी है—वही मुक्तिबोध जो कहा करते थे, कहीं कोई तो होगा, जो ...
दिनेश चौधरीथियेटर करने वाले लोग थोड़े जुनूनी किस्म के होते हैं, पर अरुण पाण्डेय कुछ ज्यादा ही थे। इसे साधने के फेर में खुद को निचोड़ डाला। सिर्फ नाटक ही करना ...
विवेचना रंगमंडल जबलपुर के ज़रिए अपनी लंबी और यादगार रंगयात्रा तय करके एक बड़ी रंगबिरादरी खड़े करने वाले अरूण पांडेय के रंगकर्म, संबंधों और नाटक के प्रति उनके ...