सरकार की प्राथमिकता में बस्तर

सरकार की प्राथमिकता में बस्तर

सुभाष मिश्र
केंद्र में भाजपा सरकार हो या छत्तीसगढ़ में, इन दिनों यदि किसी एक भू-भाग पर सबसे अधिक राजनीतिक, प्रशासनिक और सुरक्षा स्तर की गतिविधियाँ केंद्रित दिखाई देती हैं, तो वह बस्तर है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का सुदूर बस्तर क्षेत्र में पहुँचना, बस्तर पंडुम जैसे आदिवासी सांस्कृतिक आयोजन में उनकी भागीदारी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की बार-बार की यात्राएँ, बस्तर दशहरे में उनकी उपस्थिति और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय सहित पूरे मंत्रिमंडल का बस्तर में डेरा, ये घटनाएँ किसी सामान्य शासकीय औपचारिकता का हिस्सा नहीं कही जा सकतीं। यह संकेत हैं कि इस समय बस्तर सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में है।

बस्तर पर अचानक इतना तीव्र फोकस क्यों है, यह प्रश्न स्वाभाविक है। पहली नजऱ में इसका उत्तर नक्सलवाद के उन्मूलन से जुड़ा दिखाई देता है। सरकार बार-बार यह दोहरा चुकी है कि 31 मार्च 2026 तक छत्तीसगढ़ को नक्सल-मुक्त किया जाएगा। इसी लक्ष्य को लेकर सुरक्षा एजेंसियों की सक्रियता बढ़ी है, उच्चस्तरीय बैठकें हो रही हैं और राजनीतिक नेतृत्व की मौजूदगी पहले से कहीं अधिक दिखाई दे रही है। नक्सलवाद ने दशकों तक बस्तर के विकास को बाधित किया है। सडक़, पुल, स्कूल, अस्पताल जैसी बुनियादी ज़रूरतें या तो अधूरी रहीं या सुरक्षा कारणों से ठप पड़ी रहीं। हालांकि यह भी सच है कि जिन इलाकों में नक्सली प्रभाव कमजोर पड़ा, वहाँ भी विकास अपेक्षित गति से नहीं हो पाया। भ्रष्टाचार, निगरानी की कमी और स्थानीय जवाबदेही का अभाव इस क्षेत्र की पुरानी समस्याएँ रही हैं।

आंकड़े बताते हैं कि 2023 में छत्तीसगढ़ में नक्सल हिंसा में कमी दर्ज की गई थी। उस वर्ष नक्सल हिंसा से जुड़ी कुल मौतों की संख्या लगभग 86 रही थी, जिसमें नागरिक, सुरक्षा बल और नक्सली शामिल थे। लेकिन 2024 में नक्सल विरोधी अभियानों की तीव्रता बढऩे के साथ हिंसक घटनाओं और मुठभेड़ों की संख्या में इज़ाफा हुआ। इस वर्ष नक्सल संबंधित घटनाएँ बढक़र लगभग 288 तक पहुँच गईं और कुल मौतों का आंकड़ा 300 से अधिक रहा, जिनमें बड़ी संख्या नक्सलियों की थी। आईईडी ब्लास्ट, मुठभेड़ और सर्च ऑपरेशन की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बढ़ोतरी नक्सलियों की मजबूती का नहीं, बल्कि सुरक्षा बलों की उन इलाकों में गहरी पैठ का संकेत है, जहाँ पहले उनकी पहुँच सीमित थी।

दिसंबर 2023 में भाजपा सरकार बनने के बाद नक्सल विरोधी रणनीति केवल मुठभेड़ों तक सीमित नहीं रही। 2025 तक के आंकड़े बताते हैं कि 2000 से अधिक नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया या निष्क्रिय हुए हैं, हिड़मा जैसे बड़े कैडरों सहित लगभग 500 नक्सली मारे गए या गिरफ्तार किए गए हैं और बड़ी मात्रा में हथियार, आईईडी सामग्री तथा संचार उपकरण बरामद किए गए हैं। आत्मसमर्पण करने वालों के लिए पुनर्वास पैकेज, कौशल प्रशिक्षण और मुख्यधारा में वापसी की योजनाओं पर भी सरकार ने ज़ोर दिया है, जिससे संगठन के निचले और मध्यम स्तर के कैडर में टूटन के संकेत मिले हैं।

नक्सलवाद के अलावा बस्तर सरकार के लिए आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र लौह अयस्क, बॉक्साइट, कोयला, वन संपदा और जल संसाधनों से समृद्ध है। लंबे समय तक सुरक्षा कारणों से इन संसाधनों का दोहन या तो नहीं हो पाया या सीमित रहा। अब जब सरकार नक्सलवाद के अंतिम चरण की बात कर रही है, तो बस्तर को औद्योगिक निवेश, खनन परियोजनाओं और बुनियादी ढाँचे के बड़े एजेंडे से जोड़ा जाना स्वाभाविक है। इसके लिए ‘सुरक्षित बस्तर’ पहली शर्त मानी जा रही है।
इसी के साथ सरकार ने बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को भी नए सिरे से सामने लाने की कोशिश की है। बस्तर पंडुम जैसे आदिवासी सांस्कृतिक महाकुंभ का शुभारंभ राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा जगदलपुर में किया जाना केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और सामाजिक संदेश भी था। राष्ट्रपति ने कहा कि छत्तीसगढ़ आना उन्हें घर जैसा लगता है और यहाँ की संस्कृति प्राचीन व मधुर है। उन्होंने यह भी कहा कि पिछले चार दशकों से नक्सलवाद के कारण बस्तर के आदिवासियों को नुकसान हुआ, लेकिन अब बड़ी संख्या में नक्सली हिंसा छोडक़र मुख्यधारा में लौट रहे हैं और ऐसे लोगों का स्वागत किया जाना चाहिए।

सदियों पुराना बस्तर दशहरा, जो किसी सत्ता नहीं बल्कि लोकआस्था से जुड़ा उत्सव है, और युवाओं को जोडऩे वाला बस्तर ओलंपिक भी इसी प्रयास का हिस्सा हैं। इन आयोजनों में मुख्यमंत्री, मंत्री और प्रशासनिक अधिकारियों की सक्रिय भागीदारी यह संकेत देती है कि सरकार बस्तर को केवल सुरक्षा या विकास की भाषा में नहीं, बल्कि उसकी संस्कृति, परंपरा और सामूहिक चेतना के सम्मान के माध्यम से आगे बढ़ाने का नैरेटिव गढ़ रही है।
हालाँकि यह सवाल भी उठता है कि छत्तीसगढ़ के अन्य आदिवासी बहुल क्षेत्र, विशेषकर सरगुजा, इस तरह के राजनीतिक फोकस से वंचित क्यों दिखाई देते हैं। संभवत: इसलिए कि बस्तर राष्ट्रीय और आंतरिक सुरक्षा के विमर्श से सीधे जुड़ा है और उसका प्रतीकात्मक महत्व सरकार के ‘निर्णायक कार्रवाई’ के संदेश को अधिक प्रभावी बनाता है।
बस्तर को लेकर सरकार की बढ़ी हुई सक्रियता स्वागतयोग्य है, लेकिन यह क्षेत्र पहले भी कई दौर की प्राथमिकताओं का साक्षी रहा है। असली परीक्षा इस बात की होगी कि क्या इस बार विकास पारदर्शी होगा, स्थानीय समुदाय को भागीदार बनाया जाएगा और जवाबदेही की व्यवस्था मजबूत होगी। यदि बस्तर को केवल सुरक्षा और संसाधनों के चश्मे से देखा गया, तो प्राथमिकताएँ बदलने के साथ यह क्षेत्र फिर हाशिये पर जा सकता है। सरकार के लिए चुनौती यह है कि बस्तर को समस्या क्षेत्र से निकालकर वास्तव में संभावना के क्षेत्र में बदला जाए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *