–सुभाष मिश्र
कांग्रेस नेताओं के बोल-बच्चन इन दिनों फिर सुर्खियों में हैं और ऐसा लगने लगा है कि देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी के भीतर बयान देने की एक समानांतर संस्कृति विकसित हो गई है। हाल ही में मणिशंकर अय्यर ने जिस तरह खुलकर अपनी ही पार्टी के नेताओं पर टिप्पणी की, उससे यह बहस फिर तेज हो गई कि आखिर कांग्रेस के भीतर अनुशासन है भी या नहीं। अय्यर ने शशि थरूर को ‘एंटी-पाकिस्तान’ बताते हुए विदेश मंत्री बनने की महत्वाकांक्षा से जोड़ दिया, एम.के. स्टालिन को इंडिया ब्लॉक संभालने के लिए सबसे बेहतर बताया, राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने की संभावना तो जताई पर खुद को ‘राहुलवादी’ मानने से इनकार कर दिया। पवन खेड़ा को ‘प्रवक्ता नहीं, तोता’ कह दिया और जयराम रमेश पर भी कटाक्ष कर दिया। यह केवल व्यक्तिगत नाराजग़ी नहीं थी, बल्कि संगठनात्मक असंतोष का सार्वजनिक प्रदर्शन था।
कांग्रेस के लिए मुश्किल यह है कि उसके भीतर असहमति दबाई नहीं जाती, बल्कि खुलकर बाहर आ जाती है। यही लोकतांत्रिक स्वभाव उसकी ताकत भी रहा है, लेकिन आज वही कमजोरी बनता दिखाई देता है। जब वरिष्ठ नेता सार्वजनिक मंच से यह कहें कि केरल में कांग्रेस नहीं जीतेगी, नेता आपस में बंटे हुए हैं, या हाईकमान की भूमिका वैसी नहीं रही जैसी कभी सरदार पटेल जैसे नेताओं के समय थी, तो संदेश केवल कार्यकर्ताओं तक नहीं जाता, सीधे विरोधियों के हाथ में चला जाता है। भाजपा का संगठित मीडिया तंत्र ऐसे बयानों को हाथों-हाथ लेता है और उन्हें राष्ट्रीय विमर्श में बदल देता है।
महाराष्ट्र में हर्षवर्धन सपकाल के बयान को लेकर उठा विवाद भी इसी क्रम का हिस्सा है। छत्रपति शिवाजी महाराज और टीपू सुल्तान के संदर्भ में दिए गए वक्तव्य को जिस तरह राजनीतिक रंग दिया गया, उसने एक बार फिर यह दिखा दिया कि इतिहास, आस्था और भावनाओं से जुड़े मुद्दों पर शब्दों की जरा-सी चूक कितना बड़ा राजनीतिक तूफान खड़ा कर सकती है। सपकाल ने सफाई दी कि उनके बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया, उन्हें धमकियां मिल रही हैं, और भाजपा दंगे भडक़ाने की कोशिश कर रही है। लेकिन तब तक राजनीतिक नुकसान हो चुका था।
दरअसल समस्या केवल बयान की नहीं, समय और संदर्भ की भी है। भाजपा लंबे समय से हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर कांग्रेस को घेरती रही है। ऐसे में कांग्रेस का कोई भी नेता यदि प्रधानमंत्री, हिंदुत्व, शिवाजी महाराज या राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर असावधानी से बोलता है, तो वह केवल व्यक्तिगत राय नहीं रह जाती, पार्टी की आधिकारिक छवि पर असर डालती है। भाजपा के आईटी और मीडिया सेल की सक्रियता ऐसी है कि आधे-अधूरे शोध, संदर्भ से काटे गए वाक्य और पुरानी टिप्पणियां भी नए नैरेटिव में ढाल दी जाती हैं।
कांग्रेस के भीतर इस समय जो सबसे बड़ा संकट दिखाई देता है, वह केंद्रीय नेतृत्व के प्रति वह ‘भय’ या अनुशासन का अभाव है, जो कभी हुआ करता था। पहले बयान देने से पहले नेता दस बार सोचते थे कि पार्टी लाइन क्या है। आज कई बार ऐसा लगता है कि पार्टी लाइन बाद में तय होती है, बयान पहले आ जाता है। नतीजा यह होता है कि महासचिवों और प्रवक्ताओं को सफाई देनी पड़ती है कि फलां नेता की टिप्पणी पार्टी का आधिकारिक रुख नहीं है। यह स्थिति किसी भी बड़े संगठन के लिए शुभ संकेत नहीं मानी जा सकती।
विपक्षी एकता की बात हो रही है, इंडिया ब्लॉक को मजबूत करने की चर्चा चल रही है, लेकिन यदि स्वयं कांग्रेस के भीतर मतभेद सार्वजनिक मंचों पर उभरते रहेंगे, तो वह व्यापक गठबंधन को किस नैतिक बल से नेतृत्व दे पाएगी? लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, किंतु उन्हें व्यक्त करने की भी एक मर्यादा और मंच होता है। जब आंतरिक संवाद मीडिया के जरिये होने लगे, तो वह संवाद नहीं, प्रदर्शन बन जाता है।
कांग्रेस के सामने चुनौती दोहरी है, एक तरफ उसे भाजपा के मजबूत नैरेटिव का मुकाबला करना है, दूसरी तरफ अपने भीतर संवाद और अनुशासन की नई संरचना गढऩी है। यदि बयानबाज़ी की यह परंपरा जारी रही, तो विरोधियों को मेहनत करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। कांग्रेस को तय करना होगा कि वह खुली अभिव्यक्ति की संस्कृति को संगठनात्मक जिम्मेदारी के साथ कैसे संतुलित करती है। वरना आए दिन उठने वाले ये बोल-बच्चन ही उसकी राजनीतिक पहचान बन जाएंगे, और असली मुद्दे पीछे छूटते चले जाएंगे।