ऑस्ट्रेलिया से सुभाष मिश्र
भारत जैसे समाज में दान केवल सामाजिक व्यवहार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक परंपरा का हिस्सा है। मंदिरों की सीढिय़ों से लेकर ‘नेकी की दीवार तक, कहीं न कहीं देने और लेने की खुली स्वीकृति दिखाई देती है। परंतु ऑस्ट्रेलिया का समाज इस मामले में एक भिन्न धरातल पर खड़ा है। यहाँ दान देने की कोई विशेष धार्मिक परंपरा या सार्वजनिक रिवाज नहीं है। न कोई पुकारता हुआ हाथ दिखता है, न कोई दानदाता अपनी उदारता का प्रदर्शन करता है। फिर भी जरूरतमंदों तक सहायता पहुँचती है, बस उसका तरीका अलग है।
ऑस्ट्रेलिया में यदि किसी व्यक्ति के घर में अनुपयोगी सामान जैसे अतिरिक्त फर्नीचर, कपड़े, घरेलू वस्तुएँ, बच्चों के खिलौने, बगीचे के पौधों की कटिंग या अतिरिक्त फल पड़े हों, तो वह उन्हें लेकर किसी झुग्गी-बस्ती की तलाश में नहीं निकलता। न ही कोई घर-घर जाकर उनसे मांगने आता है। यहाँ की सामाजिक संरचना में मांगना एक असहज और आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाने वाली क्रिया मानी जाती है। देने वाला भी इस संकोच में रहता है कि कहीं उसका प्रस्ताव सामने वाले को अपमानजनक न लगे।
ऐसी स्थिति में व्यवहारिक समाधान यह है कि लोग अपना अतिरिक्त या अनुपयोगी सामान घर के बाहर, रास्ते के किनारे सलीके से रख देते हैं। जो भी राहगीर उसे उपयोगी समझता है, वह बिना औपचारिकता के उठा ले जाता है। न कोई धन्यवाद की औपचारिकता, न देने वाले का नाम, न लेने वाले की पहचान, एक मौन लेन-देन, जिसमें दोनों पक्षों का स्वाभिमान अक्षुण्ण रहता है।
भारत में ‘नेकी की दीवार जैसे प्रयासों में सार्वजनिक रूप से वस्त्र या वस्तुएँ टांगी जाती हैं, और जरूरतमंद लोग आकर उन्हें लेते हैं। ऑस्ट्रेलिया में ऐसा दृश्य कम ही दिखता है। यहाँ यह प्रक्रिया अधिक निजी और आत्मनियंत्रित है। यदि घर के बाहर रखा सामान कई दिनों तक कोई नहीं लेता, तो उसका अर्थ है कि उसकी आवश्यकता किसी को नहीं है। तब उसे हटाने के लिए नगर परिषद की कचरा-गाड़ी को दो-तीन सप्ताह पहले बुक करना पड़ता है, जो निर्धारित शुल्क लेकर उसे उठा ले जाती है।
आज के डिजिटल युग में इस व्यवस्था का एक और रूप भी दिखाई देता है। ओलेक्स जैसे कई ऑनलाइन मंच हैं, जहाँ लोग अपना घरेलू और अतिरिक्त सामान बेचने के लिए सूचीबद्ध करते हैं। परंतु हर वस्तु बिकाऊ नहीं होती। कुछ चीजें ऐसी होती हैं जिनका कोई खरीददार नहीं मिलता या वे ऑनलाइन बिक्री योग्य नहीं होतीं। तब लोग स्थानीय सोशल मीडिया समूहों का सहारा लेते हैं। हर उपनगर या क्षेत्र का अपना डिजिटल समुदाय होता है, जहाँ लोग आवश्यक सूचनाएँ, अलर्ट और ‘फ्री आइटम की जानकारी साझा करते हैं। जिसे जरूरत होती है, वह संपर्क करता है और वस्तु ले जाता है। इस प्रक्रिया में अनौपचारिक संबंध भी बनते हैं और समुदाय में एक प्रकार का विश्वास विकसित होता है।
यह कहना गलत होगा कि ऑस्ट्रेलिया में जरूरतमंद लोग नहीं हैं। किंतु उनकी संख्या अपेक्षाकृत कम है और सामाजिक सुरक्षा की मजबूत व्यवस्था उन्हें न्यूनतम जीवन-स्तर प्रदान करती है। सरकार की ओर से सामाजिक सुरक्षा पेंशन, बेरोजगारी भत्ता और अन्य सहायता योजनाएँ उपलब्ध हैं। अधिकांश लोग चाहे वे 13 वर्ष से अधिक आयु के किशोर हों या किसी भी प्रकार का काम करने के इच्छुक व हुनरमंद व्यक्ति, उन्हें काम और पर्याप्त पारिश्रमिक मिल जाता है। श्रम यहाँ महँगा है, इसलिए लोग आत्मनिर्भर रहना पसंद करते हैं और दूसरों पर निर्भरता को अंतिम विकल्प मानते हैं।
इसके अतिरिक्त अनेक चैरिटेबल संस्थाएँ सक्रिय हैं, जो संगठित ढंग से जरूरतमंदों तक सहायता पहुँचाती हैं। जो लोग दानशील प्रवृत्ति के हैं, वे व्यक्तिगत रूप से वस्तुएँ बाँटने के बजाय इन संस्थाओं को आर्थिक या वस्तुगत सहयोग देना अधिक उचित समझते हैं। इससे सहायता एक व्यवस्थित और गरिमामय तरीके से लक्षित वर्ग तक पहुँचती है।
ऑस्ट्रेलिया के समाज में आत्मसम्मान और निजता का विशेष महत्व है। यहाँ मांगना सामाजिक रूप से अच्छा नहीं माना जाता, और देने वाला भी बिना पूछे सहायता थोपना उचित नहीं समझता। इस संतुलन ने एक ऐसी संस्कृति को जन्म दिया है जहाँ दान प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक शांत, संयत और मर्यादित क्रिया है।
मानव श्रम के महँगे होने के कारण लोग अपने घरों में उतना ही सामान रखते हैं, जितनी वास्तविक आवश्यकता हो। अतिरिक्त वस्तुओं का संचय यहाँ सामान्य प्रवृत्ति नहीं है। परिणामस्वरूप, जब भी कुछ अतिरिक्त होता है, तो उसे या तो बेच दिया जाता है, साझा कर दिया जाता है, या घर के बाहर रखकर मुक्त कर दिया जाता है। यह व्यवस्था एक प्रकार से ‘स्व-नियंत्रित दान की संस्कृति है, जिसमें न कोई आग्रह है, न आग्रह का प्रदर्शन।
भारतीय समाज में दान धार्मिक पुण्य और सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ा रहा है। वहीं ऑस्ट्रेलिया में यह अधिक व्यवहारिक, संस्थागत और व्यक्तिगत गरिमा पर आधारित है। यहाँ सहायता की प्रक्रिया में भावुकता कम, व्यवस्था अधिक दिखाई देती है।
दरअसल दोनों समाजों की दान-संस्कृति उनके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संदर्भों से निर्मित हुई है। भारत में जहाँ सामुदायिकता और परंपरा का बल है, वहीं ऑस्ट्रेलिया में आत्मनिर्भरता और संस्थागत संरचना का। अंतर केवल तरीके का है, भाव का नहीं। जरूरतमंदों तक सहायता पहुँचना ही अंतिम उद्देश्य है, और वह दोनों ही समाजों में अपने-अपने ढंग से पूरा होता है।