-सुभाष मिश्र
किसी एक अधिकारी के निलंबन या किसी एक घटना को लेकर उठी हलचल अक्सर कुछ दिनों में थम जाती है, लेकिन उसके पीछे छिपा बड़ा सवाल वहीं रह जाता है, क्या हमारे प्रशासनिक तंत्र में अनुशासन केवल नीचे के लिए है और गरिमा ऊपर के लिए?
हाल ही में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा एक वन अधिकारी (डीएफओ) को मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी से दूरभाष पर अभद्र व्यवहार के आरोप में निलंबित किए जाने की खबर आई। आदेश में कहा गया कि जानकारी मांगे जाने पर अमर्यादित भाषा का प्रयोग हुआ, जिसे सेवा आचरण के विरुद्ध मानते हुए कार्रवाई की गई। किसी भी प्रशासनिक व्यवस्था में अनुशासन बनाए रखने के लिए ऐसी कार्रवाई असामान्य नहीं मानी जाती। नियम यही कहते हैं कि पद चाहे जो हो, आचरण मर्यादित होना चाहिए।
लेकिन यह घटना केवल एक व्यक्ति की गलती या एक विभागीय कार्रवाई तक सीमित नहीं है। यह उस बड़े प्रश्न को भी सामने लाती है, क्या हमारे प्रशासनिक तंत्र में मर्यादा और अनुशासन के मानक सचमुच सभी स्तरों पर समान रूप से लागू होते हैं, या वे अक्सर चयनात्मक दिखाई देते हैं?
प्रशासनिक व्यवस्था का घोषित ढांचा स्पष्ट है, नियम, प्रक्रिया और जवाबदेही। पर व्यवहार में कई बार एक समानांतर, अनौपचारिक शक्ति-तंत्र भी सक्रिय दिखाई देता है। ऐसे लोग, जो औपचारिक पदानुक्रम में बहुत ऊपर नहीं होते, फिर भी सत्ता के निकट होने के कारण असाधारण प्रभाव रखते हैं। तबादलों पर राय, फाइलों की दिशा, बैठकों का स्वर और कभी-कभी अधिकारियों की प्रतिष्ठा तक उसी प्रभाव से तय होती दिखती है। नतीजा यह होता है कि विभाग का विधिवत प्रमुख भी कई बार अनभिज्ञ रह जाता है, जबकि तंत्र के भीतर सब जानते हैं कि वास्तविक निर्णय कहाँ से संचालित हो रहे हैं।
हमने कालांतर में देखा है कि कैसे सत्ता के केंद्र में बैठी किसी ‘पॉवरफुल मैडमÓ या शीर्ष नेतृत्व के निज सहायक, ओएसडी और तथाकथित खास लोग, जो स्वयं छोटे पदों पर होते हैं या कृपा से वहाँ पहुँचे होते हैं। बहुत वरिष्ठ अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से भी अभद्र व्यवहार करते हैं। सत्ता का सानिध्य पाकर कई लोग करोड़ों की संपत्ति अर्जित कर लेते हैं और उनकी कथित ताकत देखकर अन्य लोग मंत्रियों के बंगले और सत्ता-केन्द्रों के इर्द-गिर्द घुसपैठ के लिए चक्कर लगाते दिखते हैं। लगभग हर विभाग और हर व्यवस्था में ऐसी असंवैधानिक ताकतें निज सचिव, भाई-भतीजे, पत्नी या ‘खास आदमीÓ के रूप में सक्रिय दिखाई देती हैं, जिनके प्रभामंडल के बारे में सब जानते हैं, पर औपचारिक रूप से कोई स्वीकार नहीं करता।
यहीं से कार्यसंस्कृति प्रभावित होती है। छोटे कर्मचारी और कनिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि बैठकों में सार्वजनिक रूप से डांट-फटकार, व्यक्तिगत टिप्पणी और अपमानजनक भाषा को सामान्य व्यवहार मान लिया गया है। शिकायत की राह इसलिए बंद हो जाती है क्योंकि जिसके खिलाफ शिकायत करनी है, वही अनुशासनात्मक कार्रवाई का सक्षम प्राधिकारी भी होता है। यह स्थिति केवल भय पैदा नहीं करती, बल्कि संस्थागत चुप्पी को जन्म देती है। एक ऐसी चुप्पी जिसमें अपमान स्वीकार्य व्यवहार बन जाता है।
डीएफओ के निलंबन का प्रसंग इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह दिखाता है सरकार अनुशासनहीनता पर कार्रवाई कर सकती है और करती भी है। पर उतना ही जरूरी सवाल यह है कि क्या वरिष्ठ स्तर पर होने वाली असम्मानजनक भाषा और व्यवहार पर भी उतनी ही त्वरित और दृश्यमान कार्रवाई होती है? जब कभी कनिष्ठ पर तत्काल दंड दिखता है और प्रभावशाली व्यक्ति पर प्रक्रिया लंबी व अस्पष्ट हो जाती है, तो संदेश जाता है कि नियम सबके लिए समान नहीं हैं। जबकि प्रशासन की विश्वसनीयता इसी संतुलन पर टिकी रहती है।
प्रशासनिक मनोविज्ञान बताता है कि शीर्ष स्तर पर दिखने वाला व्यवहार नीचे तक उतरता है। यदि नेतृत्व की भाषा संयमित और सम्मानजनक है, तो संवाद की संस्कृति विकसित होती है। यदि ऊपर अपमान और भय का वातावरण है, तो वही शैली नीचे और अधिक कठोर रूप में दिखाई देती है। इसलिए अनुशासन केवल दंड का विषय नहीं, बल्कि कार्यसंस्कृति का प्रश्न है। निर्णय कड़े हो सकते हैं, पर भाषा कड़ी होना आवश्यक नहीं।
सत्ता की निकटता से उपजी यह ‘अनौपचारिक ताकतÓ समस्या को और गहरा करती है। जब अधिकार का स्रोत नियम नहीं, बल्कि पहुँच और प्रभाव बन जाता है, तब कुछ लोग असम्मान को अधिकार समझ बैठते हैं जैसे किसी की ‘औकात बतानाÓ प्रशासनिक दक्षता का हिस्सा हो। दरअसल यह दक्षता नहीं, बल्कि नियंत्रण की मानसिकता और संस्थागत असुरक्षा का संकेत है।
इसलिए हालिया निलंबन को केवल एक विभागीय घटना मानकर आगे बढ़ जाना पर्याप्त नहीं होगा। इसे उस व्यापक संदर्भ में देखना होगा जहाँ गरिमा, जवाबदेही और शक्ति-संतुलन एक-दूसरे से जुड़े हैं। यदि किसी भी स्तर पर यह संदेश जाता है कि अधिकार असम्मान का लाइसेंस है, तो नुकसान केवल व्यक्ति का नहीं, पूरी संस्था की साख का होता है।
प्रशासन की मजबूती फाइलों की गति से कम और कार्यस्थल की गरिमा से अधिक मापी जानी चाहिए। अनुशासन तब सार्थक होता है जब वह ऊपर से नीचे तक एक-सा दिखे—जहाँ पद बड़ा हो सकता है, पर व्यवहार की मर्यादा उससे भी बड़ी रहती है। सत्ता का असली परीक्षण यही है कि वह कितनी विनम्र रह सकती है, न कि कितनी ऊँची आवाज़ में बोल सकती है।