Editor-in-Chief सुभाष मिश्र की कलम से – छत्तीसगढ़ी: राजकीय भाषा का दर्जा, मगर ज़मीनी डगर कितनी लंबी?

-सुभाष मिश्र

भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, समाज की सामूहिक स्मृतियों और स्वाभिमान की वाहक भी होती है। छत्तीसगढ़ राजभाषा दिवस इसी गौरव का सार्वजनिक स्मरण है। छत्तीसगढ़ी को राज्य की राजभाषा का दर्जा मिल चुका है, यह एक बड़ी सांकेतिक जीत है, पर यह उतना ही बड़ा सच भी है कि सरकारी कामकाज, शिक्षा और प्रशासन में इसका प्रभावी उपयोग अभी प्रारंभिक अवस्था में है।
भारतीय संविधान ने भाषायी विविधता को न सिर्फ स्वीकार किया, बल्कि उसे संरक्षित भी किया। केंद्रीय स्तर पर हिंदी-अंग्रेज़ी राजकाज की भाषाएँ हैं, वहीं राज्यों में उनकी क्षेत्रीय भाषाओं का प्रयोग होता है। लेकिन छत्तीसगढ़ किसी एक भाषा क्षेत्र की इकाई नहीं, बल्कि बहुभाषायी सहअस्तित्व का प्रदेश है। सरगुजिहा, कुडुख (उरांव), सदरी कोरबा, हल्बी, भतरी, गोंड़ी और लरिया— ये सभी इसकी सामूहिक पहचान का आधार है। ऐसे में किसी एक बोली के वर्चस्व का राजनीतिक आग्रह जितना भावनात्मक रूप से आकर्षक है, उतना ही व्यावहारिक रूप से चुनौतीपूर्ण भी।
राजभाषा बनने के बाद असली परीक्षा भाषा के मानकीकरण, आधुनिकीकरण और उसे प्रशासनिक योग्य बनाने की होती है। छत्तीसगढ़ी में समाज चिंतन, कानून, विज्ञान, अर्थशास्त्र जैसे आधुनिक विषयों पर न तो पुस्तकों की परंपरा है, न पारिभाषिक शब्दावली विकसित हुई है। वर्तमान में यह मुख्यत: साहित्यिक अभिव्यक्तियों तक सीमित है, जहाँ अक्सर हिंदी शब्दों का सहारा लेना अनिवार्य बन जाता है। ऐसी स्थिति में राजकीय दायित्वों का निर्वहन सरल नहीं होगा।
राज्य में नई शिक्षा नीति के तहत मातृभाषा आधारित प्राथमिक शिक्षा को प्रोत्साहन के संकेत मिले हैं, जहाँ छत्तीसगढ़ी समेत 18 स्थानीय बोलियों को शामिल करने की पहल का उल्लेख किया गया। इसी क्रम में संविधान की 8वीं अनुसूची में छत्तीसगढ़ी को शामिल कराने की मांग समय-समय पर उठती रही है, जिसे पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की इच्छा और बाद में विभिन्न राजनीतिक नेताओं द्वारा सार्वजनिक मंचों से समर्थन मिला।
लेकिन उत्सव-दिवसों की बधाइयों से अलग, ज़मीनी सवाल यही है, क्या भाषा केवल राजनीतिक प्रतीक बनकर रह जायेगी या इसे प्रशासन और शिक्षा की कामकाजी भाषा में बदलने का संस्थागत अभियान भी चलेगा? सम्मान तभी सार्थक होगा, जब सरकारी दस्तावेज़, पाठ्यक्रम, शब्दकोश, ज्ञानानुशासन की किताबें और सार्वजनिक सूचना-तंत्र में इसका नैसर्गिक प्रयोग बढ़े।
छत्तीसगढ़ की असली ताक़त उसकी विविधता है। छत्तीसगढ़ी को सम्मान मिले, संरक्षण मिले, अवसर भी मिले—पर यह मुहिम किसी और भाषा को अपदस्थ करने के आग्रह से नहीं, बल्कि स्थानीय बहुलता और व्यवहारिक विकास के संतुलन से ही सफल हो सकती है। तभी राजभाषा दिवस औपचारिकता से आगे बढ़कर वास्तविक सांस्कृतिक पुनर्जागरण का दिन बन सकेगा।

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