-सुभाष मिश्र
प्रधानमंत्री के दौरे और देश के शीर्ष सुरक्षा-कमान के साए में होने वाला 60वां अखिल भारतीय डीजीपी-आईजी सम्मेलन इस बार नवा रायपुर की धरती पर दस्तक दे रहा है, जिसकी मेज़बानी नक्सल-संघर्ष की सबसे तीव्र प्रयोगशाला रहे छत्तीसगढ़ से हो रही है। 28 से 30 नवंबर 2025 तक भारतीय प्रबंधन संस्थान रायपुर(आईआईएम) परिसर में आयोजित यह सम्मेलन यह संकेत देता है कि आंतरिक सुरक्षा अब कागज़ी समीक्षा का विषय नहीं रही, बल्कि बदलते खतरे-स्वरूप को एक साझा राष्ट्रीय रणनीति में ढालने की अनिवार्यता बन चुकी है। सम्मेलन स्थल के सुरक्षा-निरीक्षण के लिए अपनी अचूक प्रोटेक्शन प्रतिष्ठा के लिए प्रसिद्ध विशेष सुरक्षा समूह की 20 सदस्यीय टीम पहले ही रायपुर पहुँचकर एयरपोर्ट-कैंप-कन्वॉय रूट, स्पीकर हाउस और प्रशासनिक आवासों का जायज़ा ले चुकी है, जबकि आगे अतिरिक्त सुरक्षा-टुकड़ी की आमद आसन्न बताई जा रही है। प्रधानमंत्री सिक्योरिटी प्रोटोकॉल को देखते हुए 3 दिनों तक नवा रायपुर लगभग सील मोड में रहेगा, ट्रैफिक बैरिकेड्स से डायवर्ट होगी। 18 आईजी-स्तरीय अधिकारियों के नेतृत्व में 18 सुरक्षा-सेक्टर बनाए गए हैं, 15,000 से अधिक सुरक्षाकर्मी अलग-अलग परतों में तैनात रहेंगे और कुल 18 विशेषज्ञ सुरक्षा-समन्वय टीमें सक्रिय रखी गई हैं। आयोजन की गंभीरता का अंदाज़ा इसी से है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिन सम्मेलन में मौजूद रहेंगे, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह तीन दिन प्रवास करेंगे, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल भी सुरक्षा-मंथन में भाग लेंगे और इंटेलिजेंस ब्यूरो तथा केंद्रीय एजेंसियों के 250 शीर्ष अधिकारी अपनी ऑपरेशनल रिपोर्ट्स, ट्रेंड विश्लेषण और ज़मीनी फ़ीडबैक साझा करेंगे। यह सम्मेलन 1960 से चली आ रही परंपरा का 60वां संस्करण है, जिसे हर वर्ष गृह मंत्रालय और आईबी के संयोजन में राज्यों के पुलिस-मुखियाओं, केंद्रीय सशस्त्र बलों और आंतरिक सुरक्षा प्लेटफॉर्म को एक साझा साइबर-फिजिकल-जंगल-सीमा-ख़ुफिय़ा समन्वय मॉडल में पिरोने के लिए आयोजित किया जाता रहा है। 2022 में दिल्ली संस्करण में क्रिप्टो-टेरर फंडिंग पर बहस चरम पर थी। 2023 में पुणे सम्मेलन में ड्रोन-बेस्ड इंटरनल सर्विलांस और एनडीपीएस नेटवर्क की मैपिंग प्रमुख रही। 2024 में जयपुर सम्मेलन में एआई पुलिसिंग, डीपफेक-फ़ाउंड फ्रॉड और डिजिटल कॉल नेटवर्क पर बड़ा मंथन हुआ, जो बताता है कि यह सम्मेलन न तो राजनीतिक घोषणाओं का मंच है, न प्रस्तावों की संसद, बल्कि राज्यों और सुरक्षा-बलों के ऑपरेशनल तालमेल, खुफिया ट्रेंड शेयरिंग, रिस्क-प्रेडिक्शन और पुलिसिंग-इवोल्यूशन का देश का सबसे निरंतर थिंक-टैंक है। छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, ओडिशा और झारखंड में पहले वामपंथी उग्रवाद जंगलों से संचालित होता था, जिसके प्रभाव को खत्म करने में समर्पण, ऑपरेशनल सर्ज और सीएपीएफ-राज्य पुलिस-आईबी कोऑर्डिनेशन से हिंसा-ग्राफ में बड़ी गिरावट आई। यहाँ के हिड़मा जैसे उग्रवादी नेता के मारे जाने पर वैचारिक बहस भी छिड़ी कि वह उग्रवादी था या एक्टिविस्ट। जो बताता है कि सुरक्षा विमर्श अब केवल बंदूक की भाषा तक सीमित नहीं, बल्कि नैरेटिव और जन-धारणा की मनोवैज्ञानिक परत तक पहुँच चुका है। ड्रग्स सप्लाई चेन में ओडिशा से गांजा का ट्रांजिट छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश-महाराष्ट्र तक होने का तथ्य बताता है कि नशा आज भी नेटवर्क-आधारित चुनौती है, जिसे ‘उड़ता पंजाब जैसी फिल्म-चर्चाओं ने कभी राष्ट्रीय-चिंता का चेहरा दिया था, जबकि अब एनडीपीएस केसों में वृद्धि बेहतर पकड़ और निगरानी का संकेत ज़्यादा, और खपत-बढ़ोतरी का निष्कर्ष कम साबित करती है। इसी तरह साइबर अपराध अब जामताड़ा-मॉडल से निकलकर राजस्थान, दिल्ली, बिहार, मध्यप्रदेश तक फ़ैल चुका है। यूपीआई-फेक-कॉल-सोशल इंजीनियरिंग इसका नया हथियार है, जिस पर नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय जांच एजेंसी, आईबी, एनसीबी और राज्य साइबर सेल लगातार साझा ऑपरेशनल डेटा-पूल बना रहे हैं, क्योंकि अपराध की इनोवेशन-स्पीड कानून की स्पीड से कहीं तेज़ है। पूर्वोत्तर में अलगाववाद एक अलग सुरक्षा-व्याकरण में सक्रिय है। सीमावर्ती राज्यों में आतंक-तस्करी का चरित्र अलग है, और स्लीपर सेल का खतरा एक स्थायी सामरिक चेतावनी है पर इसे सनसनी नहीं, रणनीतिक सतर्कता की भाषा में लिखा जाना चाहिए। ऐसे समय में जब एलडब्ल्यूई हिंसा में गिरावट एक सफलता है, एनडीपीएस नेटवर्क पर निगरानी व्यापक हो रही है, लेकिन साइबर अपराध और जातिगत-सामाजिक ध्रुवीकरण हिंसा का ग्राफ ऊपर चढ़ रहा है, तब यह सम्मेलन भारत की सुरक्षा दिशा का सबसे भरोसेमंद कम्पास बन जाता है। देश अपराध-मुक्त रामराज्य की ओर बढ़ रहा है या नहीं, इसका भावनात्मक उत्तर आकर्षक भले हो, पर सच्चा मूल्यांकन एनसीआरबी के डेटा-रुझान, डिजिटल पुलिसिंग एडप्शन, रिस्पॉन्स टाइम मेट्रिक्स, नागरिक-विश्वास इंडेक्स और अंतर-राज्यीय अपराध प्रतिक्रिया-तंत्र की क्षमता से तय होगा, न कि नारों से। इसलिए इस सम्मेलन की सार्थकता चर्चा-सेशन की संख्या में नहीं, बल्कि एजेंसी-समन्वय, पुलिसिंग-रूपांतरण, खुफिया-साझेदारी और अगले दशक के लिए तैयार सुरक्षा मॉडल गढऩे में है। यदि नवा रायपुर से निकलने वाली रणनीति भविष्य की चुनौतियों को आज से कमतर कर सके, पुलिस-नागरिक-विश्वास-विज्ञान को मजबूत कर पाए, और खतरे को जंगल से लेकर डिजिटल व मनोवैज्ञानिक युद्धभूमि तक पढऩे-रोकने की दृष्टि दे सके, तभी माना जाएगा कि देश सुशासन की ओर ही नहीं, बल्कि अपराध-नियंत्रण के नए विज्ञान की ओर भी अग्रसर है। यह सम्मेलन केवल रिपोर्ट-आदान-प्रदान नहीं, बल्कि बदलते सुरक्षा-खतरों का भविष्य-पाठ तैयार करने का राष्ट्रीय दस्तावेज़ है, जो यह समझने में मदद करेगा कि अपराध घट रहे हैं, दिशा बदल रहे हैं, या रूपांतरित हो रहे हैं और समाधान का सही उत्तर इसी समझ से निकलेगा।