-सुभाष मिश्र
कश्मीर को केवल नक्शे पर नहीं, लोगों की आँखों में देखकर समझना चाहिए।
कश्मीर को लेकर देश में दो तरह की तस्वीरें अक्सर सामने आती हैं। एक तस्वीर टीवी स्क्रीन पर दिखाई देती है, जहाँ आतंकवाद, सुरक्षा बल, पत्थरबाजी और राजनीतिक बयानबाजी प्रमुख होती है। दूसरी तस्वीर वह है जो कश्मीर की धरती पर कदम रखते ही दिखाई देती है- डल झील की शांत लहरें, गुलमर्ग की हरियाली, पहलगाम की वादियां, मेहनतकश लोग, मुस्कुराते बच्चे, पर्यटकों की चहल-पहल और बेहतर भविष्य की उम्मीदें।
इन दिनों हम स्वयं कश्मीर यात्रा पर हैं और श्रीनगर से लेह-लद्दाख की ओर जा रहे हैं। अमरनाथ यात्रा के कारण पूरे कश्मीर में सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतजाम हैं। जगह-जगह सेना, अर्द्धसैनिक बल और पुलिस की मौजूदगी दिखाई देती है। पहली नजर में यह वातावरण असामान्य लग सकता है, लेकिन आम नागरिकों से बातचीत करने पर महसूस होता है कि अधिकांश लोग शांति, रोजगार और सामान्य जीवन चाहते हैं। वे चाहते हैं कि दुनिया कश्मीर को केवल संघर्ष की भूमि नहीं, बल्कि पर्यटन, संस्कृति और संभावनाओं की धरती के रूप में भी देखें।
इसी बीच जम्मू-कश्मीर को फिर से पूर्ण राज्य का दर्जा देने की माँग को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हुई हैं। यह माँग नई नहीं है। अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 और 35ए के प्रावधान हटाए जाने के साथ राज्य का पुनर्गठन हुआ और जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया। तब से स्थानीय राजनीतिक दल लगातार पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की माँग कर रहे हैं। यह माँग भारतीय संविधान के दायरे में की जा रही एक राजनीतिक माँग है और लोकतंत्र में ऐसी माँगों पर संवाद स्वाभाविक है। दूसरी ओर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में भी अलग प्रकार का असंतोष देखने को मिल रहा है। वहां लंबे समय से स्थानीय लोग महँगाई, बेरोजगारी, संसाधनों पर नियंत्रण और राजनीतिक अधिकारों के मुद्दों पर आंदोलन करते रहे हैं। यह विडंबना है कि जिस पाकिस्तान ने दशकों तक कश्मीर के नाम पर दुनिया भर में अभियान चलाया, उसी के नियंत्रण वाले क्षेत्र में लोग अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं। इन दोनों परिस्थितियों की तुलना करते समय संयम आवश्यक है। भारत के जम्मू-कश्मीर और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की राजनीतिक एवं संवैधानिक स्थितियाँ भिन्न हैं। भारत में चुनाव, न्यायपालिका, मीडिया और लोकतांत्रिक संस्थाओं के माध्यम से असहमति व्यक्त करने की गुंजाइश मौजूद है। वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में नागरिक अधिकारों और राजनीतिक स्वतंत्रता को लेकर समय-समय पर गंभीर प्रश्न उठते रहे हैं।
कश्मीर की सबसे बड़ी त्रासदी यह रही है कि दशकों तक यहाँ के आम नागरिक राजनीतिक संघर्ष, सीमा पार आतंकवाद और सुरक्षा चुनौतियों के बीच पिसते रहे। सबसे अधिक नुकसान उसी युवा पीढ़ी का हुआ जिसे शिक्षा, रोजगार और विकास की आवश्यकता थी। आज जब पर्यटन फिर गति पकड़ रहा है, होटल, हाउसबोट, टैक्सी चालक, शिल्पकार और छोटे व्यापारी आर्थिक गतिविधियों से जुड़ रहे हैं, तब सबसे बड़ी आवश्यकता इस सकारात्मक माहौल को स्थायी बनाने की है। यह भी सच है कि केवल सुरक्षा व्यवस्था किसी क्षेत्र में स्थायी शांति नहीं ला सकती। सुरक्षा आवश्यक है, लेकिन उसके साथ लोकतांत्रिक भागीदारी, पारदर्शी प्रशासन, रोजगार, निवेश, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्थानीय लोगों का विश्वास भी उतना ही आवश्यक है। विकास तब सार्थक होगा जब कश्मीर का युवा अपने भविष्य को बंदूक नहीं, किताब, कंप्यूटर, पर्यटन, उद्योग और उद्यमिता से जोड़कर देखें। अमरनाथ यात्रा इसका एक सकारात्मक उदाहरण है। लाखों श्रद्धालु कठिन परिस्थितियों में बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए आते हैं। स्थानीय मुस्लिम समुदाय के हजारों लोग इस यात्रा में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सहयोग करते हैं। घोड़े वाले, पि_ू, दुकानदार, होटल व्यवसायी और स्थानीय नागरिक इस यात्रा की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह कश्मीर की उस साझा सांस्कृतिक विरासत का प्रमाण है, जिसे राजनीतिक शोर अक्सर दबा देता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि कश्मीर को न तो केवल सुरक्षा के चश्मे से देखा जाए और न ही केवल राजनीति के। कश्मीर भारत की सांस्कृतिक विविधता, सामरिक महत्त्व और प्राकृतिक धरोहर तीनों का संगम है। इसलिए यहाँ की हर नीति का अंतिम उद्देश्य केवल प्रशासनिक नियंत्रण नहीं, बल्कि नागरिकों का विश्वास होना चाहिए।
राज्य का दर्जा बहाल करने की माँग हो, चुनावी प्रक्रिया हो या विकास की योजनाएं इन सभी का समाधान संविधान, लोकतांत्रिक संवाद और राष्ट्रीय हितों के संतुलन के साथ ही निकल सकता है। भावनाओं की राजनीति क्षणिक लाभ दे सकती है, लेकिन स्थायी समाधान केवल विश्वास और संवाद से ही संभव है।
कश्मीर को देखकर एक बात स्पष्ट होती है कि यहां के अधिकांश लोग वही चाहते हैं जो देश का हर नागरिक चाहता है—सुरक्षित जीवन, सम्मानजनक रोजगार, बच्चों का बेहतर भविष्य और शांति। यदि भारत इस भरोसे को मजबूत करने में सफल होता है, तो कश्मीर केवल धरती का स्वर्ग ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र की सफलता का भी एक सशक्त उदाहरण बन सकता है।
केन्द्रीय प्रश्न यह नहीं है कि कश्मीर किसके पास है; असली प्रश्न यह है कि क्या कश्मीर का हर नागरिक शांति, सम्मान और अवसर के साथ अपना भविष्य देख पा रहा है? जब इस प्रश्न का सकारात्मक उत्तर मिलेगा, तभी कश्मीर का वास्तविक समाधान भी दिखाई देगा।