-सुभाष मिश्र
कभी भारतीय समाज में विवाह को केवल सामाजिक संस्था नहीं, बल्कि जीवन भर का साथ माना जाता था। पति या पत्नी के चले जाने के बाद शेष जीवन यादों के सहारे बिताना अच्छे संस्कार माना जाता था। दूसरी शादी को संदेह और आलोचना की दृष्टि से देखा जाता था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह सोच तेजी से बदली है। समाज यह स्वीकार करने लगा है कि मनुष्य केवल रोटी, दवा और आर्थिक सुरक्षा से नहीं जीता। उसे एक ऐसे साथी की जरूरत होती है जिसके सामने वह बिना संकोच अपने मन की बातें कह सके।
यह अकेलापन केवल समय काटने का प्रश्न नहीं है। यह मानसिक स्वास्थ्य, भावनात्मक संतुलन और जीवन की गुणवत्ता का प्रश्न है। घर में सारी सुविधाएं हो सकती हैं। नौकर खाना बना सकता है। दवा समय पर मिल सकती है। बच्चे आर्थिक जिम्मेदारियां निभा सकते हैं, लेकिन कोई भी व्यवस्था उस व्यक्ति की जगह नहीं ले सकती जो बिना किसी औपचारिकता के पूछे कि आज तुम्हारा मन कैसा है।
आज अकेला व्यक्ति बात करने के लिए तरस जाता है। परिवारों का स्वरूप बदल गया है। बच्चे पहले की तुलना में अधिक जिम्मेदार हैं। वे माता पिता के इलाज, दवाइयों, आराम और सुविधाओं का पूरा ध्यान रखते हैं। उनके प्रति अपने कर्तव्य निभाने में कोई कमी नहीं छोड़ते। समस्या कहीं और है। उनके पास समय नहीं है। वे अपने व्यस्त जीवन से भावनाओं के लिए जगह निकाल नहीं पाते। परिणाम यह होता है कि घर में सब कुछ होते हुए भी बुजुर्ग भीतर से अकेले होते जाते हैं और इन सब बातों के लिए बच्चों को यानी नई पीढ़ी को भी दोष नहीं दिया जा सकता है। उन्होंने जिस माहौल में आंखें खोली हैं, जिस माहौल में पले-बड़े हुए हैं वह पश्चिम की आधुनिकता का दिया हुआ माहौल है। अब वह उनके स्वभाव का नहीं संस्कार का हिस्सा हो गए हैं। वह उसे स्वाभाविक मानते हैं। उससे बाहर आने के लिए जिद करना जैसे उनकी आत्मा को बदलने की बात हो। आज की पीढ़ी के मन में बड़े बुजुर्गों के लिए अपमान या अवहेलना नहीं है। वे परिवार के बड़े बुजुर्गों का, बीमार व्यक्तियों का बहुत ध्यान रखते हैं। यह पीढ़ी बहुत केयरिंग है। फिर भी वह अपने निजी समय में से समय निकालकर नहीं देते हैं। घर के बूढ़े व्यक्तियों या मां-बाप की सेवा के प्रति बच्चे बहुत पाबंद रहते हैं, लेकिन उनसे अब यह उम्मीद नहीं की जाती है कि वह बूढ़े मां-बाप के पास बैठकर उनसे बातें करें या उनका समय काटने में मदद करें। आज की पीढ़ी के कर्तव्य और उनका कर्तव्य पूरे करने की इच्छा ऊर्जा पहले से कहीं ज्यादा है, लेकिन वह अपने समय की कटौती नहीं करना चाहते हैं यानी कर्तव्य के मामले में बहुत आगे हैं, लेकिन भावनात्मक रूप से कम हैं। एक निर्मम सी लगने वाली व्यावहारिकता को भावुकता में नहीं बदलना चाहते हैं।
दरअसल मनुष्य का सबसे बड़ा संकट संवाद का समाप्त हो जाना है। दिनभर घर में रहने वाले अनेक बुजुर्ग किसी से दो बातें करने के लिए तरस जाते हैं। कई लोग अलेक्सा से बातें करते हैं, केवल इसलिए कि उन्हें किसी आवाज का साथ मिल सके। यह तकनीक की सफलता कम और समाज की विफलता अधिक है। विदेश में इस समस्या को बहुत पहले पहचान लिया गया। वहां ऐसे किराए के लोग उपलब्ध हैं, जो कुछ घंटों या पूरे दिन के लिए साथ निभाने का काम करते हैं। वे बुजुर्गों के साथ बैठते हैं, बातें करते हैं, चाय पीते हैं, अखबार पढ़ते हैं, टहलते हैं और जीवन के अनुभव साझा करते हैं। यह सेवा केवल देखभाल नहीं, बल्कि भावनात्मक सहचर्य का माध्यम बन गई है।
किराए पर आने वाला व्यक्ति का काम चाय बनाना या अखबार पढ़ कर सुनना भी भावनात्मक जुड़ाव का हिस्सा है। वह व्यक्ति अपनी भावनाएँ बेचने आया है, जिसने उसे किराए से बुलाया है। वह जानता है, लेकिन उसके लिए बिताया जा रहा समय महत्वपूर्ण है। अकेलापान को दूर करना जरूरी है। इससे स्पष्ट होता है कि मनुष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता संवाद और अपनापन है।
भारत भी अब इसी दिशा में बढ़ रहा है। विधुर और विधवा विवाह को लेकर समाज का नजरिया पहले की तुलना में काफी बदला है। महानगरों में तो यह लगभग सामान्य बात हो चुकी है। छोटे शहरों और गांवों में अभी भी कुछ संकोच और सामाजिक विरोध है, लेकिन बदलाव वहां भी पहुंच रहा है। लोग समझने लगे हैं कि अकेलापन भी एक गंभीर बीमारी की तरह होता है, जिसका इलाज केवल दवाइयों से संभव नहीं है।
हाल ही में फिल्म और टेलीविजन अभिनेत्री सुहासिनी मूले ने साठ वर्ष की आयु में भौतिक विज्ञानी अतुल गुर्टू से विवाह किया। दोनों की मुलाकात फेसबुक पर हुई और कुछ ही महीनों में उन्होंने जीवनभर साथ बिताने का निर्णय लिया। अतुल गुर्टू की पहली पत्नी का कैंसर से निधन हो चुका था। यह विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं था, बल्कि उस बदलती सामाजिक सोच का प्रतीक भी था, जो यह स्वीकार करती है कि जीवन के किसी भी पड़ाव पर साथी की आवश्यकता खत्म नहीं होती है। ऐसे उदाहरण केवल भारत तक सीमित नहीं हैं। दुनिया भर में वरिष्ठ नागरिकों के लिए सामुदायिक जीवन, सहजीवन और पुनर्विवाह की स्वीकृति बढ़ी है। इसका कारण भी स्पष्ट है। बढ़ती आयु के साथ मनुष्य की सबसे बड़ी जरूरत ऐसे व्यक्ति की होती है जो उसकी बात सुन सके, उसकी चुप्पी समझ सके और उसके जीवन के छोटे छोटे क्षणों का सहभागी बन सके।
यह भी समझना होगा कि दैहिक संबंध मनुष्य की जरूरतों का केवल एक छोटा सा हिस्सा हैं। उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण आत्मीयता, विश्वास और मानसिक निकटता है। जीवन के अनेक अनुभव ऐसे होते हैं जिन्हें व्यक्ति अपने बच्चों से भी साझा नहीं कर पाता। उसे अपने समवयस्क साथी की आवश्यकता महसूस होती है। यही संबंध जीवन में फिर से उत्साह और अर्थ भर देते हैं। समाज को अब पुनर्विवाह या नए साथी की तलाश को नैतिकता के पुराने पैमानों से नहीं आंकना चाहिए। यदि दो वयस्क अपनी इच्छा से सम्मानपूर्वक साथ रहना चाहते हैं तो यह उनका निजी निर्णय है। इसे संदेह या उपहास का विषय बनाने के बजाय संवेदनशीलता से देखने की जरूरत है।
सभ्यता की पहचान केवल ऊंची इमारतों, आधुनिक तकनीक या आर्थिक समृद्धि से नहीं होती। उसकी असली पहचान इस बात से होती है कि वह अपने अकेले लोगों के लिए कितना स्थान बचाकर रखती है। आखिरकार मनुष्य को सबसे अधिक जरूरत किसी ऐसे कंधे की होती है, जिस पर वह अपना मन रख सके, क्योंकि जीवन केवल जीने का नहीं, किसी के साथ जीने का नाम है।