विपक्षी एकता : साथ भी और साथ के बाद भी संकट

-सुभाष मिश्र

2014 के बाद भारतीय राजनीति में सबसे बड़ा परिवर्तन यह रहा कि भाजपा केवल एक पार्टी नहीं रही, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति का केंद्रीय ध्रुव बन गई। राम जन्मभूमि आंदोलन से शुरू हुई वैचारिक ऊर्जा, 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सत्ता प्राप्ति और उसके बाद लगातार चुनावी सफलताओं ने भाजपा को ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया जहां विपक्ष का बड़ा हिस्सा रक्षात्मक राजनीति करने को मजबूर हो गया।
विपक्ष की सबसे बड़ी समस्या भाजपा की ताकत नहीं, बल्कि उसकी अपनी बिखरी हुई महत्वाकांक्षाएं रही हैं। 2023 में जब इंडिया गठबंधन बना था, तब ऐसा लगा था कि भाजपा के सामने पहली बार एक संगठित चुनौती खड़ी हो सकती है। लेकिन गठबंधन बनने के बाद ही उसके भीतर नेतृत्व, सीट बंटवारे और क्षेत्रीय वर्चस्व के सवाल सामने आने लगे।
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, बिहार में नीतीश कुमार, दिल्ली और पंजाब में अरबिन्द केजरीवाल, महाराष्ट्र में शरद पवार जैसे नेता राष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका चाहते थे, लेकिन इनमें से कोई भी ऐसा नेता नहीं बन सका जिसे पूरे विपक्ष का स्वाभाविक चेहरा स्वीकार किया जाता। यही कारण है कि विपक्ष भाजपा के खिलाफ तो एकजुट दिखा, लेकिन भाजपा के विकल्प के रूप में एकजुट नहीं हो पाया।
भाजपा की सबसे प्रभावी राजनीतिक रणनीतियों में से एक यह रही कि उसने केवल चुनावी मुकाबला नहीं किया, बल्कि विपक्षी दलों के भीतर भी समानांतर नेतृत्व तैयार होने दिया या उसका लाभ उठाया। महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना का विभाजन हुआ। बाद में अजित पवार के नेतृत्व में एनसीपी भी टूट गई। इन घटनाओं ने केवल दो दलों को कमजोर नहीं किया, बल्कि यह संदेश भी दिया कि क्षेत्रीय दलों के भीतर नेतृत्व संकट पैदा होने पर भाजपा राजनीतिक लाभ उठा सकती है। पश्चिम बंगाल में भी लगातार तृणमूल कांग्रेस के नेताओं का भाजपा की ओर जाना या जांच एजेंसियों की कार्रवाई के बाद राजनीतिक समीकरण बदलना इसी बड़े परिदृश्य का हिस्सा माना जाता है।
2024 के लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया। राहुल गांधी ने लगातार बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक न्याय, परीक्षा-पत्र लीक, आर्थिक असमानता और संस्थागत निष्पक्षता जैसे मुद्दों को उठाया। कांग्रेस की एक विशेषता यह भी है कि उसका वैचारिक आधार भाजपा से स्पष्ट रूप से अलग दिखाई देता है। यही कारण है कि कांग्रेस छोड़कर जाने वाले कई नेता अन्य दलों में समायोजित नहीं हो पाए, जबकि भाजपा और कई क्षेत्रीय दलों के बीच वैचारिक दूरी अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है।
यह कहना गलत होगा कि भाजपा के सामने कोई चुनौती नहीं है। महंगाई, बेरोजगारी, पेपर लीक, कृषि संकट, स्थानीय प्रशासनिक भ्रष्टाचार और युवाओं की आकांक्षाओं से जुड़े प्रश्न लगातार बने हुए हैं, लेकिन लोकतंत्र में असंतोष तभी राजनीतिक विकल्प बनता है जब उसे संगठित नेतृत्व मिले। फिलहाल यही विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी है। परिणामस्वरूप सोशल मीडिया, स्वतंत्र पत्रकार, यूट्यूब आधारित राजनीतिक टिप्पणीकार और नागरिक समूह कई मुद्दों पर विपक्ष की भूमिका निभाते दिखाई देते हैं।
नई दिल्ली मे इंडिया ब्लॉक की बैठक में 25 दलों के नेताओं ने चुनावी पारदर्शिता, शिक्षा व्यवस्था, महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक मुद्दों पर साझा रणनीति बनाने पर सहमति जताई। साथ ही नियमित अंतराल पर बैठकें करने का फैसला लिया। जाहिर है कि दिल्ली में विपक्षी बैठक का महत्व केवल सीटों या चुनावी रणनीति तक सीमित नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या कांग्रेस और क्षेत्रीय दल नेतृत्व के प्रश्न पर सहमति बना पाएंगे? क्या ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, स्टालिन जैसे नेता साझा एजेंडे पर आगे बढ़ेंगे? क्या गठबंधन भाजपा विरोध से आगे बढ़कर कोई वैकल्पिक राष्ट्रीय दृष्टि प्रस्तुत कर पाएगा? क्या विपक्ष राज्यों के स्तर पर आपसी प्रतिस्पर्धा कम कर पाएगा?
2024 में इंडिया गठबंधन उम्मीद का प्रयोग था। 2026 में यह अस्तित्व और प्रासंगिकता की परीक्षा से गुजर रहा है। कई क्षेत्रीय दल कमजोर हुए हैं, कुछ टूट चुके हैं, कुछ राज्यों में उनका जनाधार घटा है। दूसरी ओर कांग्रेस अपेक्षाकृत मजबूत होकर उभरी है। इसलिए आज गठबंधन पहले की तुलना में अधिक “कांग्रेस-केंद्रित” दिखाई देता है। यदि विपक्ष 2029 में भाजपा को गंभीर चुनौती देना चाहता है तो उसे तीन काम करने होंगे- पहला साझा नेतृत्व के बजाय साझा एजेंडा बनाना। दूसरा राज्य स्तर के मतभेदों को सीमित करना और तीसरा बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और संघीय ढांचे जैसे मुद्दों पर एक वैकल्पिक राष्ट्रीय कथा तैयार करना। अन्यथा वही स्थिति बनी रहेगी जो पिछले दशक में बार-बार दिखाई दी है। विपक्ष भाजपा के खिलाफ एकजुट होगा, लेकिन चुनाव आते-आते क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएं उसे फिर बिखेर देंगी।
भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा प्रश्न आज भाजपा की ताकत नहीं, बल्कि यह है कि क्या विपक्ष अपने भीतर की कमजोरियों पर विजय पा सकता है। 2029 का चुनाव शायद इसी प्रश्न का उत्तर तय करेगा।

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