-सुभाष मिश्र
22 अप्रैल 2025 यह तारीख सिर्फ एक आतंकी हमले की नहीं, बल्कि भारत की सुरक्षा व्यवस्था, राजनीतिक इच्छाशक्ति और सामूहिक चेतना की परीक्षा की तारीख है। पहलगाम की वादियों में उस दिन गोलियां सिर्फ लोगों को नहीं मार रही थीं, वे हमारी व्यवस्था की कमजोरियों को भी बेनकाब कर रही थीं। निर्दोष पर्यटकों को निशाना बनाकर, कथित तौर पर पहचान पूछकर हत्या करना यह सिर्फ आतंक नहीं था, यह एक सुनियोजित मनोवैज्ञानिक हमला था, जिसका मकसद था भारत को भीतर से तोडऩा।
सरकार ने जवाब दिया ऑपरेशन सिंदूर। बताया गया कि यह निर्णायक कार्रवाई है, आतंक के अड्डों को नेस्तनाबूद कर दिया गया, दुश्मन को उसकी भाषा में जवाब मिला। लेकिन एक साल बाद सबसे बड़ा सवाल यही है क्या सच में ‘जवाब मिला, या सिर्फ ‘जवाब देने की छवि बनाई गई? सरकार कहती है ऑपरेशन सिंदूर अभी भी जारी है। अगर ऐसा है, तो यह स्वीकार करना होगा कि खतरा भी अभी खत्म नहीं हुआ। फिर सवाल उठता है कि क्या यह ऑपरेशन एक रणनीतिक दीर्घकालिक नीति है या एक लगातार खिंचता हुआ प्रतीक, जिसे समय-समय पर राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक संदेश के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है?
अगर ऑपरेशन जारी है, तो उसका परिणाम क्या है? क्या आतंकवादी ढांचे का स्थायी विनाश हुआ? क्या सीमा पार से आने वाली गतिविधियां रुकीं? क्या पहलगाम जैसे हमलों की पुनरावृत्ति की संभावना खत्म हो गई? अगर इन सवालों का जवाब ‘नहीं या ‘पूरी तरह नहीं है, तो फिर हमें यह मानने में संकोच नहीं होना चाहिए कि केवल सैन्य कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। यहीं पर सरकार की सबसे बड़ी चुनौती खड़ी होती है क्या वह इस ऑपरेशन को केवल ‘जवाबी कार्रवाई के रूप में देख रही है या इसे एक व्यापक रणनीति का हिस्सा बना रही है? क्योंकि इतिहास गवाह है, आतंकवाद सिर्फ गोलियों से खत्म नहीं होता, वह विचार, नेटवर्क और अंतरराष्ट्रीय समर्थन से चलता है।
दूसरी तरफ विपक्ष है, जो सवाल पूछ रहा है और पूछना चाहिए। खुफिया चूक कैसे हुई? क्या हमले को रोका जा सकता था? ऑपरेशन की वास्तविक सफलता क्या है? लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब सवाल समाधान के बजाय केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में बदल जाते हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा अगर चुनावी बहस का हथियार बन जाए, तो असली मुद्दा पीछे छूट जाता है।
और फिर आता है सबसे खतरनाक पहलू समाज का विभाजन। पहलगाम हमले के बाद जिस तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं, उन्होंने यह दिखाया कि आतंकवादी अपने मकसद में आंशिक रूप से सफल रहे। अगर हम खुद ही अपने समाज को धर्म और पहचान के आधार पर बांटने लगें, तो आतंकवाद को किसी और हथियार की जरूरत ही नहीं है। पाकिस्तान की भूमिका पर कोई भ्रम नहीं है। भारत लगातार उसे आतंकवाद का प्रायोजक मानता रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ आरोप लगाना और जवाबी हमले करना ही पर्याप्त है? अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान कभी शांति वार्ताकार की भूमिका में दिखता है, तो कभी आरोपों के घेरे में और यह दोहरी स्थिति भारत के लिए एक कूटनीतिक चुनौती भी है।
अब एक साल बाद, तस्वीर साफ है हमने जवाब दिया, लेकिन समाधान अभी अधूरा है। ऑपरेशन सिंदूर अगर जारी है, तो उसे सिर्फ एक सैन्य अभियान नहीं, बल्कि एक समग्र रणनीति में बदलना होगा जिसमें खुफिया तंत्र की मजबूती, कूटनीतिक दबाव, और सबसे महत्वपूर्ण, आंतरिक सामाजिक एकता शामिल हो। क्योंकि सच्चाई यही है आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई सिर्फ सीमा पर नहीं जीती जाती। यह लड़ाई संसद में, समाज में, मीडिया में और अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी लड़ी जाती है।
अगर हम केवल यह कहते रहें कि ‘ऑपरेशन जारी हैÓ, लेकिन जमीन पर स्थिति में निर्णायक बदलाव न आए, तो यह वाक्य धीरे-धीरे एक ताकतवर संदेश से ज्यादा एक राजनीतिक नारा बनकर रह जाएगा। पहलगाम की बरसी हमें सिर्फ शोक में डुबोने के लिए नहीं आई है। यह हमें आईना दिखाने आई है कि क्या हम सच में मजबूत हो रहे हैं, या सिर्फ मजबूत दिखने की कोशिश कर रहे हैं। क्योंकि अंत में सवाल यही है, क्या हम आतंकवाद को खत्म कर रहे हैं, या सिर्फ उसके हर हमले के बाद खुद को साबित करने की कोशिश कर रहे हैं?