शक्ति और शोषण: कॉर्पोरेट गलियारों से उठता धुआँ

-सुभाष मिश्र

महाराष्ट्र के नासिक में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज की बीपीओ यूनिट से सामने आए कथित यौन उत्पीड़न, शोषण और जबरन धर्मांतरण के आरोपों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हमारे आधुनिक, शिक्षित और कॉर्पोरेट कार्यस्थल वास्तव में उतने सुरक्षित और पेशेवर हैं, जितना उन्हें प्रचारित किया जाता रहा और जितना हम मानते हैं। यदि यह घटना सच है तो यह बहुत बड़े भरोसे का टूटना है । यह मामला सिर्फ एक कंपनी या एक शहर तक सीमित नहीं है, बल्कि उस गहरे संकट की ओर संकेत है जो संस्थागत ढांचे के भीतर पनप रहा है । जहां शक्ति, विश्वास और अवसर का दुरुपयोग एक संगठित पैटर्न में बदलता जा रहा है। देश में बढ़ रही बेरोजगारी ने कॉरपोरेट सेक्टर में भी बड़े अधिकारियों को शोषण के लिए उकसाया है क्योंकि वे जानते हैं कि शोषित व्यक्ति कहीं शिकायत नहीं करेगा । नौकरियों की कमी है । शोषित व्यक्ति को नौकरी से निकालने की धमकी कारगर रहेगी ।नासिक की घटना में जिस तरह से महिलाओं ने अपने वरिष्ठों पर आरोप लगाए हैं ,लालच, दबाव, ब्लैकमेल, और यहां तक कि धार्मिक पहचान के साथ छेड़छाड़ और धर्मांतरण के आरोप ,वह केवल आपराधिक कृत्य नहीं, बल्कि कार्यस्थल की कार्य प्रणाली ,कंपनी के अनुशासन और कम्पनी की नैतिक विफलता का उदाहरण है। और जब इन आरोपों में आंतरिक शिकायत समिति (ICC) की भूमिका पर भी सवाल उठते हैं, तो समस्या और गंभीर हो जाती है। क्योंकि जो तंत्र पीड़ितों को सुरक्षा देने के लिए बना था, वही यदि मौन या निष्क्रिय हो जाए,और अन्याय की अनदेखी करे तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए?
लेकिन इस पूरे प्रकरण को केवल एक धर्म विशेष या समुदाय विशेष के चश्मे से देखना एक खतरनाक सरलीकरण होगा। यही वह बिंदु है जहां समाज और राजनीति अक्सर वास्तविक मुद्दे से भटक जाते हैं। नासिक का मामला हो, अमरावती में युवतियों के शोषण और ब्लैकमेलिंग का मामला हो, या विभिन्न राज्यों में स्वयंभू धर्मगुरुओं द्वारा यौन शोषण के खुलासे , इन सभी घटनाओं में एक समान तत्व है: शक्ति का दुरुपयोग और कमजोर स्थिति में मौजूद व्यक्ति का शोषण।
अमरावती में सामने आए प्रकरण, पालघर में नाबालिग को देह व्यापार में धकेलने की घटना, और देशभर में समय-समय पर उजागर होते ऐसे मामलों से यह स्पष्ट होता है कि अपराध का चेहरा किसी एक धर्म, जाति या वर्ग तक सीमित नहीं है। यह एक व्यापक सामाजिक विकृति है, जो अवसर मिलने पर अलग-अलग रूपों में सामने आती है।
दरअसल, आज के दौर में कॉर्पोरेट ग्रूमिंग जैसे नए शब्द सामने आ रहे हैं, जो यह समझने में मदद करते हैं कि शोषण अब केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक स्तर पर भी होता है। एक वरिष्ठ अधिकारी अपने पद और प्रभाव का इस्तेमाल कर कर्मचारी को पहले भरोसे में लेता है, फिर उसे धीरे-धीरे नियंत्रित करता है। यह प्रक्रिया इतनी सूक्ष्म होती है कि पीड़ित को लंबे समय तक यह एहसास ही नहीं होता कि वह शोषण का शिकार हो रहा है।
कॉर्पोरेट और ग्लोबल दुनिया में बढ़ती आर्थिक असमानता, तेज़ी से बदलती जीवनशैली और ग्लैमर की चमक भी इन घटनाओं की पृष्ठभूमि में काम करती है। जहां एक तरफ कुछ लोगों के पास अपार पैसा और शक्ति है, वहीं दूसरी ओर बड़ी संख्या में युवा—खासतौर पर छोटे शहरों से आने वाले—अवसर, करियर और बेहतर जीवन की तलाश में इन संस्थानों में प्रवेश करते हैं। इस असमानता का फायदा उठाकर कई बार प्रभावशाली लोग ग्रोमिंग के जरिए उन्हें अपने प्रभाव में लेते हैं। कभी लालच ,जैसे प्रमोशन, सैलरी या लाइफस्टाइल तो कभी मजबूरी जैसे पारिवारिक दबाव या आर्थिक जरूरत इन रिश्तों को असमान बना देती है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एपस्टीन फाइल्स जैसे मामलों ने भी यह दिखाया है कि यह समस्या किसी एक देश या समाज तक सीमित नहीं है, बल्कि शक्ति, पैसे और नेटवर्क के गठजोड़ से पैदा होने वाली एक वैश्विक प्रवृत्ति है। वहीं, समाज में बढ़ते खुलेपन और निजी संबंधों की बदलती परिभाषाएं भी एक नई जटिलता जोड़ती हैं ,जहां कई बार सहमति, महत्वाकांक्षा और दबाव की रेखाएं धुंधली हो जाती हैं। कुछ मामलों में यह शोषण साफ दिखता है, तो कुछ में यह आपसी समझौते और आगे बढ़ने की चाह के बीच उलझ जाता है।
यही वह धुंधला क्षेत्र है, जहां कानून, नैतिकता और व्यक्तिगत चुनाव के बीच संतुलन बनाना सबसे कठिन हो जाता है। इसलिए जरूरी है कि इन घटनाओं को केवल अपराध या केवल नैतिक पतन के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे खतरनाक सामाजिक परिवर्तन के संकेत के रूप में भी देखा जाए, जिसमें अवसर, आकांक्षा और असमानता तीनों मिलकर अपराध के अवसर जुटाते हैं।
सरकार की भूमिका यहां केवल कानून बनाने तक सीमित नहीं रह सकती। POSH Act 2013 जैसे कानून पहले से मौजूद हैं, लेकिन उनका प्रभावी क्रियान्वयन सरकारी और प्रशासकीय विफलता है। सरकार को यह देखना होगा किजैसे सांप्रदायिकता के अर्थ बदल गए और उसमेंगलत मनी से आगे जाकर मुस्लिम देशों की वैश्विक वित्तीय सहायता शामिल हो गई है ,इस प्रकार धर्मांतरण भी राजनीतिक बदले के रूप में नई शक्ल ले रहा है । क्योंकि यह सहज या सामान्य घटना होती तो कभी-कभार या कहीं-कहीं एकाध जगह एकाध बार होती लेकिन इस तरह की घटनाओं का दोहराव एक खतरनाक संकेत है ।
कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी आंतरिक शिकायत समितियां केवल औपचारिकता न बनकर, वास्तव में स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से काम करें। शिकायतों को दबाना या नजरअंदाज करना भी उतना ही गंभीर अपराध माना जाना चाहिए जितना कि स्वयं उत्पीड़न।
साथ ही, समाज को भी आत्ममंथन की जरूरत है। हर घटना को धार्मिक या राजनीतिक रंग देने से न तो पीड़ितों को न्याय मिलेगा और न ही भविष्य में ऐसे अपराध रुकेंगे। इसके बजाय हमें यह समझना होगा कि यह समस्या सत्ता, लालच और नैतिक पतन की है , जो हर समुदाय और हर वर्ग में मौजूद हो सकती है।
मीडिया और राजनीतिक संगठनों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। यदि वे इन घटनाओं को केवल अपने-अपने नैरेटिव के अनुसार प्रस्तुत करेंगे, तो वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाएंगे। जरूरत इस बात की है कि पीड़ितों की आवाज को केंद्र में रखा जाए और संस्थागत सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं। आखिरकार, यह सवाल केवल नासिक या किसी एक कंपनी का नहीं है। यह उस समाज का आईना है, जहां आधुनिकता के आवरण के पीछे पुरानी विकृतियां नए रूप में उभर रही हैं। जब तक हम इसे एक व्यापक सामाजिक और संस्थागत समस्या के रूप में नहीं देखेंगे, तब तक हर नया खुलासा केवल कुछ दिनों की सनसनी बनकर रह जाएगा और फिर सब कुछ पहले जैसा हो जाएगा।

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