सावरकर की प्रतिमा पर सियासी संग्राम, तेलीबांधा बना अखाड़ा, प्रतिमा का प्रस्ताव और सियासी बवाल, टकराईं विचारधाराएं


रायपुर। रायपुर के सबसे चर्चित सार्वजनिक स्थलों में शामिल तेलीबांधा तालाब एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। इस बार विवाद की वजह तालाब परिसर में स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर की प्रतिमा स्थापित करने का प्रस्ताव है। जैसे ही सावरकर स्मृति संस्था ने नगर निगम को प्रतिमा स्थापना के लिए आवेदन सौंपा, इसे लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया। कांग्रेस ने जहां इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताई है, वहीं सावरकर समर्थक संगठन इसे राष्ट्रीय सम्मान और ऐतिहासिक स्मृति से जुड़ा विषय बता रहे हैं।


सावरकर स्मृति संस्था का कहना है कि स्वतंत्रता आंदोलन में वीर सावरकर के योगदान को देखते हुए राजधानी में उनकी प्रतिमा स्थापित की जानी चाहिए। संस्था ने इसके लिए तेलीबांधा तालाब परिसर को उपयुक्त स्थान बताया है। उनका तर्क है कि यह रायपुर का सबसे प्रमुख सार्वजनिक स्थल है, जहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं और ऐसे स्थान पर प्रतिमा स्थापित होने से नई पीढ़ी को देश के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास से परिचित होने का अवसर मिलेगा।


हालांकि प्रस्ताव सामने आते ही राजनीतिक विवाद शुरू हो गया। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने इस पहल का विरोध करते हुए कहा कि तेलीबांधा तालाब की अपनी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान है। उनके अनुसार किसी भी नई पहचान को इस स्थान पर थोपना उचित नहीं होगा। उन्होंने यह भी कहा कि छत्तीसगढ़ की धरती पर अनेक स्थानीय महापुरुष, लोकनायक और लोकआस्था से जुड़े प्रतीक हैं, जिन्हें प्राथमिकता मिलनी चाहिए। बैज ने माता कर्मा और तेलहीन माई जैसे स्थानीय प्रतीकों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत का सम्मान सर्वोपरि होना चाहिए।


कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा और उससे जुड़े संगठन लगातार स्थानीय इतिहास और क्षेत्रीय अस्मिता को पीछे धकेलकर राष्ट्रीय स्तर के प्रतीकों को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। पार्टी का कहना है कि ऐसे किसी भी निर्णय से पहले स्थानीय नागरिकों और समाज की भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए। दूसरी ओर, सावरकर स्मृति मंच ने कांग्रेस की आपत्तियों को राजनीति से प्रेरित बताया है। मंच के संयोजक इंजीनियर गिरधारी का कहना है कि प्रतिमा स्थापना का प्रस्ताव किसी व्यक्ति, समुदाय या स्थानीय परंपरा के विरोध में नहीं है। उनका तर्क है कि रायपुर शहर में पहले से अनेक राष्ट्रीय नेताओं और महापुरुषों की प्रतिमाएं स्थापित हैं, इसलिए वीर सावरकर को भी सम्मान देने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।


उन्होंने कहा कि तेलीबांधा तालाब राजधानी का सबसे प्रमुख और सर्वाधिक लोकप्रिय सार्वजनिक स्थल है। यहां स्थापित प्रतिमा न केवल ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करेगी, बल्कि युवाओं को स्वतंत्रता आंदोलन के विभिन्न आयामों को समझने का अवसर भी देगी। उन्होंने यह सुझाव भी रखा कि यदि प्रतिमा के साथ लाइट एंड साउंड शो जैसी व्यवस्था विकसित की जाए तो यह क्षेत्र पर्यटन और सांस्कृतिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र बन सकता है।


इस बीच नगर निगम प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि अभी प्रतिमा स्थापना को लेकर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। निगम सूत्रों के अनुसार प्रस्ताव सबसे पहले मेयर-इन-काउंसिल (एमआईसी) के समक्ष रखा जाएगा। वहां चर्चा और विचार-विमर्श के बाद इसे सामान्य सभा में भेजा जाएगा, जहां निर्वाचित जनप्रतिनिधि इस पर अंतिम निर्णय लेंगे।


गौरतलब है कि तेलीबांधा तालाब राजधानी रायपुर की पहचान बन चुका है। यहां स्थित विशाल राष्ट्रीय ध्वज, मरीन ड्राइव और विकसित पर्यटन सुविधाएं इसे शहर के प्रमुख आकर्षण केंद्रों में शामिल करती हैं। प्रतिदिन बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिक और पर्यटक यहां पहुंचते हैं। यही कारण है कि इस स्थल पर किसी नई प्रतिमा की स्थापना का प्रस्ताव केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं रह गया है, बल्कि यह सांस्कृतिक पहचान, राजनीतिक विचारधारा और सार्वजनिक स्मृति से जुड़ी बहस का विषय बन गया है।


फिलहाल प्रतिमा स्थापना को लेकर अंतिम फैसला भले ही नगर निगम के स्तर पर होना हो, लेकिन प्रस्ताव ने राजधानी की राजनीति में नई चर्चा जरूर छेड़ दी है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह मुद्दा सांस्कृतिक सम्मान के रूप में आगे बढ़ता है या फिर राजनीतिक टकराव का नया केंद्र बनता है।

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