परिसीमन: बढ़ती सीटें, सिकुड़ता संतुलन और सवालों के घेरे में नीयत

-सुभाष मिश्र

भारत आज दुनिया की सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है यह उपलब्धि कम, चुनौती अधिक है। सीमित भूगोल, सीमित संसाधन और असीमित जनसंख्या का यह समीकरण हमारी नीतियों की सफलता और विफलता दोनों को तय करता है। विडंबना देखिए कि दशकों से हम जनसंख्या नियंत्रण की बात करते आए, योजनाएँ बनाईं, अभियान चलाए—लेकिन आज भी हमारी अधिकांश समस्याओं की जड़ में यही अनियंत्रित जनसंख्या खड़ी दिखाई देती है।
ऐसे में एक बुनियादी सवाल उठता है, क्या भारत में जनसंख्या नियंत्रण एक नीति है या केवल नारा? और अगर यह नीति है, तो उसका पुरस्कार क्या है और दंड क्या? परिसीमन की मौजूदा बहस ने इस प्रश्न को बेहद तीखे ढंग से हमारे सामने ला खड़ा किया है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन, केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन और तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए रेवंत रेड्डी जिस आशंका को जता रहे हैं, वह दरअसल एक गहरे असंतुलन की ओर इशारा करती है, जो राज्य जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे, क्या अब वही अपने राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कटौती का सामना करेंगे?
यदि परिसीमन केवल जनसंख्या के आधार पर होता है, तो इसका सीधा अर्थ है, जिन राज्यों ने जनसंख्या बढ़ाई, उनकी लोकसभा में हिस्सेदारी बढ़ेगी और जिन्होंने नियंत्रण किया, उनकी सापेक्ष हिस्सेदारी घटेगी। यानी अधिक जनसंख्या एक तरह से अधिक राजनीतिक शक्ति में बदल जाएगी।
यह सवाल केवल दक्षिण बनाम उत्तर का नहीं है, यह सवाल नीति बनाम परिणाम का है।
क्या हम यह संदेश देना चाहते हैं कि—
जनसंख्या बढ़ाओ, राजनीतिक ताकत पाओ;
जनसंख्या नियंत्रित करो, तो प्रतिनिधित्व घटाओ?
अगर ऐसा है, तो फिर देश में परिवार नियोजन के सारे अभियान सिर्फ पोस्टर और नारे बनकर रह जाएंगे। केंद्र सरकार का पक्ष भी अपनी जगह है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय मंत्री पियुष गोयल का कहना है कि महिला आरक्षण को लागू करने के लिए परिसीमन आवश्यक है और इससे लोकतंत्र अधिक समावेशी होगा। लेकिन यहीं पर दूसरा बड़ा प्रश्न खड़ा होता है, क्या महिला आरक्षण और परिसीमन को एक-दूसरे से जोडऩा अनिवार्य है, या यह एक राजनीतिक पैकेजिंग है?
विपक्ष की ओर से सोनिया गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे और शशि थरूर जैसे नेताओं ने जिस आशंका को उठाया है, वह आम जनता के मन में भी है, यदि महिला आरक्षण पर व्यापक सहमति है, तो उसे सीधे लागू क्यों नहीं किया जाता? उसे जनगणना और परिसीमन जैसी जटिल प्रक्रियाओं से क्यों जोड़ा गया?
यहाँ संशय पैदा होता है और राजनीति में संशय ही सबसे बड़ी समस्या है।
परिसीमन अपने आप में कोई गलत प्रक्रिया नहीं है। यह संविधान सम्मत है और समय-समय पर आवश्यक भी। लेकिन सवाल प्रक्रिया से ज्यादा प्राथमिकता और निष्पक्षता का है। क्या हम केवल गणितीय समानता (जनसंख्या के अनुपात) को ही न्याय मान लें, या फिर संघीय संतुलन, विकास और नीति-प्रदर्शन को भी उसमें जगह दें?
यदि केवल संख्या ही निर्णायक होगी, तो फिर लोकतंत्र प्रतिनिधित्व से ज्यादा गणना बनकर रह जाएगा। यही कारण है कि डिग्रेसिव प्रपोर्शनैलिटी या हाइब्रिड मॉडल जैसे सुझाव सामने आ रहे हैं, जहाँ जनसंख्या के साथ-साथ राज्यों के विकास, प्रशासनिक दक्षता और सामाजिक प्रगति को भी महत्व दिया जाए। यह एक कठिन रास्ता जरूर है, लेकिन शायद यही न्यायपूर्ण भी है। सबसे गंभीर पहलू है, विश्वास का संकट। जिस तेजी और तरीके से इस मुद्दे को आगे बढ़ाया जा रहा है, उसने राजनीतिक अविश्वास को और गहरा किया है। दक्षिण के राज्यों को यह आशंका है कि उनकी राजनीतिक आवाज कमजोर की जा रही है, जबकि केंद्र का दावा है कि ऐसा कुछ नहीं होगा।
सवाल यह नहीं है कि कौन सही है, सवाल यह है कि क्या यह प्रक्रिया सभी को सही लग रही है? क्योंकि लोकतंत्र केवल फैसलों से नहीं, बल्कि उनकी स्वीकार्यता से चलता है।
अंतत: परिसीमन देश को मजबूत भी कर सकता है और विभाजित भी। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि इसे किस भावना से लागू किया जाता है, प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए या शक्ति संतुलन बदलने के लिए। और शायद यही इस पूरे विवाद का सबसे तीखा, सबसे असहज सवाल है क्या हम एक ऐसा लोकतंत्र गढ़ रहे हैं, जहाँ जनसंख्या ही भविष्य तय करेगी, या फिर ऐसा भारत बना रहे हैं जहाँ संतुलन, न्याय और दूरदर्शिता साथ-साथ चलें?

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