-सुभाष मिश्र
छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से लगातार छत्तीसगढ़ जिसे धान का कटोरा कहा जाता है ,वहां पर फसल चक्र परिवर्तन की बात होती रही है। कहा जाता रहा है कि छत्तीसगढ़ के किसानों की तकदीर तब बदलेगी जब वह लाभकारी फसल उगाएगा। पिछले 25 साल में ऐसा कभी नहीं हुआ कि जब सरकार के स्तर पर लाभकारी फसलों की बात ना हुई हो या फसल चक्र परिवर्तन की बात नहीं की गई हो। लेकिन जमीनी हकीकत ठीक इसके विपरीत है। धान का यह कटोरा अंतत: धान की राजनीति पर ही आकर रुक गया और धान की खऱीदी उसका समर्थन मूल्य, बोनस इन्हीं मुद्दों को लेकर किसी की भी सरकार रही हो उसने धान को ही केंद्र में रखा। इस बीच में कुछ किसान जो हरियाणा के थे ,पंजाब के थे, राजस्थान के थे उन्होंने यहां आकर खेती की जमीन खरीदी और आधुनिक खेती करना प्रारंभ किया। फसल चक्र परिवर्तन तो हुआ पर सीमित जगहों और लोगों द्वारा। छत्तीसगढ़ का मूल किसान धान के कटोरे को ही सरकार की मदद से थामे रहा इस बीच में कुछ लोगों ने अपने तरीक़े से फसल चक्र का परिवर्तन कर अफ़ीम की खेती करके लाभकारी खेती की शुरुआत की। जो पूर्ववर्ती सीमावर्ती जिले हैं या पर्वतीय क्षेत्र के नजदीक की जगहों पर नये कि़स्म की नशे की खेती की। अभी हाल ही में दुर्ग में अफीम की खेती का मामला सामने आया उसके बाद बलरामपुर में। अभी और भी मामले उजागर होना शेष है। यह नये तरीक़े का फसल चक्र परिवर्तन है जिसमें सर्वाधिक लाभकारी अफ़ीम की फसल उगाई जा रही है। यह विकसित और उड़ते छत्तीसगढ़ की नई पहचान बन रही है जहां सड़क मार्ग से गांजा आ रहा है और ज़मीन पर अफ़ीम की पैदावार लहलहा रही है।
छत्तीसगढ़ को लंबे समय से ‘धान का कटोरÓ कहा जाता है। राज्य बनने के बाद से ही लगभग हर सरकार ने इस पहचान को बदलने या कम से कम इसके दायरे को व्यापक बनाने की बात की है। फसल चक्र परिवर्तन, लाभकारी फसलों की खेती और कृषि को अधिक विविध बनाने की योजनाएँ बार-बार सामने आईं। कहा गया कि छत्तीसगढ़ का किसान तब ही समृद्ध होगा जब वह केवल धान पर निर्भर रहने के बजाय ऐसी फसलें उगाएगा जिनसे उसे बेहतर आय मिले।
लेकिन बीते पच्चीस वर्षों का अनुभव यह बताता है कि यह चर्चा जितनी बार हुई, उतनी ही बार अंतत: राजनीति धान के समर्थन मूल्य और बोनस पर आकर ठहर गई। चाहे किसी भी दल की सरकार रही हो, चुनावी और आर्थिक दोनों दृष्टि से धान ही केंद्र में रहा। परिणाम यह हुआ कि फसल चक्र परिवर्तन का विचार कागज़ों और घोषणाओं से आगे बहुत कम बढ़ पाया। इस बीच छत्तीसगढ़ के कुछ जिलों में एक अलग प्रवृत्ति भी दिखाई दी। हरियाणा, पंजाब और राजस्थान जैसे राज्यों से आए कुछ किसानों और उद्यमियों ने यहाँ जमीन खरीदी या पट्टे पर लेकर आधुनिक खेती की शुरुआत की। सब्जियों, बागवानी और नई तकनीकों के प्रयोग से यह साबित करने की कोशिश हुई कि यदि बाजार और प्रबंधन ठीक हो तो खेती के कई विकल्प संभव हैं। कुछ स्थानीय किसानों ने भी प्रयोग किए, लेकिन इन प्रयासों को व्यापक आधार नहीं मिल सका।
कारण स्पष्ट हैं। प्रोसेसिंग यूनिटों का अभाव, बाजार की अस्थिरता और सरकारी तंत्र की सीमाएँ। टमाटर और सब्जियों के कई उदाहरण ऐसे हैं जब उत्पादन तो हुआ, लेकिन उचित दाम न मिलने के कारण किसानों को अपनी उपज सड़क पर फेंकनी पड़ी। ऐसी परिस्थितियों में किसान स्वाभाविक रूप से उसी फसल की ओर लौटता है जिसकी खरीद की गारंटी सरकार देती है। इस तरह धान केवल कृषि नहीं, बल्कि एक तरह की ‘सुरक्षा फसलÓ बन गया।
इसी पृष्ठभूमि में हाल के दिनों में दुर्ग और बलरामपुर जिलों में अवैध अफ़ीम की खेती का खुलासा होना एक गंभीर संकेत है। बलरामपुर जिले के खजूरी पंचायत के तुर्रीपानी गांव में लगभग ढाई-तीन एकड़ में अफ़ीम की फसल मिलने की घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच में यह सामने आया कि जमीन एक स्थानीय आदिवासी किसान की थी जिसे झारखंड के एक व्यक्ति को खेती के लिए लीज पर दिया गया था। पौधे पूरी तरह परिपक्व अवस्था में थे और उनमें चीरा लगाकर अफ़ीम का लेटेक्स निकालने की तैयारी चल रही थी।
इससे पहले भी कुसमी क्षेत्र के त्रिपुरी गांव में इसी तरह का मामला सामने आया था। पुलिस और राजस्व अमले ने फसल नष्ट कर दी है और जांच जारी है, लेकिन इससे यह आशंका भी सामने आई है कि कहीं यह द्बह्यशद्यड्डह्लद्गस्र घटना नहीं बल्कि किसी बड़े नेटवर्क का संकेत तो नहीं। झारखंड और ओडिशा की सीमा से लगे पहाड़ी और दूरस्थ इलाकों में बाहरी मजदूरों के माध्यम से इस तरह की खेती कराए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
स्वाभाविक है कि मामला सामने आते ही राजनीति गरमा गई। विधानसभा का सत्र चल रहा है और सत्ता-पक्ष तथा विपक्ष एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि यदि प्रशासन के पास हर सीजन की फसलों का रिकॉर्ड रहता है, तो इतनी बड़ी मात्रा में अफ़ीम की खेती उसकी नजर से कैसे बच गई। यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि मिलीभगत की आशंका भी पैदा करता है। दूसरी ओर सरकार का कहना है कि मामला सामने आते ही कार्रवाई की गई है और इसे किसी भी तरह दबाने की कोशिश नहीं की जा रही। अब हर जिले में जांच के निर्देश दिए गए हैं।
दरअसल, समस्या केवल कानून-व्यवस्था की नहीं है। इसके पीछे कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की गहरी परतें भी छिपी हैं। जब खेती लगातार घाटे का सौदा बनती है और लाभकारी विकल्पों का भरोसेमंद ढांचा तैयार नहीं हो पाता, तब जल्दी मुनाफा कमाने का लालच बढ़ता है। कई बार किसान बिना पूरी जानकारी के अपनी जमीन ऐसे लोगों को दे देते हैं जो ‘लाभकारी फसलÓ या ‘आधुनिक खेतीÓ के नाम पर जमीन ले लेते हैं और बाद में उसमें अवैध या संदिग्ध खेती शुरू कर देते हैं।
छत्तीसगढ़ में यह स्थिति नई नहीं है। कभी जेट्रोफा से बायोडीज़ल बनाने का सपना दिखाया गया, कभी मशरूम और फूलों की खेती को चमत्कारी विकल्प बताया गया। तिलहन-दलहन, गन्ना और मक्का उत्पादन बढ़ाने की योजनाएँ भी बनीं। लेकिन इनमें से बहुत कम पहलें ऐसी रहीं जो स्थायी रूप से किसानों की आय बढ़ा सकीं। नतीजा यह हुआ कि किसान बार-बार कर्ज माफी, समर्थन मूल्य और बोनस के चक्र में ही घूमता रहा।
इस पूरे परिदृश्य में कुछ चतुर और अवसरवादी तत्वों के लिए अवसर भी बनता गया। आधुनिक खेती, हर्बल खेती या ऊंचे मुनाफे का सपना दिखाकर जमीन लेना और फिर अपनी मर्जी की फसल लगाना—यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे बढ़ी है। अफ़ीम की खेती का हालिया खुलासा उसी प्रवृत्ति का चरम रूप प्रतीत होता है। इसलिए यह बहस केवल इस बात तक सीमित नहीं रहनी चाहिए कि अफ़ीम की खेती किसके संरक्षण में हुई या किसकी लापरवाही से हुई। असली सवाल यह है कि क्या छत्तीसगढ़ में कृषि नीति वास्तव में फसल विविधीकरण की दिशा में आगे बढ़ पाई है? यदि नहीं, तो क्यों?
फसल चक्र परिवर्तन केवल घोषणा या नारे से संभव नहीं होता। इसके लिए बाजार, प्रोसेसिंग, परिवहन, तकनीक और किसानों के प्रशिक्षण—इन सबका मजबूत ढांचा चाहिए। जब तक वैकल्पिक फसलों की खरीद और मूल्य की गारंटी नहीं होगी, तब तक किसान धान से बाहर निकलने का जोखिम नहीं लेगा।
दूसरी ओर प्रशासनिक स्तर पर भी सतर्कता जरूरी है। यदि दूरस्थ इलाकों में जमीन लीज पर देकर बाहरी लोगों द्वारा खेती कराई जा रही है, तो उसकी निगरानी का स्पष्ट तंत्र होना चाहिए। यह केवल नारकोटिक्स या पुलिस का मामला नहीं, बल्कि राजस्व और कृषि विभाग की भी जिम्मेदारी है।
आज जब छत्तीसगढ़ में अवैध अफ़ीम की खेती को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप हो रहे हैं, तब यह याद रखना चाहिए कि इस बहस की जड़ें कहीं गहरी हैं। धान के कटोरे में यदि सचमुच फसल चक्र परिवर्तन की नई कहानी लिखनी है, तो उसे केवल घोषणाओं से नहीं बल्कि ठोस कृषि-आर्थिक ढांचे से संभव बनाना होगा। अन्यथा स्थिति यही रहेगी कि राजनीति अपने-अपने तरीके से ‘अफ़ीम की फसलÓ काटती रहेगी और किसान वहीं खड़ा रहेगा जहाँ वह वर्षों से खड़ा है। धान के खेत के बीच, उम्मीद और अनिश्चितता के उसी पुराने चक्र में।