दिल मिले या न मिले…” कांग्रेस की तस्वीर ने खोल दी अंदरूनी कलह


कृष्ण कुमार सिकंदर, रायपुर। छत्तीसगढ़ कांग्रेस की राजनीति इन दिनों बयान, संकेत और तस्वीरों के सहारे नए अर्थ गढ़ रही है। कभी बंद कमरों में सिमटी रहने वाली खेमेबाजी अब सार्वजनिक मंचों तक पहुंच चुकी है। कोरबा में आयोजित एक कार्यक्रम की एक तस्वीर ने इसी अंदरूनी असहजता को फिर सुर्खियों में ला दिया। मंच पर वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज अगल-बगल बैठे दिखाई दिए, लेकिन दोनों के चेहरे अलग-अलग दिशाओं में थे। राजनीति में तस्वीरें अक्सर शब्दों से ज्यादा बोलती हैं और यही वजह है कि इस एक तस्वीर को लेकर सियासी गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया।


राजनीतिक विश्लेषक इसे महज संयोग नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर चल रही वैचारिक और नेतृत्व संबंधी दूरी का प्रतीक मान रहे हैं। मंच पर साथ बैठे नेताओं की देहभाषा ने यह संकेत दे दिया कि पार्टी के भीतर सब कुछ उतना सहज नहीं है, जितना ऊपर से दिखाने की कोशिश की जा रही है। ऐसे समय में, जब कांग्रेस को आगामी चुनावों और संगठनात्मक मजबूती के लिए एकजुटता की सबसे ज्यादा जरूरत है, नेताओं के बयान और तस्वीरों से निकलते संकेत पार्टी की अंदरूनी बेचैनी को उजागर कर रहे हैं।


दरअसल, पूरा विवाद उस वक्त शुरू हुआ जब दक्षिण छत्तीसगढ़ के प्रभावशाली नेता टीएस सिंहदेव ने एक साक्षात्कार में कहा कि यदि पार्टी हाईकमान उन्हें प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपता है, तो वे उसे निभाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी प्राथमिकता संगठन को मजबूत करना होगी और उनमें आज भी युवाओं जैसी ऊर्जा मौजूद है। राजनीतिक हलकों में इस बयान को एक सामान्य प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि प्रदेश कांग्रेस की कमान संभालने की खुली इच्छा के रूप में देखा गया।


सिंहदेव के इस बयान ने वैसे भी लंबे समय से चल रही नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाओं को और हवा दे दी। कांग्रेस के भीतर पहले से ही यह चर्चा चल रही थी कि विधानसभा चुनाव में सत्ता गंवाने के बाद संगठनात्मक स्तर पर बड़े बदलाव हो सकते हैं। ऐसे माहौल में सिंहदेव का बयान सीधे तौर पर प्रदेश नेतृत्व की ओर इशारा करता नजर आया। इसके तुरंत बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज की प्रतिक्रिया ने सियासी तापमान और बढ़ा दिया। बैज ने साफ कहा कि टीएस सिंहदेव पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं और उन्हें दिल्ली में राष्ट्रीय स्तर पर काम करना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ दिया कि प्रदेश में युवाओं को अवसर मिलना चाहिए। बैज का यह बयान राजनीतिक तौर पर बेहद अहम माना गया, क्योंकि इसे प्रदेश नेतृत्व की ओर से अपनी स्थिति बचाने और चुनौती का जवाब देने के रूप में देखा गया।


कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में यह बयानबाजी ऐसे समय सामने आई, जब पार्टी पहले ही समन्वय की कमी, क्षेत्रीय प्रभाव और नेतृत्व संतुलन जैसे मुद्दों से जूझ रही है। एक तरफ अनुभवी नेताओं का प्रभाव है, तो दूसरी तरफ नई पीढ़ी को आगे लाने की मांग भी लगातार उठ रही है। यही वजह है कि सिंहदेव और बैज के बयानों ने पार्टी के भीतर मौजूद खेमेबाजी को खुलकर सामने ला दिया। इस पूरे घटनाक्रम के बीच पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने खुद को लगभग तटस्थ बनाए रखा। उन्होंने बेहद संतुलित अंदाज में कहा कि पार्टी में अध्यक्ष और मुख्यमंत्री का फैसला हाईकमान तय करता है और वे सिंहदेव के बयानों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देते।


हालांकि, बयानबाजी के बाद कोरबा में दोनों नेताओं की मुलाकात ने कुछ देर के लिए यह संदेश जरूर देने की कोशिश की कि पार्टी में सब सामान्य है। दोनों नेताओं ने बातचीत की, मंच साझा किया और कांग्रेस समर्थकों ने इसे एकता का संकेत बताने की कोशिश भी की। लेकिन उसी मंच से आई तस्वीर ने फिर कई सवाल खड़े कर दिए। शायद इसी राजनीतिक परिस्थिति पर मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली की पंक्तियां बिल्कुल सटीक बैठती हैं—


“दुश्मनी लाख सही, खत्म न कीजिए रिश्ता,
दिल मिले या न मिले, हाथ मिलाते रहिए।”
छत्तीसगढ़ कांग्रेस में फिलहाल यही तस्वीर दिखाई दे रही है। हाथ तो मिल रहे हैं, लेकिन दिलों की दूरी अब तस्वीरों में भी नजर आने लगी है।

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