कोंडागांव। जिले में फलदार और प्रतिबंधित वृक्षों की अवैध कटाई और तस्करी का मामला गरमाता जा रहा है। ताजा मामला बोरगांव के पास का है, जहां वन विभाग की टीम ने घेराबंदी कर लकड़ियों से लदी दो गाड़ियों को पकड़ा, लेकिन उच्च अधिकारी के हस्तक्षेप के बाद उन्हें बिना किसी ठोस कार्रवाई के छोड़ दिया गया। इस घटना ने विभागीय कार्यप्रणाली और नियमों की अनदेखी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
महज एक फोन कॉल पर छोड़ दी गईं गाड़ियां
प्राप्त जानकारी के अनुसार, मुखबिर की सूचना पर वन अमले ने दुर्ग-भिलाई पासिंग की दो गाड़ियों (CG-07 CH 6304 और CG-07 CJ 3729) को रोका था। इनमें भारी मात्रा में प्रतिबंधित आम और सेमल की लकड़ियां लदी थीं। कर्मचारियों ने अभी जांच शुरू ही की थी कि उपवनमंडलधिकारी (एसडीओ) ने मौके पर मौजूद टीम को निर्देश दिया कि गाड़ियों के दस्तावेज सही हैं और इन्हें तुरंत छोड़ दिया जाए। बिना भौतिक सत्यापन और ट्रांजिट पास (टीपी) की जांच किए महज फोन कॉल पर गाड़ियों को छोड़ना संदिग्ध माना जा रहा है।
नियमों की गलत व्याख्या का आरोप
जब मीडिया ने इस संबंध में पक्ष जानना चाहा, तो अधिकारी ने कैमरे पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया। हालांकि, एक वीडियो रिकॉर्डिंग में अधिकारी यह तर्क देते सुने गए कि आम और सेमल की लकड़ी को पंचायत स्तर पर बिना अनुमति के परिवहन किया जा सकता है। इसके विपरीत, विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय वन अधिनियम के तहत आम और सेमल की कटाई के लिए राजस्व विभाग की अनुमति और परिवहन के लिए वन विभाग का ट्रांजिट पास अनिवार्य है। प्रदेश में केवल नीलगिरी और बबूल जैसी कुछ ही प्रजातियों को परिवहन पास से छूट प्राप्त है।
संगठित तस्करी का संदेह
स्थानीय ग्रामीणों और जानकारों ने इस मामले में संगठित गिरोह की संलिप्तता की आशंका जताई है। सवाल उठ रहे हैं कि रायपुर और दुर्ग की गाड़ियां विशेष रूप से कोंडागांव के ग्रामीण इलाकों में लकड़ी लेने क्यों आ रही हैं। बिना हथौड़ा निशान और टीपी के इन लकड़ियों का परिवहन विभाग के दावों के उलट अवैध तस्करी की ओर इशारा करता है। इस घटना के बाद अब यह देखना होगा कि उच्चाधिकारी इस संदिग्ध आदेश की जांच करते हैं या नियमों की अनदेखी का यह सिलसिला जारी रहेगा।