रायपुर। छत्तीसगढ़ को बने तब मुश्किल से तीन साल हुए थे। नया राज्य था, नई उम्मीदें थीं और हर तरफ एक सपना आकार ले रहा थाI अब यहां के युवाओं को अपने ही प्रदेश में बड़े अफसर बनने का मौका मिलेगा। गांवों से लेकर शहरों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की चर्चा होने लगी थी। माता-पिता अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए जमीन बेच रहे थे, खेत गिरवी रख रहे थे, तो कई परिवारों ने बेटियों की पढ़ाई के लिए गहने तक बेच दिए। हर किसी को भरोसा था कि मेहनत रंग लाएगी और नई व्यवस्था में प्रतिभा को सम्मान मिलेगा।
इसी माहौल के बीच साल 2003 में छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग यानी सीजीपीएससी ने बड़ी भर्ती परीक्षा निकाली। डिप्टी कलेक्टर, डीएसपी, नायब तहसीलदार और कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों के लिए यह परीक्षा आयोजित हुई। हजारों युवाओं ने इसे जिंदगी बदल देने वाला मौका माना। छोटे शहरों के छात्र रायपुर, बिलासपुर और भिलाई जैसे शहरों में कोचिंग लेकर दिन-रात तैयारी में जुट गए। उस दौर में पीएससी केवल एक परीक्षा नहीं थी, बल्कि गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के सपनों का सबसे बड़ा जरिया थी, लेकिन जब 2005 में परीक्षा परिणाम घोषित हुए, तो उम्मीदों की जगह सवालों ने ले ली। कई ऐसे अभ्यर्थी, जिन्हें अपनी मेहनत और प्रदर्शन पर पूरा भरोसा था, चयन सूची से बाहर थे। वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे नाम चयनित उम्मीदवारों में दिखाई दिए, जिनके चयन को लेकर प्रतियोगियों के बीच फुसफुसाहट शुरू हो गई। धीरे-धीरे यह फुसफुसाहट आरोपों में बदल गई।
एेसे शुरू हुआ विवाद
शुरुआत में मामला सिर्फ असंतुष्ट अभ्यर्थियों की नाराजगी तक सीमित था। लोग कहते थे कि इंटरव्यू में मनमानी हुई है। आरोप लगाए गए कि लिखित परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन करने वाले उम्मीदवारों को पीछे कर प्रभावशाली परिवारों से जुड़े लोगों को ज्यादा अंक दिए गए। देखते ही देखते यह विवाद राज्य की सबसे चर्चित भर्ती अनियमितताओं में शामिल हो गया।
वर्षा डोंगरे लड़ाई का प्रमुख चेहरा
इसी दौर में एक नाम लगातार सामने आया वर्षा डोंगरे। वे खुद भी इस परीक्षा की अभ्यर्थी थीं। परिणाम आने के बाद उन्होंने सबसे पहले खुलकर आवाज उठाई। उनका आरोप था कि चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं बरती गई और योग्य उम्मीदवारों को दरकिनार कर कम अंक पाने वालों को ऊंचे पदों पर चयनित कर दिया गया। वर्षा डोंगरे ने अन्य अभ्यर्थियों के साथ मिलकर अदालत का दरवाजा खटखटाया। यह सिर्फ एक याचिका नहीं थी, बल्कि सिस्टम के खिलाफ लंबी लड़ाई की शुरुआत थी। समय बीतता गया, लेकिन लड़ाई खत्म नहीं हुई। सूचना के अधिकार यानी आरटीआई के जरिए कई दस्तावेज सामने आने लगे। लिखित परीक्षा और इंटरव्यू के अंकों की तुलना में कई विसंगतियां दिखाई दीं। आरोप लगे कि कुछ उम्मीदवारों को इंटरव्यू में असामान्य रूप से ज्यादा अंक देकर मेरिट सूची में ऊपर पहुंचाया गया। जैसे-जैसे दस्तावेज बाहर आते गए, मामला और गंभीर होता गया।
आरटीआई और एसीबी की जांच
विवाद बढ़ने पर जांच एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) को सौंपी गई। एसीबी की जांच में भी कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। जांच रिपोर्ट में मेरिट सूची से छेड़छाड़, आरक्षण नियमों के उल्लंघन और चयन प्रक्रिया में अनियमितताओं जैसे गंभीर बिंदुओं का उल्लेख किया गया। इससे यह मामला केवल छात्रों की शिकायत भर नहीं रहा, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की विश्वसनीयता पर सवाल बन गया।
हाईकोर्ट का फैसला
करीब एक दशक तक चली कानूनी लड़ाई के बाद 2017 में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने माना कि चयन प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं थी और इसमें गंभीर गड़बड़ियां हुई हैं। हाईकोर्ट ने नई मेरिट सूची तैयार करने का आदेश दिया। इस फैसले के बाद प्रशासनिक हलकों में हलचल मच गई, क्योंकि इससे कई अधिकारियों की नियुक्ति और वरिष्ठता प्रभावित हो सकती थी, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
सुप्रीम कोर्ट का स्टे
हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई और वहां से इस आदेश पर रोक लग गई। सुप्रीम कोर्ट के स्टे के बाद मामला फिर ठहर गया। जिन अधिकारियों के चयन पर सवाल उठे थे, वे नौकरी में बने रहे। समय के साथ उन्हें प्रमोशन भी मिलते गए और कई अधिकारी महत्वपूर्ण पदों तक पहुंच गए। दूसरी ओर, वे अभ्यर्थी जिन्होंने इस लड़ाई की शुरुआत की थी, वर्षों तक अदालतों के चक्कर काटते रहे।
22 साल बाद फिर चर्चा
आज 22 साल बाद भी यह मामला पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। हाल के दिनों में सुप्रीम कोर्ट की विशेष लोक अदालत में इस केस को लेकर फिर हलचल तेज हुई है। लोक अदालत का उद्देश्य पुराने मामलों का व्यावहारिक समाधान निकालना होता है। चूंकि यह विवाद दो दशक से ज्यादा पुराना हो चुका है, इसलिए अब स्थिति और जटिल हो गई है। कई अधिकारी सेवानिवृत्ति के करीब हैं, तो कुछ प्रशासनिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण पदों पर काम कर रहे हैं। ऐसे में अदालत क्या रास्ता निकालती है, इस पर सभी की नजर टिकी हुई है।
केस का असर और बड़े नाम
इस विवाद में जिन नामों की चर्चा बार-बार होती रही, उनमें उपमा किरण वार्डे, सारिका रामटेके, मनोज ब्लासांकर, सुनील कुमार, नेहा पांडे, हीरालाल देवांगन, अजय शर्मा, अजय बिरखे, भारती सिंह राजपूत, उमेश कुमार अग्रवाल और राजेंद्र नाथ तिवारी जैसे नाम शामिल रहे। इनमें कई अधिकारियों के चयन को लेकर सवाल उठाए गए थे। यदि भविष्य में कोई बड़ा न्यायिक फैसला आता है, तो इसका असर केवल नियुक्तियों पर ही नहीं, बल्कि वरिष्ठता, प्रमोशन और पूरी सेवा रिकॉर्ड व्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
चर्चा में आए नाम और चयनित पद
नाम उस समय चयनित/बताया गया पद
उपमा किरण वार्डे सहायक संचालक
सारिका रामटेके उप पंजीयक
मनोज ब्लासांकर आबकारी उप निरीक्षक
सुनील कुमार खाद्य निरीक्षक
नेहा पांडे चयन विवादित बताया गया
हीरालाल देवांगन चयन विवादित बताया गया
अजय शर्मा चयन विवादित बताया गया
अजय बिरखे चयन विवादित बताया गया
भारती सिंह राजपूत चयन विवादित बताया गया
उमेश कुमार अग्रवाल चयन विवादित बताया गया
राजेंद्र नाथ तिवारी चयन विवादित बताया गया
दरअसल, 2003 का पीएससी विवाद सिर्फ एक भर्ती परीक्षा का मामला नहीं है। यह उस भरोसे की कहानी है, जो लाखों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं पर करते हैं। जब किसी परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तो केवल एक रिजल्ट विवादित नहीं होता, बल्कि मेहनत, उम्मीद और व्यवस्था—तीनों कठघरे में खड़े हो जाते हैं। छत्तीसगढ़ के हजारों युवाओं के लिए यह मामला आज भी एक अधूरी लड़ाई जैसा है, जिसमें फैसला केवल अदालत को नहीं, बल्कि सिस्टम की साख को भी देना है।