Editor-in-Chief सुभाष मिश्र की कलम से – लालच के आगे हारता विवेक

-सुभाष मिश्र
भारतेंदु हरिश्चंद्र ने अंधेर नगरी के गीत में बहुत पहले जिस वाक्य को लगभग चेतावनी की तरह रखा था ‘लोभ पाप का मूल है। आज वही वाक्य हमारे समय की सबसे सटीक व्याख्या बन चुका है। फर्क बस इतना है कि लोभ अब किसी दरबार या मंडी तक सीमित नहीं है, वह मोबाइल ऐप, डिजिटल वॉलेट, क्रिप्टो करेंसी, ऑनलाइन गेमिंग और ‘गारंटीड रिटर्न के विज्ञापनों के जरिए हर घर में दाखि़ल हो चुका है।
दुर्ग में 72 लोगों से तीन करोड़ रुपये की ठगी कोई अकेली घटना नहीं है। यह उस वैश्विक परिघटना की स्थानीय अभिव्यक्ति है जिसमें तेज़ मुनाफे का सपना लोगों को विवेक से अलग कर देता है। क्रिप्टो करेंसी जिसे डिजिटल मुद्रा और भविष्य का वित्त बताया जाता है, असल में आज दुनिया भर में ठगी और धोखाधड़ी का सबसे बड़ा माध्यम बन चुकी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बीते वर्षों में क्रिप्टो से जुड़ी चोरी, हैकिंग और फर्जी निवेश योजनाओं में अरबों डॉलर का नुकसान दर्ज किया गया है। केवल एक वर्ष में ही क्रिप्टो थीफ्ट से हजारों करोड़ रुपये स्वाहा हो गए और कुल मिलाकर सामान्य निवेशकों को जो नुकसान हुआ है, वह कल्पना से परे है।
भारत भी इससे अछूता नहीं है। क्रिप्टो टोकन, फर्जी एक्सचेंज और निश्चित मुनाफा देने वाली योजनाओं के नाम पर देश के अलग-अलग हिस्सों में सैकड़ों मामले सामने आ चुके हैं। कहीं हजार करोड़ से अधिक की ठगी, कहीं करोड़ों रुपये के छोटे-छोटे निवेश डूबे, तो कहीं लोगों की जीवनभर की कमाई एक झटके में गायब हो गई। दुर्ग का मामला इसी श्रृंखला की एक कड़ी है, जहां क्रिप्टो के नाम पर खोली गई फाइनेंस कंपनी ने भरोसे और लालच, दोनों का एक साथ शोषण किया।
विडंबना यह है कि भारत में क्रिप्टो करेंसी को आज भी कानूनी मुद्रा का दर्जा प्राप्त नहीं है। सरकार ने इस पर टैक्स तो लगाया है, लेकिन इसे बैंकों जैसी वैध और सुरक्षित भुगतान प्रणाली नहीं माना है। रिज़र्व बैंक और वित्त मंत्रालय बार-बार यह चेतावनी दे चुके हैं कि क्रिप्टो निवेश अत्यधिक जोखिम वाला है, इसमें उपभोक्ता संरक्षण लगभग नहीं के बराबर है और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे अपराधों का गंभीर खतरा बना रहता है। इसके बावजूद लोगों को यह भरोसा दिलाया जा रहा है कि यही भविष्य है, यही सुरक्षित निवेश है, और जो पीछे रह गया वह मूर्ख है।
यही मानसिकता ऑनलाइन गेमिंग और सट्टा ऐप्स में भी दिखाई देती है। फैंटेसी क्रिकेट, रियल-मनी गेम्स और डिजिटल सट्टे को स्किल बेस्ड कहकर पेश किया जाता है। जब बड़े क्रिकेटर और फिल्मी सितारे इनका प्रचार करते हैं, तो आम आदमी के लिए यह अंतर कर पाना मुश्किल हो जाता है कि यह खेल है या जुआ। परिणाम यह होता है कि सीमित आय वाले लोग करोड़पति बनने के सपने में कर्जदार बन जाते है और जिनके पास पहले से धन है, उनके लिए यह केवल मनोरंजन रह जाता है।
सरकार की चेतावनियां एक तरफ है और जनता का लोभ दूसरी तरफ। समस्या यह नहीं कि चेतावनी नहीं दी जा रही, समस्या यह है कि लोभ चेतावनी सुनने की स्थिति में ही नहीं होता। हर ठगी से पहले यही सोच सक्रिय रहती है। इस बार अलग है, सबके साथ नहीं, मेरे साथ फायदा होगा, एक ही बार तो दांव लगाना है। यही वह अंधापन है जिसे भारतेंदु ने अंधेर नगरी कहा था, जहाँ विवेक पीछे छूट जाता है और लालच राजा बन बैठता है।
असल संकट तकनीक का नहीं है। संकट उस सामाजिक मानसिकता का है जो मेहनत, धैर्य और सुरक्षित बैंकिंग व्यवस्था को तुच्छ समझने लगी है। बैंकिंग प्रणाली धीमी हो सकती है, लेकिन वह कानून, निगरानी और जवाबदेही के दायरे में है। इसके विपरीत क्रिप्टो, सट्टा और फर्जी निवेश योजनाएं तेज़ मुनाफे का सपना दिखाकर व्यक्ति को पूरी तरह असहाय छोड़ देती है न पैसा वापस, न स्पष्ट कानूनी सहारा।
दुर्ग जैसी घटनाएं हमें चेतावनी देती हैं कि हर वह योजना जो कम समय में पैसा दोगुना करने का दावा करे, दरअसल अंधेर नगरी का ही नया संस्करण है। जब तक हम यह नहीं समझेंगे कि सुरक्षित निवेश का कोई शॉर्टकट नहीं होता, तब तक लोभ नए-नए डिजिटल मुखौटे पहनकर लोगों को ठगता रहेगा। भारतेंदु हरिश्चंद्र की चेतावनी आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। अंधेर नगरी अब नाटक मंच पर नहीं, मोबाइल स्क्रीन पर चल रहा है और अगर समाज ने समय रहते विवेक नहीं जगाया तो इसके शिकार बार-बार वही आम लोग बनते रहेंगे।

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