-सुभाष मिश्र
धर्म, डर और विधेयक—छत्तीसगढ़ में यह तीनों शब्द अब केवल अवधारणाएँ नहीं, बल्कि एक साथ चल रही वास्तविकताएँ हैं। ‘छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम-2026’ के कानून बन जाने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि राज्य अब इस प्रश्न को प्रतीकात्मक स्तर से आगे बढ़ाकर ठोस प्रशासनिक हस्तक्षेप में बदल चुका है। लेकिन जितना यह कानून कानूनी दस्तावेज है, उतना ही यह एक राजनीतिक और सामाजिक संदेश भी है—और शायद यही इसकी सबसे महत्वपूर्ण परत है।
पहली नजर में यह कानून व्यवस्था बनाने की कोशिश लगता है, जिसमें अवैध धर्मांतरण को रोकने के लिए सख्त प्रावधान किए गए हैं—7 साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा, भारी जुर्माने, और धर्म परिवर्तन से पहले अनिवार्य प्रशासनिक अनुमति जैसी व्यवस्थाएँ। पर असली सवाल यह है कि क्या यह केवल “नियमन” है, या इसके पीछे एक व्यापक सामाजिक मनोविज्ञान काम कर रहा है?
इसका उत्तर बस्तर और सरगुजा के हालिया घटनाक्रमों में दिखाई देता है। कांकेर, जगदलपुर और अंबिकापुर जैसे इलाकों में धर्मांतरण और “घर वापसी” को लेकर जो टकराव सामने आए, उन्होंने इस मुद्दे को निजी आस्था से निकालकर सामुदायिक तनाव के केंद्र में ला दिया। गांवों में बहिष्कार, सामाजिक विभाजन और पहचान की नई रेखाएँ खिंचती दिखीं। यह स्पष्ट हो गया कि धर्म अब केवल पूजा-पद्धति का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक शक्ति-संतुलन का हिस्सा बन चुका है।
इसी पृष्ठभूमि में “घर वापसी” अभियानों की सक्रियता भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। समर्थक इसे सांस्कृतिक पुनर्स्थापन बताते हैं, जबकि आलोचक इसे संगठित दबाव की दूसरी शक्ल मानते हैं। नतीजा यह हुआ कि एक ही समाज के भीतर दो समानांतर पहचानें खड़ी हो गईं—और राज्य को यह संकेत मिला कि स्थिति केवल सामाजिक नहीं, बल्कि प्रशासनिक हस्तक्षेप की मांग कर रही है।
यहीं पर यह कानून एक “संदेश” बन जाता है। यह संदेश उन लोगों के लिए है जो धर्मांतरण की गतिविधियों में सक्रिय हैं, कि अब हर कदम कानून की निगरानी में होगा। लेकिन यह संदेश समाज के भीतर भी जाता है—कि राज्य इस संवेदनशील मुद्दे पर निष्क्रिय नहीं है। सवाल यह है कि क्या ऐसा संदेश तनाव को कम करेगा, या उसे और संस्थागत रूप देगा?
क्योंकि कानून की सख्ती अपने साथ एक दूसरी आशंका भी लाती है। जब धर्म परिवर्तन से पहले आवेदन, सार्वजनिक सूचना और आपत्तियों की प्रक्रिया अनिवार्य हो जाती है, तो यह केवल पारदर्शिता का साधन नहीं रहती, बल्कि व्यक्तिगत आस्था को सार्वजनिक बहस का विषय भी बना देती है। और जहां आस्था सार्वजनिक विवाद में बदलती है, वहां टकराव की संभावना कम नहीं होती।
इसी कारण विरोध की आवाजें भी सामने आई हैं। बस्तर में मसीही समाज का सड़क पर उतरना, और कानून को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में चुनौती देना, यह बताता है कि इस कानून को केवल प्रशासनिक कदम के रूप में स्वीकार नहीं किया जा रहा। याचिकाओं में भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 का हवाला देकर इसे धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत निजता के अधिकार के खिलाफ बताया गया है। यह विवाद अब केवल राज्य और समाज के बीच नहीं, बल्कि कानून और संविधान के बीच संतुलन का प्रश्न बन चुका है।
और यहीं पर यह पूरी बहस एक बड़े राष्ट्रीय संदर्भ से जुड़ जाती है। मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों में पहले से ऐसे कानून लागू हैं, और उनका अनुभव मिला-जुला रहा है—कुछ जगहों पर प्रशासनिक नियंत्रण बढ़ा, तो कहीं सामाजिक अविश्वास भी गहरा हुआ। छत्तीसगढ़ उसी रास्ते पर खड़ा है, जहां यह तय होना बाकी है कि कानून सामाजिक संतुलन बनाएगा या नई दरारें पैदा करेगा।
सबसे दिलचस्प और शायद सबसे असहज करने वाला पहलू यह है कि इसी राज्य में कई अन्य महत्वपूर्ण विधेयक—आरक्षण संशोधन, कृषि सुधार, चिटफंड निवेशकों की सुरक्षा—अब भी लंबित हैं। लेकिन धर्म से जुड़ा कानून तेजी से प्राथमिकता बन जाता है। यह केवल संयोग नहीं लगता, बल्कि यह बताता है कि राजनीति अब उन मुद्दों की ओर झुक रही है, जिनका असर सीधे भावनाओं और पहचान पर पड़ता है।
ऐसे में धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम-2026 केवल एक कानून नहीं रह जाता। यह एक संकेत है—राज्य की प्राथमिकताओं का, समाज की बेचैनी का, और राजनीति की दिशा का। लेकिन इस संकेत का अर्थ क्या निकलेगा, यह अभी तय नहीं है। यह कानून डर पैदा करेगा या विश्वास, नियंत्रण लाएगा या टकराव—यह आने वाला समय ही बताएगा।