बिलासपुर। शिक्षा व्यवस्था को शर्मसार करने वाला एक सनसनीखेज मामला बिलासपुर से सामने आया है। करीब दो दशक पहले एक स्कूल की चारदीवारी के भीतर रचा गया फर्जीवाड़ा अब जाकर उजागर हुआ है। आरोप है कि वर्ष 2006 में कक्षा आठवीं में फेल हुए एक छात्र को स्कूल प्रबंधन और कुछ शिक्षकों की मिलीभगत से पास घोषित कर दिया गया था। इसके लिए न केवल मूल अंकसूची में व्हाइटनर लगाकर अंक बदले गए, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड तक में हेरफेर की गई। हैरत की बात यह है कि यह पूरा खेल लगभग 20 वर्षों तक छिपा रहा और तब सामने आया जब उसी छात्र के दस्तावेज सरकारी नौकरी के लिए सत्यापन में पहुंचे।
मामला शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला सरकंडा का है। जानकारी के अनुसार रवि कुमार यादव नामक छात्र ने वर्ष 2006 में कक्षा आठवीं की परीक्षा दी थी। परीक्षा परिणाम घोषित होने पर वह दो महत्वपूर्ण विषयों में अनुत्तीर्ण पाया गया था। नियमानुसार उसे पूरक परीक्षा देनी थी या फिर उसी कक्षा में दोबारा अध्ययन करना था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
जांच में सामने आया है कि छात्र को फेल होने के बावजूद अगली कक्षा में प्रवेश दिलाने के लिए स्कूल स्तर पर ही पूरी योजना बनाई गई। मूल अंकसूची में दर्ज फेल अंक व्हाइटनर से मिटाए गए और उनकी जगह पास होने लायक अंक दर्ज कर दिए गए। यहीं नहीं, भविष्य में किसी जांच की आशंका को देखते हुए स्कूल के दाखिला रजिस्टर और अंक अभिलेखों में भी उसी के अनुरूप बदलाव कर दिए गए, ताकि कहीं कोई विरोधाभास दिखाई न दे।
फर्जी अंकसूची के आधार पर छात्र को नौवीं कक्षा में प्रवेश मिल गया और इसके बाद उसने आगे की पढ़ाई भी पूरी कर ली। वर्षों तक यह जालसाजी किसी की नजर में नहीं आई। मामला तब खुला जब हाल ही में रवि कुमार यादव का चयन आबकारी विभाग में हुआ और नियुक्ति प्रक्रिया के तहत उसके शैक्षणिक दस्तावेजों का सत्यापन शुरू हुआ।
जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में सत्यापन के दौरान अधिकारियों को आठवीं की अंकसूची में कुछ संदेहास्पद तथ्य दिखाई दिए। इसके बाद स्कूल के पुराने रिकॉर्ड और विभागीय अभिलेखों का मिलान कराया गया। जांच में जो तथ्य सामने आए, उन्होंने अधिकारियों को भी हैरान कर दिया। मूल रिकॉर्ड में छात्र वर्ष 2006 में स्पष्ट रूप से फेल दर्ज था। इतना ही नहीं, उसने पूरक परीक्षा भी नहीं दी थी। इसके बावजूद वह पास घोषित कर दिया गया और आगे की पूरी शैक्षणिक यात्रा उसी फर्जी दस्तावेज के आधार पर जारी रही।
मामले के सामने आने के बाद शिक्षा विभाग ने इसे बेहद गंभीर कदाचार माना है। विभाग का कहना है कि यह सिर्फ एक छात्र को अनुचित लाभ पहुंचाने का मामला नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करने वाला अपराध है। ऐसे कृत्य उन विद्यार्थियों के साथ अन्याय हैं जो कठिन परिश्रम और योग्यता के बल पर सफलता हासिल करते हैं।
शिक्षा विभाग ने तत्कालीन प्राचार्य तथा उस समय पदस्थ रहे संबंधित शिक्षकों को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है। मामले की जांच के लिए समिति गठित की गई है और संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा गया है। विभागीय सूत्रों के अनुसार जांच पूरी होने के बाद दोषियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के साथ-साथ धोखाधड़ी, जालसाजी और सरकारी अभिलेखों में छेड़छाड़ जैसी गंभीर धाराओं के तहत एफआईआर भी दर्ज कराई जा सकती है।
इस खुलासे के बाद छात्र की नौकरी भी संकट में पड़ गई है। यदि आरोप सिद्ध होते हैं तो फर्जी दस्तावेज के आधार पर सरकारी नौकरी हासिल करने के प्रयास को लेकर उसके खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई संभव है। सरकंडा स्कूल का यह कथित ‘व्हाइटनर कांड’ एक बार फिर इस सवाल को सामने लाता है कि शिक्षा व्यवस्था में की गई छोटी दिखने वाली अनियमितताएं समय के साथ कितनी बड़ी कानूनी और प्रशासनिक समस्या बन सकती हैं। दो दशक तक दबा रहा यह मामला अब कई लोगों के लिए मुश्किलों का सबब बनने जा रहा है।