दूषित पानी नहीं, दूषित तंत्रसबसे स्वच्छ शहर इंदौर से उठता असहज सवाल

-सुभाष मिश्र
इंदौर देश का सबसे स्वच्छ शहर। लगातार वर्षों से स्वच्छता रैंकिंग में प्रथम। जिसे मॉडल कहा गया, जिसे ब्रांड बनाया गया, जिसे शासन-प्रशासन की सफलता का प्रतीक घोषित किया गया। लेकिन इसी इंदौर में नल का पानी पीकर बच्चों की मौत हो जाए, तो यह घटना नहीं रहती, यह तंत्र के चरित्र पर प्रश्नचिन्ह बन जाता है।
यह सवाल अब किसी एक कॉलोनी, किसी एक मोहल्ले या किसी एक पाइप तक सीमित नहीं है। यह सवाल उस पूरे सिस्टम से है, जिसने इंदौर को पोस्टर पर तो स्वच्छ बनाया, लेकिन ज़मीन पर सुरक्षा नहीं दे सका। दस से अधिक बच्चे, जिन्हें जीवन जीना था, जो स्कूल जाने की उम्र में थे, जो भविष्य का हिस्सा थे, वे केवल इसलिए मर गए क्योंकि उन्होंने वही पानी पिया, जिसे राज्य और नगर निगम ने पेयजल कहा था। इससे अधिक भयावह तथ्य किसी भी लोकतंत्र के लिए नहीं हो सकता। सबसे चौंकाने वाली बात यह नहीं है कि पानी दूषित था। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह दूषण अचानक नहीं था। शिकायतें थीं। आशंकाएँ थीं।
स्थानीय स्तर पर सवाल उठे थे फिर भी न प्रशासन चेता, न सिस्टम जागा, और न ही यह माना गया कि पानी जैसी बुनियादी चीज़ में लापरवाही का अर्थ सीधे मौत हो सकता है। जिस शहर ने नर्मदा का पानी पाने के लिए लंबा संघर्ष किया, जहाँ पहली लाइन, दूसरी लाइन और विस्तार योजनाओं को विकास का प्रमाण बताया गया, उसी शहर में अगर सीवरेज का पानी पेयजल लाइन में मिल जाए, तो यह तकनीकी खराबी नहीं, निगरानी तंत्र का पतन है। नगर निगम वर्षों से स्वच्छता के पुरस्कार ले रहा है। सड़कों की सफाई, कचरा प्रबंधन, रैंकिंग सब कुछ गिना गया। लेकिन क्या कभी यह गंभीरता से पूछा गया कि नलों से आने वाला पानी किस हालत में है? क्या पेयजल की गुणवत्ता की नियमित, पारदर्शी और जवाबदेह जांच की कोई ठोस व्यवस्था थी? अगर थी, तो ज़हर कैसे पहुँचा? और अगर नहीं थी, तो यह कैसी स्वच्छता है? कुछ अधिकारियों को हटाया गया। कुछ पद बदले गए। कुछ कार्रवाई की घोषणा हुई।
लेकिन सवाल यह है कि क्या अधिकारियों को हटाने से पानी साफ हो जाता है? क्या चेहरे बदलने से सिस्टम सुधर जाता है? यदि सीवरेज और पेयजल लाइन मिल रही थी, तो यह किसी एक दिन की चूक नहीं हो सकती। यह लंबे समय की अनदेखी का परिणाम है। यह उस तंत्र का परिणाम है, जो चेतावनी को फाइल में दबा देता है और मौत के बाद सक्रिय होता है।
जल जीवन मिशन के तहत घर-घर नल पहुँचे। लेकिन यदि उन नलों से सुरक्षित जल नहीं पहुँचा, तो यह मिशन अधूरा नहीं खतरनाक है। क्योंकि पानी सड़क या पुल नहीं है, जिसे खराब होने पर दोबारा बनाया जा सके। पानी जीवन है और उसमें लापरवाही सीधे जान लेती है। आज इंदौर में आक्रोश है। डर है। अविश्वास है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या अब नल का पानी पीना भी जोखिम है? क्या सबसे स्वच्छ शहर में भी नागरिक सुरक्षित नहीं हैं? ये सवाल किसी राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं हैं। ये सवाल उस तंत्र के खिलाफ हैं, जिसने जवाबदेही खो दी है।
सबसे खतरनाक स्थिति तब पैदा होती है, जब व्यवस्था यह मानने लगती है कि ऐसी घटनाएँ होती रहती हैं। नहीं, ऐसी घटनाएँ नहीं होनी चाहिए। और अगर होती हैं, तो यह मान लेना चाहिए कि दूषण केवल पानी में नहीं, सोच में भी है। इंदौर आज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह सबसे स्वच्छ शहर कहलाता है। अगर वहीं यह हाल है, तो बाकी शहरों का क्या? यह समय पुरस्कार गिनाने का नहीं, यह समय आत्ममंथन का है। क्योंकि जिस शहर में बच्चे नल का पानी पीकर मर जाएँ, वह चाहे कितनी भी रैंकिंग जीत ले, वह स्वच्छ नहीं कहलाने का नैतिक अधिकार खो देता है। आज सवाल सिर्फ इतना है कि क्या हम दूषित पानी से डरेंगे, या दूषित तंत्र को ठीक करने की हिम्मत करेंगे? इंदौर इस सवाल के साथ खड़ा है और देश देख रहा है।

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