-सुभाष मिश्र
देश की सर्वोच्च अदालत ने हाल ही में एक बेहद गंभीर टिप्पणी की—’खनन माफिया अब नए डकैत बन चुके हैं और इनसे निपटने के लिए सरकारों को एहतियातन हिरासत जैसे कड़े कदम उठाने चाहिए। यह केवल एक टिप्पणी नहीं, बल्कि उस सच्चाई का न्यायिक स्वीकार है जिसे देश के कई हिस्सों में लोग वर्षों से महसूस कर रहे हैं। मेरे कहानीकार मित्र आनंद हर्षुल का उपन्यास रेतीला आया है। जिसने इस खनन माफिया को बहुत बारीकी से उजागर किया है।
भारत में खनिज संपदा केवल आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि प्रकृति की विरासत है। इसके संरक्षण और नियंत्रित उपयोग के लिए जैसे कानून मौजूद हैं। 2015 में इसमें संशोधन कर अवैध खनन और परिवहन पर 5 साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान किया गया। सवाल यह है कि इतने कठोर कानून होने के बावजूद अवैध खनन का कारोबार क्यों फल-फूल रहा है? अवैध खनन का कारोबार ग्राम पंचायत से लेकर महानगरों के किनारे की नदियों में जारी है। इसका जवाब असहज है, लेकिन स्पष्ट भी—कानून की कमी नहीं, लागू करने की इच्छाशक्ति की कमी है और नेताओं, अधिकारियों और माफिया की सांठगांठ भी इकी वजह है।
छत्तीसगढ़ हो, मध्य प्रदेश हो या राजस्थान हर जगह एक समान पैटर्न दिखता है। नदियों से अवैध रेत उत्खनन, जंगलों की अंधाधुंध कटाई, पहाड़ों का क्षरण और इन सबके पीछे संगठित नेटवर्क। यह नेटवर्क केवल स्थानीय स्तर का नहीं होता, इसमें प्रशासनिक तंत्र, राजनीतिक संरक्षण और आर्थिक स्वार्थ का जटिल गठजोड़ शामिल होता है।
छत्तीसगढ़ में सामने आए कोयला घोटाले ने इस सच्चाई को और उजागर किया, जहाँ प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर राजनीतिक स्तर तक सवाल उठे। जब सिस्टम के भीतर ही हिस्सेदारी की आशंका हो, तो कार्रवाई का कमजोर पडऩा स्वाभाविक हो जाता है। यही कारण है कि कई बार कलेक्टर, खनिज विभाग या स्थानीय प्रशासन पर मजबूरी का आरोप लगता है।
छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश प्रमुख हैं। छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा और रायपुर (महानदी) में अवैध उत्खनन पर 500 से अधिक प्रकरण दर्ज किए गए हैं, जहाँ चैन माउंटेन और पनडुब्बी मशीनों का उपयोग हो रहा है। मध्य प्रदेश में टीकमगढ़ (धसान नदी) में ईटीपी बंद होने के बाद भी खनन जारी है। सुप्रीम कोर्ट ने इन राज्यों को फटकार लगाई है।
रेत के अवैध उत्खनन के हालिया चर्चित मामले में छत्तीसगढ़ (बालौदाबाजार और रायपुर) में दिसंबर 2025 से मार्च 2026 तक अवैध रेत उत्खनन और परिवहन के 543 से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं। ग्राम सीरियाडीह (महानदी) में चैन माउंटेन मशीन का उपयोग करके अवैध उत्खनन किया जा रहा था। इसी तरह छत्तीसगढ़ (जांजगीर-चांपा) के खपरीडीह और देवरघटा में संयुक्त कार्रवाई के दौरान 02 चैन माउंटेन मशीन और 03 ट्रैक्टर जब्त किए गए। इसके अलावा, ग्राम लछनपुर में भी कार्रवाई की गई। छत्तीसगढ़ (राजनांदगांव) में अवैध भंडारण और परिवहन के 67 प्रकरण दर्ज कर 16.90 लाख रुपये का जुर्माना वसूला गया। मध्य प्रदेश (छतरपुर) के धसान नदी में अवैध रेत उत्खनन के खिलाफ छतरपुर सीमा में कार्रवाई की गई। टीकमगढ़ जिले में ईटीपी (इलेक्ट्रॉनिक ट्रांजिट पास) बंद होने के बावजूद खनन जारी था। दतिया (मध्य प्रदेश) एनजीटी मामले में अवैध खनन के मामले में एनजीटी द्वारा 17 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया था, जो काफी समय तक चर्चा में रहा।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह माफिया अब केवल आर्थिक अपराध तक सीमित नहीं रहा। देश में कई घटनाएँ सामने आई हैं जहाँ अवैध खनन रोकने गए अधिकारियों पर हमले हुए, गाडिय़ाँ चढ़ा दी गईं, यहां तक कि जानलेवा हमले भी हुए। यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है, जब राज्य का अधिकार चुनौती में हो और अपराधी समानांतर सत्ता बन जाएं।
ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की नए डकैत वाली टिप्पणी बेहद सटीक बैठती है। फर्क सिर्फ इतना है कि आज के डकैत बंदूक से कम और नेटवर्क, पैसे और संरक्षण से ज्यादा ताकतवर हैं। ऐसे में राज्य सरकारों की जिम्मेदारी यहाँ और बढ़ जाती है। केवल जुर्माना लेकर समझौता कर लेना या औपचारिक कार्रवाई कर देना समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि यह माफिया को अप्रत्यक्ष वैधता देता है।
चूंकि अवैध खनन को रोकना है तो इसके लिए जरूरत है तीन स्तरों पर सख्ती की। पहली, कानून का कठोर और निष्पक्ष उपयोग, बिना किसी दबाव के।
दूसरी, प्रशासनिक जवाबदेही, जहाँ कार्रवाई न करने पर भी जिम्मेदारी तय हो।
तीसरी, राजनीतिक इच्छाशक्ति, जो इस नेटवर्क को संरक्षण देने के बजाय तोड़े।
प्राकृतिक संसाधनों का दोहन यदि अनियंत्रित और अवैध तरीके से जारी रहा, तो इसका नुकसान केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहेगा। यह राज्य की विश्वसनीयता, कानून के शासन और समाज के संतुलन को भी कमजोर करेगा।
अब सवाल यह नहीं है कि खनन माफिया सक्रिय हैं या नहीं, सवाल यह है कि क्या राज्य उनके सामने अपनी संप्रभुता स्थापित करने को तैयार है।